शरणार्थी संकट से जुड़ी धर्म और संस्कृति की बातें

संपादकीय
19 सितंबर 2015

दुनिया के सामने एक अभूतपूर्व शरणार्थी संकट आ खड़ा हुआ है। खाड़ी के देशों से वहां सरकार और बागियों के बीच चल रही गोलीबारी में जिंदगियां खोते हुए, बचे हुए लोग निकलकर योरप की तरफ बढ़ रहे हैं, और उनको दाखिले देते-देते अब योरप के देश अपने भीतर नागरिकों का प्रतिरोध और तनाव झेल रहे हैं। देशों की सरहद पर शरणार्थियों को रोकते हुए स्थानीय पुलिस को ताकत का इस्तेमाल करना पड़ रहा है, और इससे भारी बदनामी की नौबत भी आ रही है। योरप के इन देशों के स्थानीय लोगों की आशंकाएं पूरी तरह बेबुनियाद नहीं हैं। वहां लोगों को यह लग रहा है कि देश का बहुत सा खर्च इन शरणार्थियों पर लगेगा, जो कि दूसरी संस्कृति से आए हुए हैं, और जिनके धार्मिक रीति-रिवाज, मान्यताएं, योरप की संस्कृति के मुकाबले कट्टर हैं। ऐसे में लोगों को एक खतरा यह भी लग रहा है कि शरणार्थियों के झुंड में शामिल होकर इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकी संगठनों के लोग भी साथ में पहुंच सकते हैं, और योरप में आतंकी हमलों को बढ़ावा दे सकते हैं। 
यह संस्कृतियों के टकराव की नौबत भी है, और एक बड़े असली आतंकी खतरे की आशंका भी बेबुनियाद नहीं है। जो लोकतंत्र लोकतांत्रिक मूल्यों को बढ़ावा देने और उन पर टिके रहने की बात करते हैं, उनको ऐसे तनाव से गुजरना भी पड़ता है। दूसरी तरफ जिन धर्मों के लोग अपने धर्म को लोकतंत्र से ऊपर मानते हैं, उनको ऐसा प्रतिरोध भी झेलना पड़ता है, और उनके प्रति लोगों की आशंका खत्म नहीं होती है। यह धार्मिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, और आतंकी, सभी तरह के टकराव की एक नौबत है, और इसके चलते हुए मानवीय आधार पर जो मदद होनी चाहिए, वह प्रभावित हो रही है। यह एक ऐसा मौका है जब इन शरणार्थियों से परे बाकी दुनिया को भी यह सोचना-विचारना चाहिए कि लोकतंत्र और धर्म के बीच जब टकराव की नौबत आती है, तब लोगों को क्या करना चाहिए? और यह बात हम सिर्फ मध्य-पूर्व के शरणार्थियों को लेकर नहीं कर रहे हैं। भारत में केन्द्रीय संस्कृति मंत्री महेश शर्मा लगातार जिस बुरी तरह की हिंसक और साम्प्रदायिक बातें सार्वजनिक रूप से, कैमरों पर, टीवी प्रसारण में कर रहे हैं, उसके खतरे समझने की जरूरत है। जब वे कहते हैं कि मुस्लिम होने के बाद भी डॉ. अब्दुल कलाम एक राष्ट्रवादी थे, तो वे इस देश के बाकी मुस्लिमों को एक ऐसी गाली देते हैं जिसके कि वे हकदार नहीं है। भारत में ऐसे अनगिनत उदाहरण मोदी-सरकार आने के पहले से चले आ रहे थे, और मौजूदा सरकार आने के बाद से ये बढ़ते चले गए हैं। दूसरी तरफ भारत के बगल के म्यांमार की खबर है कि वहां पर ऐसे कानून अभी-अभी बनाकर लागू किए गए हैं जो कि मुस्लिमों के धार्मिक रीति-रिवाजों के खिलाफ हैं, और वहां की बौद्ध-सरकार की मर्जी के हैं। पिछले साल भर से लगातार म्यांमार से भयानक खबरें आती हैं कि किस तरह रोहिंग्या मुस्लिमों को वहां से मार-मारकर भगाया जा रहा है और समंदर के रास्ते वे इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देशों तक मरते-मरते पहुंच रहे हैं, या पहुंचते-पहुंचते मर रहे हैं। 
दुनिया को आज यह समझने और सीखने की जरूरत है कि गैरजरूरी धार्मिक और सांस्कृतिक कट्टरता किसी तनाव का हल नहीं हो सकतीं। इनसे हिंसा और खतरे का बढ़ते ही चले जाना है, और कोई देश, कोई समाज ऐसे में सुरक्षित नहीं रह सकते। दिक्कत यह है कि भारत जैसा एक धर्मनिरपेक्ष और विविधता वाली देश ऐसे में हिन्द महासागर के इस पूरे इलाके में मिसाल बन सकता था, मिसाल रहते आया है, लेकिन उसे घोर हिंसक राष्ट्रवादी हिन्दुत्व का झंडा लेकर चलने वाले लोग एक मिसाल रहने नहीं दे रहे। नतीजा यह हो रहा है कि बहुसंख्यक तबके की साम्प्रदायिकता के जवाब में न सिर्फ अल्पसंख्यक तबके की साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, बल्कि देश में धर्मान्धता के और किस्म के खतरे भी बढ़ रहे हैं। पंजाब में दलितों के बीच खासी पकड़ रखने वाले बाबा राम-रहीम ने अपनी ताजा फिल्म को बढ़ावा देने की जो इंटरव्यू दिया है उसमें उन्होंने आदिवासियों को शैतान करार दिया है। अब दलितों के गुरू अगर आदिवासियों को ऐसी हिकारत से देख रहे हैं, तो फिर हिन्दू धर्म में ऊंचे होने का दावा करने वाली जातियों की दलित-आदिवासियों के लिए हिकारत भला कैसे खत्म होगी?
दुनिया के लोगों को एक-दूसरे से बहुत कुछ सीखना भी चाहिए, और अपने आपको एक बेहतर मिसाल बनाकर दुनिया को बिना कुछ कहे भी एक अच्छी संस्कृति सिखाना भी चाहिए। भारत में आज शुद्धतावादी हमलावर तबके देश के ताने-बाने को तोड़ रहे हैं, और यह देश में हर किसी के लिए एक नया खतरा खड़ा कर रहा है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें