बड़े पहले खुद को सुधारें, फिर बच्चों को, वरना पुलिस, अदालत, और जेल तो हैं ही

संपादकीय
5 सितंबर 15

ब्रिटेन में अभी पुलिस ने स्कूली बच्चों को सावधान किया है कि अगर वे मोबाइल या इंटरनेट पर कोई अश्लील तस्वीर भेजते हैं, या कोई आपत्तिजनक बात भेजते हैं, तो उनके खिलाफ जुर्म भी दर्ज हो सकता है, और पुलिस रिकॉर्ड में ऐसे जुर्म की जानकारी इस तरह दर्ज हो सकती है कि वह अगले सौ बरस तक न मिटे। मतलब यह कि ऐसी एक भी गलती, या गलत काम से लोग अपनी पूरी जिंदगी पुलिस रिकॉर्ड में इस तरह दर्ज हो सकते हैं कि जब कभी उनके बारे में कोई सरकारी छानबीन हो, तो उनके नाबालिग रहते हुए भी किया गया ऐसा कोई डिजिटल-जुर्म निकलकर सामने आ जाए। और दूसरी तरफ हिन्दुस्तान में महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश निकाला है कि अगर किसी व्यक्ति के बयान, या उसकी सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी, या उसके भेजे गए किसी संदेश से किसी जनप्रतिनिधि की ऐसी आलोचना हो, जिससे कि आगे बढ़कर तनाव भी खड़ा हो जाए, तो ऐसे लोगों के खिलाफ राजद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाएगा। महाराष्ट्र सरकार के इस आदेश का कानूनी वजन साबित होना अभी बचा है, लेकिन यह एक इतना बड़ा डिजिटल खतरा भारत से लेकर पश्चिम के देशों तक लोगों पर छाया है, जिसका उन्हें एहसास नहीं है। ब्रिटेन में यह मामला एक ऐसी तस्वीर को लेकर सामने आया जिसमें कम उम्र के एक लड़के ने अपनी ही बिना कपड़ों की सेल्फी खींचकर अपनी एक दोस्त को भेज दी थी। और इंटरनेट पर पश्चिम की पुलिस और जांच एजेंसियां लगातार कम उम्र के बच्चों की अश्लील या नग्न तस्वीरों पर नजर रखती हैं, और उनकी नजर में यह बात सामने आई। अब किसी को यह समझने खासी मुश्किल हो सकती है कि एक टीनएजर किशोर अपनी ही तस्वीर खींचकर किसी दोस्त को भेजे, और वह जुर्म करार दिया जाए। 
हम इस बात को अपने अखबार के विचारों के इस कॉलम में बार-बार लिखते हैं कि भारत में भी बच्चों से लेकर नौजवानों तक, और अधेड़ उम्र के लोगों तक को इस बात के लिए शिक्षित और जागरूक करने की जरूरत है कि भारत के आईटी कानून के तहत कौन-कौन सी बातें जुर्म के दायरे में आती हैं। इंटरनेट और मोबाइल के चलते लोगों के हाथ में एक ऐसी अंधाधुंध ताकत हासिल हो गई है कि वे पल भर में कोई साम्प्रदायिक अफवाह फैला सकते हैं, धर्मान्धता फैला सकते हैं, अंधविश्वास फैला सकते हैं, या लोगों से दुश्मनी निकालने के लिए उनकी निजी तस्वीरें या फिल्म फैला सकते हैं। आज हर किसी की जेब में जो छोटे-छोटे मोबाइल फोन है, वे लोगों के लिए एक औजार हैं, लेकिन विज्ञान के दिए हुए औजार को लोग हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन मोबाइल फोन की शक्ल देखकर किसी को यह एहसास नहीं होता कि यह फोन नहीं गले का फंदा भी बन सकता है। एक फोन पर की गई नाजायज हरकत से कोई जान दे भी सकते हैं, और ऐसी ज्यादती करने वाले को उम्रकैद भी हो सकती है। अब महाराष्ट्र सरकार ने जिस तरह से राजद्रोह की एक नई परिभाषा गढ़ दी है, और बहुत से नासमझ या बदनीयत लोगों को राजद्रोह के दायरे में लाने का आदेश निकाला है, उससे हिन्दुस्तान के हर किसी को कानून की गंभीरता समझनी चाहिए। 
जिस तरह ब्रिटिश पुलिस ने स्कूली बच्चों को चौकन्ना किया है, भारत में भी केन्द्र और राज्य सरकारों को एक अभियान चलाकर बच्चों और बड़ों सभी को मोबाइल-इंटरनेट नाम के औजारों के बारे में आगाह करना जरूरी है कि जैसे ही उनको हथियार बनाया जाएगा, वे दुधारी तलवार बन जाएंगे। सामने वाले को तो घायल कर ही देंगे, ऐसे हथियार चलाने वाले भी उससे कट जाएंगे, और उनकी मलहम पट्टी बाद में जेल के अस्पताल में ही होगी। लेकिन सरकारें जब तक लोगों को सावधान करें, तब तक हर मां-बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों को मोबाइल और इंटरनेट देने के साथ-साथ उनकी कानूनी जिम्मेदारियां भी बताएं, सावधानी सिखाएं, और खतरों से आगाह भी करें। और ऐसा करने के पहले मां-बाप खुद भी अपने डिजिटल-चालचलन को सुधार लें, वरना उनकी बात का कोई असर नहीं होगा। और जो लोग यह सोचते हैं कि उनके फोन और इंटरनेट पर उनके बच्चों की नजरों से कुछ बचा हुआ है, उन्हें अपने बच्चों की डिजिटल-क्षमता का अंदाज नहीं है। इसलिए बड़े पहले खुद को सुधारें, फिर बच्चों को सुधारें, वरना पुलिस, अदालत, और जेल तो हैं ही। 

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