इंसानियत भारत-पाक सरहद की बाड़ से ऊंची

संपादकीय
25 सितंबर 2015

दस बरस का एक बच्चा पाकिस्तान से भटककर भारत पहुंच गया, और पिछले पांच बरस से यहीं फंसा हुआ है। अब कुछ लोगों की मदद से और सोशल मीडिया पर उसकी कहानी फैलने से पाकिस्तान में उसकी मां तक खबर पहुंची, और भोपाल में रह रहे इस बच्चे से मां की बात हो पाई। अब उम्मीद है कि पांच बरस बाद यह बच्चा शायद घर लौट सके। पिछले ही हफ्ते पाकिस्तान के तीन और बच्चे सरहद पर बाड़ के नीचे से भारत की तरफ दाखिल हो गए थे, और उन्हें बीएसएफ ने पकड़ा था। वे भी बहुत कम उम्र के बच्चे थे, और सरहद के दोनों तरफ थोड़ी-बहुत ऐसी आवाजाही गलती से हो जाती है। हमारे पाठकों को याद होगा कि कुछ बरस पहले इस अखबार में हमने कश्मीर के एक ऐसे बुजुर्ग को इंटरव्यू करके वह कहानी छापी थी कि किस तरह वे 15 बरस की उम्र में भारत की तरफ से पाकिस्तान दाखिल हो गए थे, और कोई कागजात, कोई शिनाख्त न होने पर वे कभी हिन्दुस्तान लौट नहीं पाए। वहीं कामकाज करने लगे, वहीं कुनबा बन गया, और अभी कुछ बरस पहले वे करीब 60 बरस बाद कश्मीर लौट पाए थे, कुछ दिनों का वीजा पाकर, बचे-खुचे परिवार से मिलने के लिए। अभी कुछ समय पहले ही भारत की एक हिन्दू लड़की की कहानी पाकिस्तान से तस्वीरों सहित छपी थी, और उसे भी भारत लाने की कोशिश चल रही है। 
इन दोनों देशों के बीच लंबी सरहद जुड़ी हुई है, लंबा इतिहास जुड़ा हुआ है, और गहरे रिश्ते भी जुड़े हुए हैं। ऐसे में गलती से सरहद पार कर लेने वाले लोगों के साथ हमदर्दी की जरूरत है। दोनों जगहों के अनगिनत लोग सरहद पार जेलों में कैद रहते हैं, उनके मरने की उम्र आ जाती है, लेकिन वे देश लौट नहीं पाते। कुछ बरस पहले की लोगों को याद होगी कि पाकिस्तान के एक बहुत ही जर्जर हो चुके बुजुर्ग प्रोफेसर को मरणासन्न हालत में भारतीय कोर्ट की इजाजत से पाकिस्तान वापिस लौटने मिला था, और यहां पर वे किसी बहुत ही मामूली से मामले में बरसों से फंसे हुए थे। पाकिस्तान की जेलों में सैकड़ों ऐसे भारतीय कैद है, और वहां पर भी कुछ नेता उनके मामलों को लगातार उठाते हैं, और दोनों देशों के बीच एक बेहतर रिश्ते के लिए कोशिश भी करते हैं। 
भारत और पाकिस्तान परंपरागत रूप से एक-दूसरे को दुश्मन भी मानते हैं, और मानने से परे हकीकत यह है कि दोनों पड़ोसी हैं। इन दोनों को सरहद की फौजी तैयारियों से परे आम इंसानों के साथ रहम का इंतजाम करना चाहिए। एक दूसरे की जमीन पर गलती से पहुंच गए लोगों को जेलों में कैद रखना बहुत ही अमानवीय है, और आपसी समझ से इसे निपटाना चाहिए। ऐसे बहुत से मामलों में जितना दर्द छिपा हुआ है, जितनी तकलीफें लोग झेल रहे हैं, उनको देखकर सआदत हसन मंटो की कहानी टोबा टेकसिंह याद आती है। और उसी कहानी जैसी दर्दनाक हालत हजारों असल जिंदगियों की भी है। जब दोनों देश एक-दूसरे के साथ बातचीत के रिश्ते भी नहीं रख पा रहे हैं, तब सरकारों और फौजों से परे, आम जिंदगी की ऐसी कहानियां दोनों देशों को करीब ला सकती हैं। पिछले बरसों में लगातार ऐसी खबरें तस्वीरों सहित छपती रही हैं कि किस तरह पाकिस्तान के बहुत से बच्चे गंभीर ऑपरेशन के लिए हिन्दुस्तान लाए जाते हैं, और यहां पर ठीक होकर वे अपने देश लौटते हैं। इसी तरह कहीं कला, कहीं संगीत, कहीं फिल्म, और कहीं टीवी पर रियलिटी शो, इन सबमें जब दोनों देशों के लोग मिलकर काम करते हैं, तो सरहद का तनाव नजरों से कुछ पल के लिए ओझल होता है। 
दरअसल दो देशों के बीच तनाव राजनीतिक कारणों से, और राजनीतिक मजबूरियों से भी होता है। और फिर फौजी ताकतें हमेशा ही जंग की बात करती हैं, क्योंकि उनको वही एक जुबान आती है। ऐसे में दोनों तरफ के अमन-पसंद लोगों को हर छोटे-छोटे इंसानी मामले में बड़ी-बड़ी दरियादिली दिखाते हुए कोशिश करनी चाहिए, और यह साबित करना चाहिए कि इंसानियत सरहद की बाड़ से बहुत अधिक ऊंची होती है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें