एक मूर्ख सारा पालिन, और वैसे बाकी लोग...

संपादकीय
20 सितंबर 2015

अमरीका में पिछले चुनाव में ओबामा के खिलाफ रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवार रही सारा पालिन ने एक पूरी तरह भड़काऊ बयान में कहा है कि वहां की स्कूल के जिस मुस्लिम बच्चे को एक घड़ी बनाकर ले जाने के आरोप में स्कूल में गिरफ्तार किया गया था, अगर वह घड़ी थी, तो मैं ब्रिटेन की महारानी हूं। यह कटाक्ष करते हुए उन्होंने राष्ट्रपति ओबामा की इस बात को लेकर भारी आलोचना की, कि उन्होंने उस बच्चे को राष्ट्रपति भवन आने का न्यौता दिया है। 
सारा पालिन अपने दकियानूसी खयालों के लिए राष्ट्रपति चुनाव के दौरान बुरी तरह से उजागर हो चुकी थीं, और वे शायद अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव की सबसे अधिक बेवकूफ उम्मीदवार भी थीं। अपने हर इंटरव्यू में, अपने हर भाषण में सारा पालिन ने जिस तरह की रंगभेदी, नस्लभेदी, गरीबों के खिलाफ, और कट्टरपंथ की बातें कही थीं, वे बातें अभूतपूर्व हिंसक थीं। अब अगर किसी वजह से सारा पालिन चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बन गई होतीं, तो उस देश का और बाकी दुनिया का क्या हाल होता? यह बात सबको याद है कि उनकी पार्टी के राष्ट्रपति रहे जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने अफगानिस्तान और इराक पर जो हमले किए थे उनमें लाखों लोग मारे गए, और पूरी दुनिया में कई तरह की नफरत भड़की। अब अगर उसमें बुश के मुकाबले और ऊंचे दर्जे की बेवकूफी भी जुड़ गई होती, तो जाने क्या हुआ होता ! 
दरअसल ताकत के साथ अज्ञान, या अहंकार, या कई मामलों में दोनों जब जुड़ जाते हैं, तो फिर खतरा कई गुना बढ़ जाता है। और हाल के बरसों में तो हम देखते आ रहे हैं कि भारत के पड़ोस के पाकिस्तान में जिस तरह धर्मान्ध और कट्टरपंथी लोग वहां साम्प्रदायिक हिंसा कर रहे हैं, मुस्लिमों का एक सम्प्रदाय उसी मजहब के दूसरे सम्प्रदाय को थोक में मार रहा है, वहां परमाणु वैज्ञानिक दूसरे देशों को परमाणु तकनीक बेचते पकड़ा रहे हैं, और वहां एयरफोर्स के लड़ाकू पायलट के अलकायदा जैसे खतरनाक आतंकी संगठन से रिश्ते सामने आ रहे हैं, ऐसे में ताकत और अधिक खतरनाक हो जाती है। हिन्दुस्तान में यह इतिहास में दर्ज है कि किस तरह अंगरक्षकों ने इंदिरा गांधी को मार डाला था। प्रधानमंत्री के आसपास वह बंदूक की ताकत थी जिसने कि साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता के साथ मिलकर यह हत्या की थी। अब अगर अमरीका के राष्ट्रपति पद पर, या फिर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री या फौज के मुखिया के ओहदे पर अगर मूर्खता और साम्प्रदायिकता मिल जाएं, तो वे दुनिया के लिए जानलेवा हो सकते हैं। फिर यह भी समझने की जरूरत है कि अमरीका से लेकर पाकिस्तान और हिन्दुस्तान तक दुनिया आज एक-दूसरे से कई जटिल रिश्तों में जुड़ी हुई है। ऐसे में एक जगह जुबानी या हथियारों के हमले का असर दूसरी जगह जाने कितनी तरह से कितने शक्लों में हो सकता है, होता है। 
इसलिए आज दुनिया को न सिर्फ ऐसे नेताओं की जरूरत है जो कि अपने देश की सरकारों को ठीक से चला सकें, बल्कि ऐसे नेताओं की भी जरूरत है जिनका नजरिया अंतरराष्ट्रीय बेहतरी का भी हो। ऐसा करना कई बार खासा मुश्किल होता है क्योंकि घरेलू चुनौतियां और घरेलू जरूरतें किसी भी देश के मुखिया को बाकी दुनिया की फिक्र से परे जाने को मजबूर कर देती हैं। ऐसे नेता कुछ वक्त के लिए तो ताजा इतिहास बनाते दिखते हैं, लेकिन लंबे इतिहास में ऐसे नेता हाशिए पर चले जाते हैं। एक वक्त था जब नेहरू जैसे नेता दुनिया के बहुत से देशों के लोगों से सरकारी रिश्तों से परे भी दोस्ती रखते थे, और ब्रिटिश साम्राज्य के खात्मे के बाद के उस दौर मेें दुनिया को बेहतरी में ढालने में उनकी भूमिका एक देश के नेता से बहुत अधिक थी। आज ये दोनों बातें जरूरी हैं। कुछ नेता एक उग्र राष्ट्रवाद का नारा देकर, काल्पनिक दुश्मन का डर दिखाकर, अपने देश की सत्ता पर काबिज हो सकते हैं, लेकिन लंबे समय में ये अपने देश के लिए भी खतरनाक साबित हो सकते हैं, और दुनिया के लिए भी। आज दुनिया में परमाणु हथियारों के गोदाम लबालब हैं, और कई जगहों पर हो सकता है कि नफरत-जीवी सरकारी या आतंकी लोग इनका बेजा इस्तेमाल करने का हौसला भी कर लें। ऐसे में बहुत ही सब्र और बर्दाश्त से, पूरी दुनिया की भलाई के लिए काम करने वाले नेताओं की जरूरत है। सारा पालिन की बेवकूफी और बदनीयत को लेकर आज की यह चर्चा शुरू हुई है, लेकिन यह चर्चा सिर्फ अमरीका को लेकर नहीं है, बाकी दुनिया को भी इस खतरे को समझने की जरूरत है। जो लोग भारत में साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दे रहे हैं, उनको यह नहीं मालूम है कि वे लोग अपने घर बैठे तो सुरक्षित हैं, लेकिन दूसरे देशों में काम कर रहे करोड़ों हिन्दुस्तानी ऐसे हैं जिनके सिर पर भारत की ऐसी हिंसक-बकवास खतरा टंग जाता है। 
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