कौन सा अखबार, कौन सा चैनल सावधानी से तय करने की जरूरत

संपादकीय
30 अगस्त 2015

अमरीका में अभी एक टीवी स्टूडियो से जीवंत प्रसारण के बीच वहीं के एक कर्मचारी ने जाकर दो लोगों को गोली मार दी, और इसे देखने वाले लोग दहशत में आ गए। अमरीकी मीडिया में इस पर बहस चली हुई है कि इतनी हिंसा को बाकी मीडिया किस तरह से दिखाए? क्योंकि टीवी स्टूडियो में हुई इस गोलीबारी की वीडियो रिकॉर्डिंग मौजूद है, और इसके पहले कि कुछ किया जा सकता गोलीबारी प्रसारित हो चुकी थी। वहां पर एक तबके का यह मानना है कि इतनी हिंसा की खबर और तस्वीरें उसकी भयावहता के साथ नहीं दिखानी चाहिए क्योंकि लोगों पर इसका बुरा असर पड़ेगा। दूसरी तरफ कुछ लोगों का यह मानना है कि ऐसी हिंसा के पीछे अमरीका वह उदार हथियार नीति भी जिम्मेदार है जिसके चलते कोई भी नागरिक मनचाही बंदूकें और पिस्तौलें खरीदकर रख सकते हैं, और हर कुछ हफ्तों में अमरीका में कहीं न कहीं ऐसे लोग गोली चलाकर कई लोगों को मार रहे हैं। लोगों का यह भी मानना है कि अमरीका के भीतर हथियारों को लेकर ऐसी उदार नीति के खिलाफ एक जागरूकता की जरूरत है, और सरकार की इस नीति को बदलने की भी जरूरत है जो कि हथियार-कारोबारियों के हित में बनी हुई है। 
मीडिया पर क्या दिखाया जाए, और कितना दिखाया जाए, कितना छुपाया जाए, या कितना अनदेखा किया जाए, यह हमेशा ही बहस का सामान रहेगा। जिन देशों में लोकतंत्र नहीं है और मीडिया की आजादी नहीं है, वहां पर तो बात कुछ आसान हो जाती है क्योंकि सरकार जिसे ठीक समझे वही छपता और दिखता है। लेकिन भारत जैसे देश में जहां मीडिया आजाद है, वहां पर उसे खुद को ही यह तय करना होता है कि वह क्या दिखाए और क्या न दिखाए। ऐसे में बहुत सी खबरों को लेकर यह बहस छिड़ती है कि अखबार नकारात्मक खबरों को अधिक छापते हैं, टीवी के समाचार बुलेटिनों में हिंसा या जुर्म की खबरें, सेक्स की खबरें या गैरजिम्मेदारी के राजनीतिक बयानों की खबरें इतनी अधिक क्यों दिखाई जाती हैं? इन बातों पर एक मतभेद हमेशा बना रहेगा कि अगर जुर्म की खबरें नहीं दिखाएंगे तो लोग ऐसे जुर्म की तरफ से सावधान कैसे हो सकेंगे, और बच कैसे सकेंगे। टीवी पर जुर्म के कार्यक्रम रोजाना देखने के शौकीन लोगों का यह कहना है कि वे इन्हें देखकर समझ पाते हैं कि उन्हें मुजरिमों से कैसे बचना है। बच्चों से बलात्कार की खबरों को लेकर यह कहा जा सकता है कि अगर इनका छपना बंद हो जाए, तो लोगों को अपने बच्चों पर मंडराता खतरा कैसे पता लगेगा? राजनीतिक नेताओं के गंदे बयान अगर नहीं छपेंगे, तो देश के मतदाताओं को यह कैसे पता लगेगा कि किसी पार्टी के कौन से नेता कितने घटिया हैं? 
अब ऐसे तर्कों के बीच यह भी समझने की जरूरत है कि मीडिया में जो दो पैमाने लंबे समय से प्रचलित थे, वे भी अब कुछ बदल गए हैं। एक वक्त यह माना जाता था कि जो जनरूचि का है, वह अगर जनहित का भी है, तो वह छापने लायक खबर है। अब जनहित को धकेलकर पीछे कर दिया गया है, और जनरूचि ही तकरीबन सारे मीडिया के लिए तकरीबन अकेला पैमाना हो गया है। इसके बाद इस बात की परिभाषा भी अलग-अलग है कि जनरूचि क्या है? क्या लोगों की जनरूचि का कोई अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है? या फिर मीडिया अपने बाजारू हितों को ध्यान में रखकर खुद ही यह तय करता है कि जनरूचि ऐसी होनी चाहिए? मीडिया का कुछ हिस्सा यह कहता है कि वह वही परोसता है जो कि लोग देखना या पढऩा चाहते हैं। दूसरी तरफ मीडिया का एक हिस्सा यह कहता है कि वह तो लोगों को वही देता है जो कि वह सोचता है कि लोगों को पढऩा चाहिए। यह एक बहुत बड़ा इलाका है, जो कि पूरी तरह धुंध से घिरा हुआ है, और इसके बीच कोई साफ-साफ पैमाना देख पाना नामुमकिन सा है। और फिर आज खुद मीडिया अपने फैसले नहीं ले पाता, ईश्तहार देने वाले कारोबारी यह तय करते हैं कि मीडिया में कौन सी खबरें लोगों को बांधकर रख सकती हैं, और कौन सी खबरें नीरस और उबाऊ रहती हैं, फिर चाहे वे कितने ही जनहित की क्यों न हों। 
हिन्दुस्तान में एक और दिक्कत यह हो गई है कि अब यहां कोई मजबूत पत्रकार-आंदोलन नहीं रह गया। एक वक्त था जब पत्रकार-संगठन पत्रकारिता के मूल्यों की बात करते थे, सिद्धांतों की बात करते थे, और पेशे के तौर-तरीकों को लेकर बहस भी करते थे। लेकिन अब वह आंदोलन खत्म हो गया, और पत्रकारिता का पेशा पूरी तरह प्रकाशन के कारोबार में तब्दील हो गया। ऐसे में मीडिया में वे ही नीति-सिद्धांत चलना मुमकिन रह गया है जो कि किसी भी कारोबार में चल सकते हैं। जिस तरह एक डॉक्टरी के नीति-सिद्धांत एक नर्सिंग होम के कारोबारी नीति-सिद्धांतों पर लागू नहीं होते, उसी तरह पत्रकारिता के नीति-सिद्धांत मीडिया-कारोबार पर लागू नहीं होते। ऐसे में खुद लोगों को यह तय करना है कि उनको कौन सा अखबार पढऩा है, कौन सा समाचार चैनल देखना है। जिस तरह लोग अपना खाना तय करते हैं, अपनी खुराक तय करते हैं, सावधानी से यह देखते हैं कि उनके शरीर की जरूरत के मुताबिक कौन सा खाना बेहतर है, उसी तरह लोगों को अपनी दिमागी सेहत के लिए अच्छे मीडिया को छांटना चाहिए। भारत की उदार लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार या बाजार लोगों को किसी चीज से रोक नहीं सकते, लोगों को खुद ही अपनी रोजाना की दिमागी-खुराक का जरिया तय करना होगा। 

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