बचपन की हिंसा के शिकार बड़े होकर बनते हैं मुजरिम

31 अगस्त 2015
संपादकीय

इन दिनों लगातार खबरों में अपनी ही बेटी की हत्या में फंसी मुम्बई की एक चर्चित कारोबारी महिला इंद्राणी मुखर्जी छाई हुई है। लेकिन इस हत्या के बारे में लिखने का हमारा कोई इरादा नहीं है, लेकिन इस जुर्म और इस परिवार से जुड़ी हुई बहुत सी ऐसी बातें हैं जो मानवीय-सामाजिक संबंधों की विसंगतियों को बताती हैं और उन पर सोचना जरूरी है। इस परिवार और इस जुर्म से जुड़ी हुई हर छोटी-छोटी बात खबरों में है, और इसी के तहत यह जानकारी भी सामने आई है कि आज अपनी ही बेटी की हत्या में जो महिला फंसी है, उसे बचपन में किस तरह अपने ही चाचा-सौतेले पिता के बलात्कार का शिकार होते रहना पड़ा था। और इस तरह की बचपन की हिंसा आज न सिर्फ हिन्दुस्तान में, बल्कि दुनिया में अधिकतर देशों में बच्चों को झेलनी पड़ती हैं, और कुछ बहुत ही सभ्य देश ऐसे हैं जो अपने बच्चों को भविष्य मानकर चलते हैं, और उनके वर्तमान का बहुत ही ख्याल रखते हैं। 
हम इस एक जुर्म की बात नहीं कर रहे, लेकिन दुनिया में बहुत से मुजरिम ऐसे रहते हैं जिनके दिल-दिमाग पर उनके बचपन की हिंसा की छाप ऐसी गहरी रहती है कि वे उससे आखिर तक उबर ही नहीं पाते। परिवार में अगर अमन-चैन नहीं है, मां-बाप के रिश्ते अच्छे नहीं है, भाई-बहनों के बीच भेदभाव किया जाता है, या परिवार में कुछ बुरी बातें बच्चों की नजरों में आते रहती हैं, तो ऐसे बच्चे बड़ी तकलीफ की  जिंदगी गुजारते हैं, और उनके बड़े होकर किसी जुर्म में फंसने का खतरा खासा अधिक रहता है। भारत में आम बच्चों के लिए न तो किसी तरह के मनोवैज्ञानिक परामर्श मौजूद हैं, और न ही अधिकतर परिवारों में इस पर ध्यान दिया जाता कि बच्चों की मौजूदगी में कैसे हिंसक टीवी सीरियल देखते हुए पूरा परिवार बैठे रहता है। नतीजा यह होता है कि बड़े होने के पहले तक बच्चे जिंदगी की बुराइयों से कई तरह से वाकिफ होते रहते हैं। आज जो लोग तरह-तरह की पारिवारिक हिंसा करते हैं, और ऐसे मामले हर दिन दर्जनों की संख्या में सामने आ रहे हैं, ऐसे लोग बचपन से ही हिंसा के शिकार रहे हों ऐसी आशंका बनी रहती है। 
भारत में सरकार से लेकर समाज तक, और समाज से लेकर परिवार तक लोगों के लिए खाने-पीने और जीने की दिक्कतें सबसे अधिक रहती हैं, और उसके बाद लोग अपने बच्चों की नैतिक शिक्षा के नाम पर उन्हें धर्मान्धता सिखाना, जाति की नफरत सिखाना, हाथ के कामकाज के लिए हिकारत सिखाना काफी समझते हैं। ऐसे में पीढ़ी-दर-पीढ़ी बच्चे और बड़े तरह-तरह की निजी और सामाजिक हिंसा को लेकर जिंदगी गुजारते हैं। यह बात भी हम आज एक ऐसे जुर्म के सिलसिले में कर रहे हैं जो कि बहुत भयानक दिख रहा है, लेकिन इससे कम भयानक जुर्म गिनती में बहुत अधिक होते हैं। लाखों लोग छोटे-छोटे जुर्म के शिकार होकर पुलिस तक पहुंच भी नहीं पाते हैं, और घरवालों की हिंसा, पड़ोस या स्कूल-मैदान की हिंसा को बर्दाश्त करते हुए एक बीमार मानसिकता के साथ बड़े होते हैं। लोग बच्चों को सिर्फ कपड़े और किताबें दे देने को परवरिश मान लेते हैं, और इससे भारत एक बीमार देश की तरह बड़ा होता है। 

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