सड़कों पर मौत रोकना अब नहीं तो कब?

संपादकीय
24 सितंबर 2015

कल भरी दोपहर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में तेज रफ्तार कारों पर सवार नौजवान कॉलेज छात्र शायद एक-दूसरे की गाड़ी से रफ्तार का मुकाबला करते हुए हादसे का शिकार हुए, और तीन जिंदगियां चली गईं। मामला दिन का था, राजधानी का था, रफ्तार और जाने-पहचाने परिवारों का था, तो खबर भी खुलासे से तस्वीरों सहित छपी, और लोगों को दिल दहला गई। लेकिन यह हाल कम चर्चित मौतों का भी रोजाना किसी न किसी जगह से सामने आता है। दो दिन पहले ही मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने ट्रैफिक की जागरूकता के लिए एक बड़े स्टेडियम में दसियों हजार छात्र-छात्राओं के बीच ट्रैफिक सुरक्षा पर जोर देकर अपनी बात कही, और छात्र-छात्राओं के उसी तबके के तीन नौजवान जिंदगियां कल खत्म हो गई, और कई जख्मी हैं। 
हम हर कुछ हफ्तों में इसी जगह पर ट्रैफिक को लेकर अपनी फिक्र जाहिर करते हैं, और इस अखबार के शुरू से ही हम इसमें अपनी तरफ से ट्रैफिक की जागरूकता के लिए इश्तहार बनाकर छापते भी आए हैं। इन दिनों भी गणेश चतुर्थी के मौके पर जो विज्ञापन हम लगातार छाप रहे हैं, मुख्यमंत्री ने उसी विज्ञापन के स्लोगन को इस कार्यक्रम में बड़ी मौजूदगी के बीच बढ़ावा दिया, और वही संदेश लोगों को दिया। लेकिन हकीकत यह है कि भाषणों से मौतें थम नहीं रही हैं। भारत के इस हिस्से में लोग अपनी खुद की जिंदगी की हिफाजत को लेकर इस कदर लापरवाह हैं कि दसियों लाख की गाड़ी जरूर खरीद लेते हैं, लेकिन उसमें मुफ्त में मिला हुआ सीट बेल्ट लगाने को अपनी तौहीन समझते हैं। संपन्न मां-बाप बच्चों को लाखों रूपए दाम की मोटरसाइकिलें दिलवा रहे हैं, लेकिन हेलमेट लगाने से लोग कतराते हैं, और उसे सिर पर बोझ मानकर चलते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए सरकार को ट्रैफिक के कड़े नियम बनाने पड़े हैं, और देश भर में जो नियम लागू हैं उनको तोडऩे वाले छत्तिसगढिय़ा अपने आपको सबसे बढिय़ा मानते हुए अपने को मौत-प्रूफ साबित करने की कोशिश करते हैं। इस प्रदेश में तकरीबन हर कोई यह मानकर चलते दिखते हैं कि सड़कों पर मौत किसी और की ही हो सकती है, उनकी नहीं हो सकती। 
यह बात हमारी समझ से पूरी तरह परे है कि जो मुख्यमंत्री हेलमेट को बढ़ावा देने के लिए सड़कों पर दुपहिये पर खुद हेलमेट लगाकर निकलते हैं, उनकी पुलिस को भी हेलमेट कड़ाई से लागू करने में कोई दिलचस्पी नहीं है। और फिर अकेली पुलिस को क्यों कोसना, पुलिस तो नेताओं और प्रशासनिक अफसरों के मातहत काम करती है, और जब तक सरकार में यह हौसला न हो, ऐसी नीयत न हो, कि अपने लोगों को नियम-कायदे मानना सिखाया जाए, तब तक पुलिस कुछ दिनों का एक अभियान ही चला सकती है। छत्तीसगढ़ की सड़कों पर रोजाना अनगिनत मौतें हो रही हैं। इनमें से कुछ मौतों के आंकड़े तो आ जाते हैं लेकिन जो लोग तुरंत नहीं मरते, उनकी बाद में होने वाली मौत खबरों में नहीं आतीं। इन लोगों को बचाने में सरकार और बीमा कंपनियों का भी खासा खर्च होता है, और इनकी मौत या इनके जिंदगी भर के जख्म से इनके परिवार की कमर भी टूट जाती है। 
सरकार को अपनी यह न्यूनतम जिम्मेदारी तुरंत गंभीरता से लेनी चाहिए, और ट्रैफिक के खतरों के लिए जिम्मेदार तीन-चार बुनियादी बातों पर ही अगर ध्यान दिया जाए, तो मौतें एकदम घट सकती हैं। पहली बात नशे में गाड़ी चलाने की है, जिसकी जांच के लिए पुलिस उपकरण लेकर कभी-कभी तस्वीरें खिंचवाती है। दूसरी बात तेज रफ्तार गाड़ी चलाने की है, जिसकी रफ्तार नापने के लिए पुलिस के पास उपकरण मौजूद हैं, और बड़ी आसानी से ऐसी गाडिय़ों को पकड़ा जा सकता है। तीसरी बात बिना हेलमेट या बिना सीट बेल्ट गाडिय़ां दौड़ाने की है, और इनको पकडऩा भी बहुत ही आसान है। चौथी बात कम उम्र के लोगों का गाडिय़ां दौड़ाना है, और ऐसे बच्चों के पालकों पर भी कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए, और उन गाडिय़ों को लंबे समय के लिए जब्त भी करना चाहिए। ये काम राजधानी के चौराहों से शुरू होने चाहिए ताकि इनका असर बाकी राज्य तक जा सके। 
अभी छत्तीसगढ़ की सरकार सड़क की मौतों को रोकने में दिलचस्पी लेते नहीं दिख रही है। इसी प्रदेश में हमने किसी-किसी जिले में एक अकेले एसपी को देखा है जिसने कि राज्य शासन के किसी खास निर्देश के बिना भी अपने बूते ही जिले के सभी शहरों में हेलमेट को कामयाबी से लागू करवा दिया था। लगातार मौतों के बाद भी आज सरकार अपनी इस न्यूनतम बुनियादी जिम्मेदारी से कतरा रही है। 
हमारा मानना है कि राज्य सरकार जितना बजट सड़कों को चौड़ा बनाने में खर्च करती है, उसका एक हिस्सा अनिवार्य रूप से उन सड़कों पर तेज होने जा रहे ट्रैफिक को काबू करने के लिए रखना चाहिए। इसी तरह का हिस्सा गाडिय़ों के रजिस्ट्रेशन से मिलने वाली रकम से सीधे-सीधे अलग कर देना चाहिए, और उसे ट्रैफिक सुरक्षा के लिए देना चाहिए। आज ट्रैफिक पुलिस राजधानी में तो नजर आ जाती है, लेकिन प्रदेश के बाकी हाईवे पर उसकी मौजूदगी न के बराबर हैं। मुख्यमंत्री को बिना देर किए इसके लिए एक बैठक बुलाकर एक अभियान छेडऩा चाहिए, जिस राज्य में एक-एक नवजात शिशु को बचाने के लिए सरकार मेहनत करती है, वहां हादसों में ऐसी मौतें बहुत तकलीफदेह हैं। 

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