हर पखवाड़े बड़ी गलती की आदी मोदी सरकार

22 सितंबर 2015
संपादकीय

मोदी सरकार लोकप्रियता की जिन लहरों पर सवार होकर सत्ता पर आई थी, वे लहरें अब बैठ रही हैं। दस बरस लंबा विपक्ष किसी भी चुनाव में दस बरस की भ्रष्ट और निकम्मी सरकार के मुकाबले वैसे भी बड़ा लुभावना दिखता है, और फिर इस बार भाजपा के पास मोदी भी थे, और दूसरी तरफ कांगे्रस के नेता राहुल गांधी थे। नतीजा सत्ता तो होना ही था। लेकिन यह सरकार बनने के बाद जिन गलतियों से आसानी से बच सकती थी, उनसे बचने की इसकी न कोशिश दिखती है, और न ही नीयत। ऐसा कोई पखवाड़ा नहीं जाता जब केंद्र सरकार का कोई न कोई मंत्री, कोई न कोई मंत्रालय सरकार के लिए एक निहायत गैरजरूरी फजीहत खड़ी न करे। अब कल बैठे-ठाले सोशल मीडिया और मोबाइल फोन के एप्लीकेशन को लेकर संचार मंत्रालय की तरफ से एक ऐसा मसौदा विचार के लिए जनता के सामने रखा गया, जिसे कुछ घंटों के भीतर चारों तरफ से धिक्कार मिलने लगी। एक बार फिर ऐसा लगा कि सरकार लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक का अपना शौक फिर पूरा करना चाहती है। हम इससे परे भी देखते हैं कि अगर मोबाइल फोन पर लोगों को नब्बे दिनों तक सारे संदेश संभालकर रखने की बंदिश लागू की जाएगी, तो उससे आम लोगों के मामूली फोन की क्षमता खत्म हो जाएगी, और आम लोग या तो महंगे फोन लेने को बेबस होंगे जिनमें ट्रक भर घूरा ढोकर चलने की ताकत होती है, या फिर वे लोग अपने संदेशों को बंद करने पर मजबूर हो जाएंगे।
कल से सरकार की जो धुनाई चल रही है, वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और निजी जीवन में सरकारी तांक-झांक को लेकर है, अब तक लोगों का ध्यान फोन की मेमोरी जैसी तकनीकी बात पर गया नहीं है, लेकिन हमको अंदाज है कि बाजार की कुछ ताकतें भी महंगे फोन का बाजार बढ़ाने के लिए इस तरह की सरकारी नीतियों के पीछे हो सकती हैं। सरकार की तरफ से संचार मंत्री रविशंकर प्रसाद अब यह मसौदा वापिस ले रहे हैं, जो कि पेश करने के पहले ही सरकार को खारिज कर देना था। एक न एक बात को लेकर मोदी सरकार के फैसले, उसके काम, उसके बयान, लोगों के मुंह का स्वाद खराब करते चले आ रहे हैं। फिर सरकार के अलावा सत्तारूढ़ गठबंधन की मुखिया भाजपा से जुड़े हुए धार्मिक, सामाजिक, और साम्प्रदायिक संगठन आए दिन कभी अल्पसंख्यकों को देशनिकाला देते हैं, कभी लोगों के खानपान पर काबू करते हैं, कभी कुरान के खिलाफ बोलते हैं, कभी लोगों के सिर पर गीता लादते हैं, और कभी योग न करने वालों को पाकिस्तान भेजते हैं। नरेन्द्र मोदी जैसे चतुर और तेज नेता अगर सोच-समझकर इस तरह का धु्रवीकरण देश में कर रहे हैं, तो इससे देश का नुकसान तो हो ही रहा है, इससे खुद उनकी पार्टी की आगे की संभावनाएं कमजोर हो रही हैं। धार्मिक आधार पर भी जो लोग भाजपा को पसंद करते हैं, वे तमाम लोग भी न तो शाकाहारी हैं, और न ही हिंसक हैं। वे साम्प्रदायिक भी नहीं हैं, और बिना धार्मिक आधार भी कांगे्रस से नफरत जैसे बहुत से मुद्दों को लेकर भी लोग भाजपा और मोदी के साथ हैं। ऐसे में एक आक्रामक हिंदुत्व, या आक्रामक धु्रवीकरण मोदी को खासा नुकसान पहुंचा रहा है। और अभी हम देश के कारखानों और कारोबार की उस निराशा की चर्चा यहां नहीं कर रहे हैं जो कि देश भर में काले बादलों की तरह छाई हुई है। मोदी के हाथ से रस्सी खिसक रही है, और अगर वे यह सोचते हैं कि वे जब चाहे इसे थाम लेंगे, तो ऐसी गलती करने वाले वे पहले नेता नहीं रहेंगे। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें