जनता परिवार बनाने का जिम्मा जिसे था, वही खम्भा खिसक गया

संपादकीय
3 सितंबर 2015

बिहार का चुनाव अभी शुरू भी नहीं हो पाया है, कि चुनावी टिकटों को लेकर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी आज के निर्माणाधीन जनता परिवार से बाहर होने की घोषणा कर चुकी है। हालांकि आज सपा का महज बयान आया है, और राजनीति में उलट-पुलट होते रहता है, लेकिन फिर भी यह तनातनी कुछ दिनों से दिख रही थी, और मुलायम सिंह के ताजा-ताजा समधी बने लालू यादव के बिहार के गठबंधन में रहते हुए भी अगर मुलायम की पार्टी को अपनी हेठी दिख रही है, तो यह छोटी बात नहीं है। यह नजारा कुछ वैसा ही है कि इमारत की छत ढलने के पहले ही छड़ों और कांक्रीट को लेकर ढलती हुई छत गिर पड़े। और मजा यह है कि इसमें भाजपा का कोई योगदान भी नहीं है। यह समाजवादी होने का दावा करने वाली पार्टियों के बीच की घरेलू लड़ाई है, और जो कि बिहार में भाजपा के फायदे की नौबत दिखा रही है। एक तरफ तो बिहार के चुनाव में देश की सबसे बड़ी खालिस मुस्लिम पार्टी के नेता ओवैसी अपने दम पर उतरने की घोषणा कर चुके हैं, और इसे लेकर कांग्रेस के दिग्विजय सिंह ने आरोप भी जड़ दिया है कि ओवैसी भाजपा के पैसों से यह राजनीति कर रहे हैं, ताकि भाजपा को फायदा हो सके। यह बात सच-झूठ जो भी हो, मुलायम सिंह के बारे में तो दिग्विजय सिंह या कांग्रेस ऐसी बात भी नहीं कह सकते कि मुलायम ने भाजपा से पैसा लेकर जनता परिवार को तोड़ दिया। 
जनता परिवार देश में एक तीसरे विकल्प की संभावना रखता था, और जमीन पर आने के पहले ही यह बिखर गया। इसकी एक वजह यह है कि बिहार में लालू यादव, और उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव, पिछड़ों की, और पिछड़ों में भी यादवों की राजनीति करने वाले, अभी-अभी समधी बने ये दोनों नेता, अपनी पार्टियों को अपनी जूतियों की तरह इस्तेमाल करते हैं। दोनों ही का इतिहास और वर्तमान अदालतों के कटघरों तक पहुंची हुई अनुपातहीन संपत्ति का है, और दोनों के मन में समाजवाद या लोकतंत्र की जगह महज कुनबापरस्ती ठूंस-ठूंसकर भरी हुई है। फिर बिहार की सत्ता और राजनीति से लालू यादव को वोटरों ने उसी अंदाज में खदेड़ दिया था जिस अंदाज में कोई किसान अपने खेत में नाजायज घुस आई भैंस को खदेड़ देता है। ऐेसे में लालू यादव को जब बिहार में धर्मनिरपेक्षता की आड़ में नीतीश कुमार के साथ एक गाड़ी पर सवार होने मिला, तो उनके लिए वही बहुत था। अपने बाद वे अपने समधी मुलायम सिंह यादव को भी इस बस में पांच से अधिक सीटें दिलाने की औकात नहीं रखते थे। लालू आज बिहार में जो कुछ भी करना चाहते हैं उसके लिए उनको नीतीश कुमार की पीठ पर सवार होकर ही आगे बढऩे का मौका मिल रहा है, और भैंस की पीठ पर दो लोगों का सवार होना कुछ मुश्किल होता है। इसलिए मुलायम की नौबत बिहार विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे में बेइज्जती की रही, टिकटें कम मिलीं, बेइज्जती अधिक मिली। 
दूसरी तरफ अब तक बिहार में पूरी सीटों पर लडऩे वाले लालू यादव, और उनके परंपरागत दुश्मन रहे जदयू के नीतीश कुमार भी पूरी सीटों पर लडऩे वाली पार्टी के अकेले सीएम-चेहरा रहते आए हैं। अब जब इन दोनों को सौ-सौ सीटों का बंटवारा बर्दाश्त करना पड़ रहा है, तो तकरीबन हर सीट पर इनमें से किसी एक पार्टी, या दोनों ही पार्टियों के बागियों को झेलने की मजबूरी भी इनके सामने रहेगी। फिर इनके साथ गठबंधन में कांग्रेस को 40 टिकटें दी गई हैं, और वहां भी इन दोनों ही पार्टियों के बागी होने का एक बड़ा खतरा है। बचा-खुचा माहौल खराब करने के लिए मुस्लिम सीटों पर लडऩे के लिए ओवैसी हैदराबाद से अपना लश्कर लेकर रवाना हो चुके हैं। ऐसे में भारतीय जनता पार्टी अकेली ऐसी पार्टी है जो कि वहां की अधिकतर सीटों पर लडऩे का हक रखती है, और अधिकतर सीटों पर उसे ही टिकट मिलने वाली है। एनडीए के उसके पासवान जैसे साथी बड़े छोटे दावे वाले हैं, और एनडीए में कोई फूट अब तक नजर नहीं आ रही है। आज समाजवादी पार्टी की जनता परिवार से बगावत इस बात से जोड़कर देखना भी जरूरी है कि इस पूरे परिवार ने सपा के मुखिया मुलायम सिंह यादव को भी इस परिवार को एक पार्टी बनाने के लिए पूरे अधिकार दे दिए थे। अब वे ही अपना खम्भा खींचकर इस ढलती हुई छत को गिराकर खिसक लिए हैं।

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