दिग्विजय सिंह की निजी जिंदगी, कितनी निजी, कितनी सार्वजनिक

7 सितंबर 2015
संपादकीय
कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव, और अविभाजित मध्यप्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह की शादी की खबर ने सोशल मीडिया पर उनके अनगिनत, आमतौर पर महत्वहीन, और बहुत से मामलों में बेचेहरा आलोचकों को उनके बारे में गंदी बातें लिखने का एक मौका दे दिया। भारतीय राजनीति में अभी गनीमत यह है कि किसी बड़े नेता ने कोई ओछी बात इस बारे में नहीं कही है, और यह काम सिर्फ ओछे लोगों के लिए छोड़ दिया है। फिर भी इस बारे में आज यहां कुछ चर्चा की जरूरत इसलिए है कि सार्वजनिक और निजी जीवन के कुछ मुद्दों पर बातचीत ऐसे ही मौकों पर हो पाती है, या ऐसे मौकों पर होनी चाहिए। 
दिग्विजय सिंह भाजपा और मोदी, आरएसएस और हिन्दू-साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ अपने स्थायी और लगातार हमलावर तेवरों के चलते इन तमाम तबकों के हमलों के शिकार भी रहते हैं, और जहां तक वैचारिक धरातल पर गाली-गलौज का सवाल है, तो वह भी एक बार सोशल मीडिया पर खप जाती है, और दिग्विजय सिंह का बर्दाश्त कमाल का है कि वे अपने फेसबुक पेज पर, ट्विटर पेज पर उन्हें पिगविजय, या डॉगविजय लिखने वालों को भी नहीं मिटाते हैं। और यह अच्छा इसलिए है कि उनके आलोचकों की सोच का स्तर ऐसी गालियों से साबित होता है, और इन हमलों से कोई इंसान सुअर या कुत्ता साबित नहीं होता। लेकिन लोगों को याद होगा कि जब दिग्विजय सिंह और उनकी महिला मित्र की अंतरंग तस्वीरें पिछले बरस सोशल मीडिया पर आईं, तो उन तस्वीरों को लेकर उनके आलोचकों ने अपनी सभी तरह की कुंठित यौन भावनाएं खुलकर उजागर की थीं। किसी ने दोनों के उम्र के फासले को लेकर लिखा था, किसी ने कुछ और लिखा था, लेकिन किसी व्यक्ति की निजी जिंदगी की निजता के हक के बारे में लिखने वाले भी गंभीर लोग कम नहीं थे। उन हमलों से दिग्विजय सिंह का नुकसान जरा भी नहीं हुआ था, और समझदार लोगों ने यह जान लिया था कि किसी के फोन या इंटरनेट खातों की हैकिंग करके, उनमें से तस्वीरें चुराकर, उन्हें सोशल मीडिया पर फैलाना एक जुर्म है, न कि अपनी अंतरंग तस्वीरों को अपने पास सम्हालकर रखना। जिन लोगों को दिग्विजय और उनकी मित्र मुजरिम लगे थे, उन लोगों की समझ अपने आप उजागर हो गई थी, और अभी शादी की खबर की पुष्टि के साथ दिग्विजय की पत्नी ने लोगों की ऐसी हैकिंग के जुर्म के बारे में कड़े शब्दों में अपनी बात लिखी, तो समझदार लोग उनसे सहमत भी हुए। 
हर इंसान के जिंदगी के बहुत से ऐसे अंतरंग पल रहते हैं, जिनको चोरी करके दूसरों के सामने उजागर करके उनका जीना हराम किया जा सकता है। लेकिन ऐसे मामलों में हैकर मुजरिम होते हैं, अपनी निजी जिंदगी में बिना किसी जुर्म के वक्त गुजारने वाले लोग मुजरिम नहीं होते। लेकिन हिन्दुस्तान का इतिहास ऐसी चोरी के मामले में पहले से संपन्न रहा है। लोगों को याद होगा कि इमरजेंसी के वक्त मेनका गांधी एक अंग्रेजी पत्रिका सूर्या प्रकाशित करती थीं, और उसका संपादन भी करती थी। इस दौर में कांग्रेस का साथ छोड़कर बाबू जगजीवन राम विपक्ष के साथ जा रहे थे, और उन्हें ब्लैकमेल करने की खुली नीयत के साथ मेनका गांधी की पत्रिका ने जगजीवन राम के गैरराजनीतिक बेटे सुरेश राम और उनकी महिला मित्र की घर के भीतर की, बाथरूम की अंतरंग तस्वीरों से एक पूरा अंक ही भर डाला था। आज का कानून अगर होता, तो मेनका गांधी कुछ देर में ही गिरफ्तार हो चुकी रहतीं, लेकिन उस वक्त तो कानून मेनका के पति संजय गांधी की मनमर्जी थी, और देश में किसी और का कोई हक रह नहीं गया था। यह एक बड़ी विचित्र नौबत है कि उस वक्त की इमरजेंसी की राजकुमारी मेनका आज भाजपा में अपने बेटे के साथ सांसद भी हैं, और मंत्री भी हैं। दूसरी तरफ उस वक्त की कांग्रेस पार्टी के दिग्विजय सिंह आज ऐसी हैकिंग का शिकार हुए हैं। 
सार्वजनिक जीवन में रहने से लोग अपने सार्वजनिक पहलू के लिए, अपने सार्वजनिक चाल-चलन के लिए, सार्वजनिक अधिकारों के इस्तेमाल से होने वाले अच्छे या बुरे काम के लिए तो जमाने के प्रति जवाबदेह रहते हैं, लेकिन निहायत निजी जिंदगी को लेकर भी कोई यह सोचे कि सार्वजनिक जीवन में आने से लोगों की निजी जिंदगी का हक खत्म हो जाता है, तो यह एक बहुत ही असभ्य सोच है, और किसी न्यायप्रिय समाज या व्यवस्था में ऐसी सोच की कोई जगह नहीं हो सकती। 
दिग्विजय सिंह के खिलाफ वैचारिक लड़ाई की कमजोरी भी ऐसे ओछे हमलों से साबित होती है, और यह देश के लोकतंत्र की सेहत के लिए भी अच्छी बात नहीं है। इस मौके पर यह चर्चा भी जरूरी है कि उनके कई आलोचकों ने यह सवाल उठाया है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, और उनकी पत्नी जशोदा बेन के संबंधों, और साथ रहने, या न रहने को लेकर दिग्विजय सिंह ने बहुत से बयान दिए थे, तो वे आज खुद उनके प्रेम-प्रसंग, या उनकी शादी को लेकर लोगों की आलोचना से परे कैसे रह सकते हैं। यहां पर एक फर्क को समझना न्याय की समझ के लिए बेहतर होगा। नरेन्द्र मोदी और उनकी पत्नी का मामला उनके चुनाव घोषणा पत्र से शुरू हुआ था, और उनकी पत्नी के सरकार तक पहुंचने की वजह से आगे बढ़ा था, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री की पत्नी होने के नाते सहूलियतों की बात उठाई थी। यह पूरा का पूरा मामला किसी की निजी जिंदगी में चोरी या घुसपैठ से नहीं उपजा था, पति-पत्नी दोनों के सार्वजनिक घोषणा पत्र या बयान, या सरकार को लिखी चि_ी से उठा था, और इन दोनों के बीच कुछ मुद्दों पर विरोधाभास दिखने की वजह से मामला आगे बढ़ा था। दिग्विजय सिंह के बंद कमरे के निजी संबंधों की तस्वीरों की चोरी करके उनके खिलाफ प्रचार करना इस तरह का मामला नहीं था। किसी भी सभ्य समाज को ऐसी बारीकियों को सीखना चाहिए, उसके बिना उसकी सीख अधूरी ही रह जाती है। 

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