मुखिया का बर्दाश्त मौन सहमति के अलावा और कुछ नहीं

संपादकीय
30 सितंबर 2015

उत्तरप्रदेश में दिल्ली के करीब के एक गांव में सोचे-समझे तरीके से हिन्दुओं को यह कहकर भड़काया गया कि गांव के एक मुस्लिम परिवार के लोग गोमांस खा रहे हैं। नौ हजार हिन्दू आबादी के गांव में कुल दो मुस्लिम परिवार थे, और मंदिर से लाउडस्पीकर पर लोगों को उकसाकर, भड़काकर इस घर पर हमला करने भेजा गया, और लोगों ने जाकर घर के बुजुर्ग को बाहर निकाला और सड़क पर पीट-पीटकर मार डाला। आज देश भर में गोमांस को लेकर, मांसाहार को लेकर, जिस तरह की एक हिंसक-धर्मान्धता फैलाई जा रही है, यह उसका एक नतीजा है। लगातार हिन्दू समाज का एक बहुत छोटा तबका गोवंश के पशुओं के मांस के खिलाफ अभियान चला रहा है, और मांसाहार के खिलाफ भी तरह-तरह की रोक के कानून बन रहे हैं, देश में एक शुद्धतावादी, पुरातनपंथी, और फर्जी संस्कृति लादने के लिए हिंसा का खुलकर इस्तेमाल हो रहा है। ऐसा साबित करने की कोशिश हो रही है कि हिन्दू समाज मांसाहारी नहीं था, या हिन्दू समाज में गोमांस कभी खाया नहीं जाता था। खानपान को धर्म से जोड़कर हमले किए जा रहे हैं, मुस्लिमों और ईसाईयों को निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन यह बात शुद्धतावादी अनदेखी कर रहे हैं कि हिन्दू समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा मांसाहारी है, और देश के आधे से अधिक हिस्से में ये हिन्दू गोवंश के मांस को भी खाते आए हैं। इस तरह आज हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति, हिन्दुस्तानी संस्कृति के ठेकेदार बने हुए मु_ी भर सवर्ण, ब्राम्हणवादी, शुद्धतावादी, और हिंसक-हमलावर लोग खानपान की अपनी सोच को बाकी देश पर थोपने पर आमादा हैं। 
यह लोकतंत्र के लिए एक भयानक नौबत है, और इसका खुलकर विरोध भी हो रहा है। गोमांस खाने वाले हिन्दू समाज के बहुत बड़े हिस्से की सामाजिक-आर्थिक कमजोरी, उनका अछूत या पिछड़ा कहा जाने वाला, माना जाने वाला दर्जा, उनको खुलकर विरोध करने से रोक रहा है। फिर भी मद्रास हाईकोर्ट के वकीलों से लेकर दूसरी कई जगहों तक लोगों ने सार्वजनिक रूप से गोमांस खाकर खानपान पर काबू की सोच का विरोध जाहिर किया है। लेकिन मोदी सरकार आने के बाद साम्प्रदायिक लोगों के एक बड़े तबके को ऐसा लगने लगा है कि उनकी नफरत और उनकी हिंसा के अच्छे दिन आ गए हैं। जिन राज्यों में भाजपा की सरकार है वहां पर गोवंश के मांस को लेकर तरह-तरह के नए कानून बन रहे हैं, या उन पर कड़ाई से अमल हो रहा है। इससे परे भी पूरे देश में तालिबानी अंदाज में हिन्दू समाज के ऐसे हिंसक हिस्से फतवे जारी कर रहे हैं, और जगह-जगह साम्प्रदायिक तनाव खड़ा हो रहा है। अभी दो दिन पहले ही भाजपा शासित झारखंड की राजधानी रांची में मांस के एक टुकड़े को लेकर भारी हिंसा हुई, और मुख्यमंत्री को सड़कों पर निकलकर लोगों से अमन की अपील करनी पड़ी। 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पूरी दुनिया में घूमकर भारत की चाहे जैसी डिजिटल छवि  पेश करने की कोशिश करें, आज के डिजिटल युग में अमरीका में बसे हुए हर भारतवंशी ने अब तक दिल्ली के बगल के गांव की कल की यह खबर पढ़ ली होगी कि किस तरह गोमांस के शक में, बिना किसी सुबूत के लोगों ने एक मुस्लिम बुजुर्ग को घर से निकालकर पीट-पीटकर मार डाला। जिन देशों में मोदी भारत में पूंजीनिवेश की संभावनाओं को बेचना चाहते हैं, वे तमाम देश पढ़े-लिखे हैं, और इस तरह की साम्प्रदायिकता की वहां पर कोई जगह नहीं है। मोदी सरकार की सोच, और साम्प्रदायिकता के लिए उसके बर्दाश्त में एक बड़ा विरोधाभास है। मोदी के मंत्रियों से लेकर मोदी की पार्टी के नेताओं तक, और मोदी के पार्टी की राज्य सरकारों तक, साम्प्रदायिकता को जगह-जगह बर्दाश्त किया जा रहा है, बढ़ावा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी पता नहीं कैसे भारत की जाति व्यवस्था का यह सच भूल जा रहे हैं कि देश की शायद तीन चौथाई हिन्दू आबादी में आधे से अधिक तबका ऐसा है जो न सिर्फ मांसाहारी है, बल्कि जिसे गोवंश के मांस से कोई परहेज नहीं है। और जब हिन्दुओं में मांसाहार की बात करें, तो शायद तीन चौथाई से अधिक हिन्दू मांसाहारी हैं। ऐसी तमाम हिंसक-साम्प्रदायिकता से मोदी सरकार और भाजपा का जनाधार भी खिसक रहा है, और यह बात अभी खुलकर दिखाई इसलिए नहीं पड़ रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी कोई चुनाव नहीं हो रहे हैं। 
भाजपा और उसके सहयोगी संगठन अगर देश में इसी तरह से कट्टरपंथ और अवैज्ञानिक बातों को बढ़ावा देते चलेंगे, तो वे आने वाली कई पीढिय़ों के लिए इस देश की वैज्ञानिक सोच, और तर्कशक्ति को खत्म करने का जुर्म भी कर रहे हैं। आज दुनिया में जो भी देश विकसित हो रहे हैं, वे ऐसे सामाजिक नुकसान के साथ विकास नहीं कर रहे। मोदी एक तरफ तो देश की अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे दिन लाने की बात कर रहे हैं, और दूसरी तरफ अपने साथियों की हर किस्म की साम्प्रदायिकता और धर्मान्धता को बर्दाश्त कर रहे हैं। मुखिया का बर्दाश्त करना मौन सहमति के अलावा और कुछ नहीं होता। 
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