खेती से परे भी गांवों में वैकल्पिक आय जरूरी

संपादकीय
16 सितंबर 2015
छत्तीसगढ़ की डेढ़ सौ तहसीलों में से करीब सौ में सूखे के असर की रिपोर्ट राज्य सरकार ने तैयार की है और केंद्र सरकार को भेजी है। दो तिहाई राज्य सूखे की चपेट में है, और धान का किसान वैसे भी परंपरागत रूप से पूरी दुनिया में गरीब रहते आया है। ऐसे में राज्य की यह हालत भयानक है, और छोटे किसानों, खेतिहर मजूदरों और खेती से जुड़े दूसरे कामगारों के बेरोजगार हो जाने की नौबत आ चुकी है। आज केंद्र और राज्य सरकार मिलकर भी ऐसे किसानों को सिर्फ राहत दे सकते हैं, लेकिन कोई लंबा समाधान, कोई स्थायी इलाज इससे निकलने वाला नहीं है। लंबे समय के लिए अगर सूखे या अधिक बारिश, बाढ़ जैसे खतरों से जूझने का रास्ता अगर निकालना है, तो वह छत्तीसगढ़ के गांवों को सिर्फ खेती पर निर्भर रखने के बजाए ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना पड़ेगा, और यह काम कोई एक शहर बसाने से भी अधिक मुश्किल काम होगा। 
गांवों की संभावनाएं कम नहीं होती हैं। वहां पर बिना बिजली, बिना मशीनों, और बिना बाहरी हुनर के भी लोग रोजी-रोटी कमा सकते हैं, और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में काफी कुछ जोड़ सकते हैं। पशुपालन, डेयरी, मछली पालन, मधुमक्खी पालन, रेशम के कीड़ों को पालना, पेड़ों पर लाख की खेती, वनोपज पर आधारित कामकाज, ऐसे दर्जनों काम रहते हैं, जो कि परंपरागत रूप से गांवों में होते आए हैं, और स्थानीय खूबियों के मुताबिक इनको आज भी बढ़ावा दिया जा सकता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्से में बुनकर हैं, और वहां पर हैंडलूम को बढ़ावा मिल सकता है, इस राज्य में परंपरागत रूप से बीड़ी बनाने का काम होता था, और उसे भी बढ़ाया जा सकता है। आज सूखे के मौके पर ये बातें बेमतलब लग सकती हैं कि जब आग लगी हो, तब दमकल खरीदने की नसीहत दी जा रही है, लेकिन ऐसे ही मौके पर आगे की योजना के बारे में भी सोचने की जरूरत है। 
छत्तीसगढ़ के किसानों को अगर महज धान की खेती पर छोड़ दिया जाएगा तो सूखे से परे भी उनकी अर्थव्यवस्था कमजोर ही रहेगी। छत्तीसगढ़ के साथ एक दिक्कत यह भी है कि यहां के लोग सीमित जरूरतों में जीना सीख चुके हैं, और वे बड़ा कर्ज लेकर जोखिम वाली खेती नहीं करते। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ में दूसरे राज्यों के मुकाबले किसानों की खुदकुशी कम है, क्योंकि यहां के लोग खतरे कम उठाते हैं, कर्ज में कम डूबते हैं। लेकिन इस राज्य में सरकार की कोशिशें भ्रष्टाचार में डूब जा रही हैं। लगातार अलग-अलग विभागों के बारे में खबरें आती हैं कि किस तरह किसानों के लिए उपकरण खरीदी में घोटाला होता है, या धान खरीदी में भ्रष्टाचार होता है, जिसकी वजह से सरकार किसानों को ठीक से बोनस भी नहीं दे पाती है, और न ही पिछले बरसों की तरह पूरा धान खरीद पाती है। लेकिन इस पूरी नौबत को सुधारना सिर्फ कृषि विभाग का काम नहीं है, बल्कि गांवों में कृषि के जो भी विकल्प हो सकते हैं, वैसे तमाम ग्रामोद्योग के बारे में सरकार को एक मिशन बनाकर सोचना चाहिए, और किसान की जिंदगी में धान से अधिक भी कुछ लाने के बारे में कोशिश करनी चाहिए। 

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