लोकतंत्र के स्तंभों को काटकर भट्टी जलाने पर आमादा लोग

संपादकीय
28 सितंबर 2015

राहुल गांधी एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने अमरीका गए, तो भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता टीवी समाचार चैनलों पर सौ तरह से यह साबित करने में लग गए कि राहुल जिस कार्यक्रम में गए हैं, वह कार्यक्रम तो जुलाई में ही हो चुका है, और कांग्रेस अपने नेता के बारे में झूठ बोल रही है। यह बहस खासी लंबी चली, और भाजपा के प्रवक्ताओं का हाल यह था कि वे अपने नेता, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अमरीका दौरे के बजाय राहुल के अमरीका-दौरा न होने का दावा करने में अधिक मेहनत करते दिखे। इसके जवाब में आज राहुल गांधी की तरफ से ट्विटर पर उनके उस कार्यक्रम में मौजूदगी की कई तस्वीरें पोस्ट की गई। 
एक लोकतंत्र में राष्ट्रीय पार्टियों का यह रवैया ठीक नहीं है। इतनी राजनीतिक बात तो ठीक रहती कि क्या राहुल गांधी को बिहार चुनाव के वक्त चुनाव प्रचार से अलग रखने के लिए उनको अमरीका भेजा गया है? लेकिन यह बात नाजायज है कि कोई पार्टी अपने नेता के बारे में एक औपचारिक बयान दे रही है, और बिना किसी सुबूत के विरोधी पार्टी उसे झूठ करार देने के लिए जान लगा दे। आज अगर कांग्रेस की पोस्ट की गई तस्वीरें झूठी नहीं हैं, तो बोलचाल की जुबान में यह पूछा जा सकता है कि भाजपा के दिग्गज प्रवक्ता अपने कहे हुए झूठ का अब क्या करेंगे? और यह बात सिर्फ इसी एक मामले को लेकर नहीं है, भारतीय राजनीति में बहुत सी पार्टियों के बीच, और बहुत से नेताओं के बीच एक रासायनिक-दुश्मनी दिखाई पड़ती है। यह दुश्मनी इंसानी दुश्मनी से बहुत अधिक है, और ऐसा लगता है कि दो रसायन एक-दूसरे को बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं, या जिस तरह चुम्बक के दो एक जैसे ध्रुव एक-दूसरे को दूर ही धकेलते हैं, आसपास रहने की कोई वैज्ञानिक संभावना नहीं रहती। 
यह सिलसिला इस लोकतंत्र को गड्ढे में धकेल रहा है। जिस लोकतंत्र में संसद के भीतर देश के हित में मिलकर बात करने, बहस करने, और फिर जनहित के फैसले लेने की उम्मीद की जाती है, उस लोकतंत्र में पिछले कई बरसों से हम एक ऐसा अंतहीन टकराव देख रहे हैं, जो सिर्फ बढ़ते दिख रहा है। यह लोकतंत्र नहीं है, और यह संसदीय लोकतंत्र नहीं है। दूसरी बात यह कि कांग्रेस हो या भाजपा, या कि कोई और पार्टी, आज समकालीन राजनीतिक इतिहास लगातार दर्ज हो रहा है, और ऐसे में भी भारतीय राजनीतिक दलों को अपना नाम कालिख से लिखे जाने का कोई डर दिखाई नहीं पड़ रहा है। देश जाए भाड़ में, लेकिन अगर विपक्षी पार्टी या विरोधी नेता को भाड़ में झोंकने के लिए साथ में बंधा हुआ देश भी जा रहा हो, तो भी किसी को इससे परहेज नहीं दिख रहा है। ऐसे में जब भारत के लोग इस देश को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र करार देते हैं, तो यह दुनिया की सबसे बड़ी भीड़ तो कही जा सकती है, इसे लोकतंत्र कहना अब जायज नहीं लग रहा है। लोकतंत्र महज चुनावों की निरंतरता का नाम नहीं हो सकता, लोकतंत्र उससे बढ़कर है, और भारत में आज साम्प्रदायिक बातें, सरकार और संसद का टकराव, अदालत का बेअसर हो जाना, और मीडिया का बाजारू हो जाना, ये तमाम बातें इस लोकतंत्र के नाकामयाब हो जाने के मजबूत सुबूत हैं। लेकिन इस नौबत से उबरना इसलिए आसान नहीं दिख रहा है क्योंकि लोग एक-दूसरे को आग में झोंकने के लिए लोकतंत्र के स्तंभों को काटकर भट्टी जलाने पर आमादा दिख रहे हैं। 

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