स्मार्ट सिटी को क्या मिलेगा, और बाकी देश का क्या हाल रहेगा?

संपादकीय
29 अगस्त 2015

देश भर में सौ स्मार्ट सिटी बनाने का हल्ला मोदी सरकार के बनते ही शुरू हुआ था, और अब यह लिस्ट तकरीबन पूरी ही सामने आ गई है। इन शहरों के लिए पांच बरस तक सौ-सौ करोड़ रूपए हर बरस केन्द्र सरकार देगी, और इतनी ही रकम राज्य सरकार को खर्च करनी पड़ेगी। वैसे तो देश और प्रदेशों के बजट के मुताबिक हर राज्य में ऐसे दो-चार, या उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में दर्जन भर, स्मार्ट शहर बनने में कोई बहुत बड़ा बोझ नहीं आ रहा है, लेकिन फिर भी इससे जुड़ा एक मुद्दा है जो फिक्र खड़ी करता है। आज पूरे देश में गांवों से लेकर कस्बों तक, और शहरों तक के ढांचों में सबसे गरीब तबके का हाल सबसे खराब है। उनकी बस्तियों की हालत बीमारी की जड़ भी है, और उनकी बस्तियों से परे शहर-कस्बे के बाकी इलाकों में गंदगी की बदहाली भी देखने लायक है। लेकिन केन्द्र सरकार की अनगिनत योजनाओं के चलते हुए भी राज्य अपने गांव, कस्बे, शहर सुधार नहीं पा रहे हैं। मौजूदा बदहाली को सुधारने के बजाय यह हमेशा आसान रहता है कि कोई नया शहर बसा देना। इसमें आसानी के अलावा फायदा भी रहता है कि बड़े-बड़े ढांचों के काम में बड़ी-बड़ी कमाई भी होती है। लेकिन एक बुनियादी सवाल यह उठता है कि देश के भीतर सुविधाओं के ऐसे छोटे-छोटे टापू बना देने से, गंदगी से बजबजाते बाकी देश का क्या भला होगा, और असमानता के ऐसे दायरे बना देने से लोग क्या सोचेंगे? 
लोगों को याद होगा कि कुछ बरस पहले तब के राष्ट्रपति रहे डॉ. अब्दुल कलाम ने गांवों को शहरी सुविधाएं देने की एक सोच सामने रखी थी, और उनके प्रति सम्मान दिखाते हुए राज्यों में ऐसे गांव छांटे भी थे। लेकिन उनका कार्यकाल पूरा होने तक, पुरा नाम के ऐसे गांव खो गए। न ऐसे गांव बने, और न ही आज कोई इनका नामलेवा बचा है। यह दरअसल एक ओहदे के मन की बात थी, और उसका योजनाओं की समझ से कोई लेना-देना नहीं था। डॉ. अब्दुल कलाम की समझ मिसाइल टेक्नालॉजी की थी, लेकिन उन्होंने अपने दायरे से बाहर जाकर ग्रामीण-विकास के बारे में यह बात कही थी, और वह एक गैरजरूरी कोशिश थी, जिसके बारे में हमने उस वक्त इसी कॉलम में लिखा था। लेकिन बड़ा ओहदा एक बड़ा अहंकार भी दे जाता है, और अपनी तमाम विनम्रता के साथ भी, लोग अपनी समझ से परे की बातें करने लगते हैं। हमको लगता है कि सौ स्मार्ट सिटी वाली सोच किसी शहरी योजना शास्त्री की समझ से नहीं उपजी थी, और वह एक राजनीतिक इच्छा थी, और आज देश भर में सौ जगहों पर उसी का प्रयोग होने जा रहा है। 
शहरीकरण की योजनाओं के कुछ विशेषज्ञ और जानकार यह मानते हैं कि यह भारतीय परिस्थितियों में एक बिल्कुल ही गैरबराबरी की सोच को आगे बढ़ाने वाली योजना है, जिसमें बुनियादी कमियों और खामियों से गुजरते हुए बाकी देश को छोड़कर शहरीकरण के ऐसे प्रयोग किए जा रहे हैं, जिनकी सुविधाएं बाकी देश शायद सौ बरस भी नहीं पा सकेगा। इसके अलावा एक दूसरी बात यह है कि केन्द्र सरकार की सैकड़ों शर्तों की लंबी लिस्ट को पूरा करने की मजबूरी के साथ-साथ राज्यों को केन्द्र जितनी ही रकम अपनी जेब से खर्च करनी पड़ेगी, और यह प्रयोग राज्यों के, या शहरों के अधिक फायदे का नहीं रहेगा, ऐसा भी जानकार लोगों का मानना है। स्मार्ट सिटी के नाम पर कुछ इस तरह का हल्ला देश में हुआ कि अब देश में हॉंगकांग या सिंगापुर किस्म के कुछ शहर बन जाएंगे। हकीकत यह है कि दस लाख की आबादी के शहर में भी पांच सौ करोड़ रूपए सालाना कहां घुस जाते हैं, यह पता भी नहीं लगता। इसलिए स्मार्ट सिटी की पूरी योजना एक प्रयोग से अधिक कुछ नहीं है, और शहरी विकास के एक प्रयोग के रूप में ही यह महत्वपूर्ण है। 
देश में जब हर मामले के बड़े-बड़े विशेषज्ञ मौजूद हैं, तब उनकी राय से ही योजनाएं बननी चाहिए। आज एक तरफ तो डिजिटल भारत के नाम का भी ऐसा ही हल्ला चल रहा है, और दूसरी तरफ प्रधानमंत्री के स्तर से बार-बार यह बात कही जा रही है कि देश भर में कॉल-ड्रॉप की भयानक हो चुकी दिक्कत को तुरंत दूर किया जाए। इससे रोजाना देश के मोबाइल फोन ग्राहकों को सैंकड़ों करोड़ रूपए का चूना लगाया जा रहा है, और केन्द्र सरकार की संस्था मोबाइल कंपनियों को पचास-पचास करोड़ रूपए जुर्माना लगाने की बड़ी लुभावनी चेतावनी दे रही है। नारों के बीच केन्द्र और राज्य सरकारों की योजनाओं का दीवाला निकला हुआ है उस पर कल ही सुप्रीम कोर्ट ने केन्द्र सरकार को लताड़ लगाई है कि बच्चों की भलाई की योजनाओं को तो बड़ी मेहनत से बनाया गया है, लेकिन उन पर अमल के मामले में देश में कुछ भी नहीं हो रहा है। हर प्रदेश के कुछ-कुछ शहरों के लिए स्मार्ट सिटी ऐसी ही एक सनसनी लेकर आई है, लेकिन वह किसी कोल्डड्रिंक की बोतल से निकलने वाली गैस की तरह जल्द ही बैठकर बुलबुले खत्म कर देगी। 

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