राज्य में महिलाओं के शोषण पर सत्ता-आयोग की खामोशी

संपादकीय
26 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ में पुलिस ने अधिकतर बड़े जुर्म सुलझाकर मुजरिमों को गिरफ्तार किया है। कुछ गिने-चुने अपराध ही ऐसे रह गए हैं जो कि सुलझे नहीं हैं, या कि जो बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। लेकिन इस बीच हर कुछ हफ्तों में ऐसी खबर आती है कि छेडख़ानी से परेशान होकर किसी लड़की ने खुदकुशी कर ली। ऐसा देश के दूसरे हिस्सों में भी होता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में जहां पुलिस कुछ मामलों में अच्छा काम कर रही है, वहीं ऐसे मामलों में समय रहते कोई कार्रवाई न करना एक निराशा पैदा करता है। पुलिस को पहली शिकायत मिलते ही इस किस्म के मामलों में लड़की या महिला को परेशान करने वालों को दबोचना चाहिए, और न्यायसंगत कार्रवाई करनी चाहिए। 
यह भी समझने की जरूरत है कि पुलिस तक अगर एक लड़की शिकायत करने के लिए पहुंच रही है, तो उसके अनुपात में शायद हजार लड़कियां ऐसी होंगी जो कि शिकायत करने का हौसला नहीं जुटा पाती होंगी। और फिर पुलिस कार्रवाई न होने से खुदकुशी की नौबत वाली एक खबर भी ऐसी हजारों लड़कियों को पुलिस के पास जाने से रोकती होगी। साथ-साथ जो ऐसे मुजरिम हैं, उनका हौसला भी  अदालत या जेल न जाकर, सजा न पाकर बढ़ते चले जाता होगा, और छेडख़ानी बढ़ते-बढ़ते बलात्कार तक पहुंचती होगी। यह नौबत बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं की जा सकती, और सरकार को यह चाहिए कि छेडख़ानी या शोषण की किसी भी शिकायत पर तुरंत कार्रवाई हो। जब सरकार बलात्कार की रिपोर्ट या खुदकुशी के बाद की जांच का इंतजार करे, तो वह सरकार जनकल्याणकारी नहीं हो सकती। छत्तीसगढ़ में ऐसी अनगिनत शिकायतों के बाद भी इसे किसी साइकिल चोरी जैसा आम जुर्म मान लिया जाता है, और इससे राज्य में लड़कियों के बीच आत्मविश्वास खड़ा नहीं हो पाता। स्कूली लड़कियों को साइकिलें बांट देने से उनका भविष्य नहीं बनता, अगर इसके साथ-साथ उन्हें सुरक्षा भी न दी जाए। 
इस राज्य में महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा के लिए जो संवैधानिक संस्थाएं हैं, वे भी दबी-दबी जुबान में ही बात करती हैं, ताकि सत्तारूढ़ लोगों को कोई असुविधा न हो। यह संवैधानिक व्यवस्था की नीयत को परास्त करने का काम है। सरकार से परे ऐसे आयोग इसीलिए बनाए जाते हैं कि वे सरकार की गलतियों, या गलत कामों पर नजर रख सकें, जवाब-तलब कर सकें, और जनता के प्रति अपनी जवाबदेही पूरी कर सकें। लेकिन अखबारों में जब ऐसी खबरें छप भी जाती हैं, तब भी इस राज्य में, और मोटे तौर पर बाकी देश में भी इन आयोगों के चेहरों पर शिकन नहीं दिखती। इनकी सक्रियता उसी समय दिखती है जब इनको मनोनीत करने वाली पार्टी सत्ता में न हो, और किसी दूसरी पार्टी का सत्ता पर कार्यकाल शुरू हो जाए। वैसे में राष्ट्रीय आयोगों से लेकर प्रदेशों के आयोगों तक पर काबिज लोग मानो विपक्ष की भूमिका निभाने लगते हैं। 
छत्तीसगढ़ के बारे में हम जोर देकर यह बात कहना चाहते हैं कि अगर बच्चों और लड़कियों-महिलाओं की शिकायतों पर, उनकी स्थिति पर अगर महिला और बाल आयोग/परिषद ध्यान नहीं देंगे, तो इतिहास भी अखबारी कतरनों के साथ-साथ इनकी गैरजिम्मेदारी को भी दर्ज करते चल रहा है। इस राज्य में सरगुजा में पुलिस ने एक नाबालिग लड़की को नक्सली कहते हुए उसके साथ बलात्कार किया, और उसकी हत्या कर दी, और सत्ता और संवैधानिक आयोग बरसों तक इस जुर्म को इसलिए छुपाते रहे कि सत्तारूढ़ पार्टी को असुविधा न हो। हमारा मानना है कि सरकार या संवैधानिक आयोगों का यह रूख अपने आप में एक बड़ा जुर्म है, और जनता को जागरूक होकर ऐसी सरकारी-संवैधानिक अमानवीयता का जमकर विरोध करना चाहिए। 


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