जनता के हक की खदानों को लेकर बहुत सावधानी जरूरी

संपादकीय
27 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ के एक सबसे बड़े उद्योग वेदांत को राजस्थान में सरकार की कुर्सियों पर बैठे लोगों ने सैकड़ों करोड़ का नाजायज फायदा पहुंचाया, और अभी वहां के एक बड़े आईएएस अफसर की गिरफ्तारी के बाद ये सारी बातें दुबारा खुलकर सामने आ रही हैं। पिछली कांग्रेस सरकार ने भी नाजायज फायदा पहुंचाया, और मौजूदा भाजपा सरकार के रहते तो खनिज भ्रष्टाचार में ये गिरफ्तारियां हुई ही हैं। यही वेदांत कंपनी छत्तीसगढ़ में बालको चलाती है जहां पर मजदूरों की बेहाली है, और इस कंपनी पर हजार एकड़ से अधिक सरकारी जमीन अवैध कब्जे का मामला बिलासपुर हाईकोर्ट पहुंचा था, और वहां पर केस हार जाने के बाद छत्तीसगढ़ सरकार उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट नहीं गई थी। ठीक ऐसा ही राजस्थान मेें वेदांत की एक कंपनी के खुदाई घोटाले में हुआ था। गहलोत-सरकार के वक्त हाईकोर्ट से सरकार ने ही वेदांत के खिलाफ अपना मामला वापिस ले लिया था, और वेदांत को 6 सौ करोड़ का नाजायज फायदा होने का मामला अभी वहां एसीबी ने सामने रखा है। 
देश के जिन प्रदेशों में खनिजों के भंडार हैं, वहीं पर जंगल भी हैं, और इनमें से कई इलाकों में नक्सली भी हैं। वहां पर आदिवासियों पर बेदखली का खतरा भी है, और कुदरत को भी नुकसान पहुंचने का। जब विकास और पर्यावरण के बीच एक टकराव चल ही रहा है, तब देश-प्रदेश की प्राकृतिक-संपदा निजी हाथों में देने के पहले सरकारों को बहुत ही बारीकी से, और बहुत ही न्यायसंगत होकर, पारदर्शी तरीके से काम करना चाहिए, क्योंकि एक बार कोई खदान या जमीन निजी हाथों में गई, तो वह जिंदगी भर के लिए गई। आज हम देख रहे हैं कि पिछली यूपीए सरकार के वक्त प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अगुवाई में, उनके कोयला मंत्री भी रहते हुए जिस तरह देश भर की कोयला खदानों को सरकार और कारोबार ने मिलकर लूटा था, वह आज अदालती कटघरे में है। जिस तरह कर्नाटक में लोहे की खदानों को लूटने वाले रेड्डी-भाईयों ने अपने सिर पर सुषमा स्वराज का हाथ रहते हुए, खुद विधायक और मंत्री रहते हुए जिस तरह की खनिज-लूटपाट की थी, उससे कर्नाटक के कुपोषण के शिकार बच्चों की मौत की गारंटी हो गई थी। 
यह हाल खनिजों वाले सभी राज्यों का है। और छत्तीसगढ़ को भी इस मामले में बहुत सावधान रहना चाहिए कि उसकी खदानें देश और प्रदेश के सबसे बेहतर हितों के साथ ही किसी को मिले। हमारा देखा हुआ है कि खदानों को बांटने की लंबी प्रक्रिया में कांग्रेस और भाजपा, केन्द्र और राज्य सरकार, अलग-अलग पार्टियों के नेता, ये सब एक भी हो जाते हैं। छत्तीसगढ़ में पुष्प स्टील को खदान देने का मामला बरसों से सुर्खियों में रहा, और भाजपा सरकार पर खदान देने का आरोप लगा, और केन्द्र में कांग्रेस के एक सबसे बड़े नेता मोतीलाल वोरा पुष्प स्टील की सिफारिश में चि_ी लिखने की तोहमत भी लगी, और वह चि_ी इसी अखबार में छपी भी थी। दरअसल खदानों और खनिज के मामले में इतनी मोटी कमाई रहती है कि नेताओं से लेकर अफसरों तक, और पार्टियों से लेकर अदालतों तक, जगह-जगह प्रभावित करने का सिलसिला चलते रहता है। ऐसे में कभी मीडिया, तो कभी कोई जनसंगठन, तो कभी कोई जनआंदोलन प्राकृतिक संपदा की लूटपाट, बंदरबांट को रोकने में असरदार भी हो पाते हैं। सूचना के अधिकार ने भारत में ऐसे मामलों में भांडाफोड़ करने का एक बड़ा काम किया है। फिर सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल तक का नजरिया खदानों और कारखानों को लेकर जनहित का रहते आया है। लेकिन राजस्थान के इस ताजा मामले को देखते हुए हम फिर छत्तीसगढ़ सरकार को आगाह करना चाहेंगे कि उसे खनिज मामलों में, जमीन और जंगल के मामले में, कारखानों और खदानों के मामले में बहुत ही सावधानी से काम करना चाहिए, क्योंकि इसमें कोई भी नाजायज फैसला इस गरीब प्रदेश के गरीब लोगों के हक को छीनकर किसी एक रईस को देने का होगा। इसमें पूरी पारदर्शिता रखी जानी चाहिए, क्योंकि जेलों में बंद आन्ध्र के रेड्डी, या केन्द्र में मंत्री रहे लोग, या अदालती कटघरे में खड़े जिंदल से लेकर मनमोहन सिंह तक, मिसाल और चेतावनी की शक्ल में सामने हैं ही। 

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