ऐसी सरकारी व्यवस्था में गरीब की मौत ही है

15 सितंबर 2015
संपादकीय

देश की राजधानी दिल्ली में होने वाली कोई भी बात अनुपात से अधिक महत्व पाती है। यहीं पर केंद्र और इस राज्य की सरकारें बैठी हैं, देश की सबसे बड़ी अदालत बैठी है, देश की संसद बैठी है, तमाम तरह के संवैधानिक राष्ट्रीय आयोग यहीं बैठे हैं, देश के मीडिया का एक बड़ा हिस्सा यहीं बैठा है, और दुनिया के तमाम देशों के कूटनीतिक दफ्तर देश के इसी शहर में हैं। ऐसे में यहां होने वाली हर बात का अधिक महत्व पाना स्वाभाविक है, और बात-बात पर दिल्ली मिसाल बनने लगती है। 
यहां डेंगू से पीडि़त एक बच्चे को दो अस्पतालों ने दाखिल करने से मना कर दिया, उसकी मौत हो गई, और तकलीफ बर्दाश्त न कर पाने वाले मां-बाप ने खुदकुशी कर ली। नतीजा यह हुआ कि एकाएक देश-प्रदेश के नेताओं को, और मीडिया को यह ध्यान आया कि दिल्ली में सरकारी जमीन जिन शर्तों पर बड़े-बड़े अस्पतालों को दी गई थी, उन शर्तों के तहत गरीबों के इलाज की जिम्मेदारी इनमें से कोई पूरी नहीं कर रहा है। खबरों से हिली हुई सरकार ने कई किस्म की जांच शुरू कर दीं, और अब अस्पतालों से हुए अनुबंध देखे जा रहे हैं। 
लेकिन यह हाल तो निजी इलाज करने वाले तमाम अस्पतालों का है। वे कहीं सरकारी जमीन रियायत पर पाकर इमारत बनाते हैं, कहीं पर वे सरकारी कर्मचारियों के इलाज के लिए सरकारी मान्यता पाकर अरबों रुपये सालाना का सरकारी भुगतान पाते हैं, और कहीं पर वे सरकारी बीमा योजना के तहत गरीबों का इलाज करके मोटी कमाई करते हैं। छत्तीसगढ़ में इनमें से हर किस्म की रियायतों या फायदे पाने वाले अस्पतालों का बुरा हाल दर्ज किया है। इलाज-बीमा के कार्ड वाले गरीबों के गर्भाशय जवानी में ही निकाल-फेंक दिए गए, क्योंकि इन गरीबों के कार्ड पर अभी रकम बची हुई थी, और अस्पताल उसे लूटने के लिए उनके बदन को काटकर फेंकने पर भी उतारू हो गए। लेकिन ऐसा करने वाले अस्पताल और डॉक्टर सरकार की बड़ी रियायती कार्रवाई पाकर बच गए हैं, और लूटपाट के कई और तरीके ईजाद करने  में लग गए हैं। इनकी मदद करने के लिए छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में बड़े से बड़े सरकारी अस्पताल अपने-आपको बदहाल करने में लगे हुए हैं ताकि महंगे निजी अस्पताल चल सकें। हैरान-परेशान मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने अभी इलाज के लिए गरीबों को सरकारी रकम मंजूर करते-करते थकने के बाद रायपुर मेडिकल कॉलेज अस्पताल के डॉक्टरों को बुलाकर पूछा कि जब कैंसर जैसी हर बीमारी का इलाज इस अस्पताल में है, तो सरकारी मदद पाने वाले लोग निजी अस्पतालों में जाने को क्यों मजबूर होते हैं? 
इस सवाल का एक आसान जवाब है, जो कि हिंदुस्तान की पढ़ाई और इलाज की बहुत सी बीमारियों का इलाज भी है। इस देश में सत्ता पर बैठे ताकतवर लोगों और उनके परिवारों की पढ़ाई से लेकर उनके इलाज तक के लिए महंगे निजी स्कूल-कॉलेज और अस्पतालों तक दौड़ लगती है। अभी कुछ हफ्ते पहले इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तरप्रदेश सरकार को हुक्म दिया है कि सभी मंत्रियों-अफसरों के बच्चों को निजी स्कूलों से हटाकर सरकारी स्कूलों में दाखिल किया जाए। यह बात हर उस बीमारी के इलाज पर भी लागू होनी चाहिए जो कि सरकारी अस्पतालों में ठीक की जा सकती हैं। आज पूरे देश में केंद्र और राज्य सरकारों, संसद और अदालतों के लोगों का निजी अस्पतालों में ऐसे इलाज के लिए भी रात-दिन जाना होता है जो कि सरकारी अस्पताल में हो सकते हैं। अगर सत्ता के लोग अपने परिवार के साथ सरकारी अस्पतालों में जाएं, तो सरकारी अस्पतालों की हालत सुधर जाएगी। आज सरकारी पैसों से बड़े-बड़े निजी अस्पतालों को खड़ा करना, और उनका कारोबार बढ़ाना समझदारी नहीं है। यह पूंजीवादी व्यवस्था अमरीका से लेकर ब्रिटेन तक गरीबों का इलाज छीन चुकी है, और बड़ी-बड़ी बीमा कंपनियों, और बड़े-बड़े अस्पतालों की मुनाफाखोरी का कारोबार बढ़ा रही है। यह सिलसिला थमना चाहिए। शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी जिम्मेदारी से सरकार को बचना नहीं चाहिए। लेकिन सरकार ऐसे विभागों को चलाना नहीं चाहती है, यहां पर बदहाल को ठीक करने में अधिक मेहनत लगती है। सरकार की दिलचस्पी ऐसे कामों में रहती है जिनमें आनन-फानन महंगे सामानों की खरीदी करके कमाई की जा सकती है। ऐसी व्यवस्था में गरीब की मौत ही है, फिर चाहे वह गर्भाशय निकालने की साजिश हो, या लापरवाह-नसबंदी हो, या फिर दिल्ली में डेंगू के शिकार बच्चे की मौत और उसके मां-बाप की खुदकुशी हो।

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