घुटनों पर लगी चोट से सरकार एकदम सक्रिय

संपादकीय
18 सितंबर 2015

दिल्ली में डेंगू से मौत हुई, और बच्चे की मौत के बाद मां-बाप ने आत्महत्या कर ली, तो केन्द्र सरकार और दिल्ली सरकार ने अस्पतालों और चिकित्सा-जांच केन्द्रों पर नकेल डाल दी। कई तरह के नियम लागू कर दिए, जो कि जनता की नाराजगी को दूर करने के लिए अधिक थे, और इलाज के लिए कम। दिल्ली के एक बड़े पांच सितारा अस्पताल के मालिक ने मीडिया से कहा कि डेंगू के इलाज के लिए सिर्फ बिस्तर रख देने से काम नहीं चलेगा, उसके लिए बहुत ही विशेषज्ञ डॉक्टरों के साथ-साथ विशेषज्ञ सहायकों की जरूरत भी पड़ती है, और रातों-रात ऐसा चिकित्सकीय ढांचा खड़ा करना मुमकिन नहीं है। 
अंग्रेजी में जिसे नी-जर्क रिएक्शन कहा जाता है, सरकारों के रवैये में आमतौर पर वैसा ही दिखाई पड़ता है। घुटने पर चोट पड़ी, तो बिलबिला जाती हैं सरकारें, और फिर आनन-फानन आग बुझाने के अंदाज में तेजी से काम दिखाने की कोशिश में लग जाते हैं नेता और अफसर। लेकिन यह किसी भी बात का इलाज नहीं है। दो बरस हो रहे हैं उत्तराखंड की तबाही को, लेकिन आज भी वहां हालात वैसे ही खराब हैं। बाढ़ के तुरंत बाद ऐसा लग रहा था कि केन्द्र और राज्य मिलकर दुनिया भर के लोगों की मदद से पूरा ढांचा ही मजबूत कर देंगे, लेकिन हुआ कुछ नहीं। वैसा ही कश्मीर की बाढ़ के बाद हुआ, एक बरस पूरा हो गया और लोगों की जिंदगी वापिस नहीं लौटी हैं।  जब किसी शहर में बीमारी फैलती है, तो वहां ऐसी ही हड़बड़ी में फौजी कार्रवाई के अंदाज में काम होता है, लेकिन ऐसी बीमारी फैलने के पीछे जो वजहें हैं, उनको खत्म करना एक मुश्किल और लंबा काम होता है, इसलिए उस बारे मेें कुछ भी नहीं किया जाता। 
दरअसल केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने कोई न कोई चुनाव खड़े रहते हैं, और चुनावों में वोट दीर्घकालीन योजनाओं से नहीं मिलते। चुनावी फसल तुरंत फायदा पहुंचाकर ही पाई जा सकती है, और भारतीय लोकतंत्र में केन्द्र, राज्य, या स्थानीय संस्थाएं अपने कार्यकाल का आधा हिस्सा ऐसे ही चुनावी-दबाव में गुजार देती हैं। फिर एक दूसरी बात यह कि देश की बुनियादी जरूरतों पर भी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री, या फिर विभागीय मंत्री की निजी पसंद, उनका निजी एजेंडा इस तरह हावी हो जाता है कि  जनता और देश-प्रदेश का सचमुच भला कर सकने वाली योजनाएं पीछे की सीट पर जाकर बैठ जाती हैं, और नेताओं के नाम के साथ जुड़कर चलने वाली योजनाएं सामने की पूरी कतार पर कब्जा कर लेती हैं। भारतीय लोकतंत्र में जनता का एक बड़ा हिस्सा इसी किस्म के नारों पर चलता है, और इस वजह से उसे ऐसी ही नारेनुमा योजनाएं परोसी जाती हैं। 
जब तक मीडिया नेताओं और अफसरों के किसी कुर्सी पर पहुंचते ही उनकी प्राथमिकताएं पूछने में जुटा रहेगा, तब तक देश का यही हाल रहेगा। पता नहीं क्यों मीडिया हर नेता और अफसर के अहंकार को बढ़ाते चलता है, और उन्हें यह एहसास कराते चलता है कि उन्हें अपनी प्राथमिकताएं हर कीमत पर तय करने और लागू करने का हक है। अगर ऐसा ही है तो सरकारी काम के अलग-अलग दायरों में किसी भी विशेषज्ञ और जानकार, किसी अनुभवी और योजनाशास्त्री की जरूरत ही क्या है? और जब देश-प्रदेश की, शहर और स्थानीय संस्थाओं की बड़ी-बड़ी योजनाएं सिर्फ एक नेता की मनमर्जी से बनने लगती हैं, तो जनता का ढेरों पैसा उसमें डूब जाता है। आज अगर देश की राजधानी में भी एक मामूली बीमारी से निपटने की ताकत नहीं है, तो इसके पीछे आजादी के बाद की आधी-पौन सदी की योजना की कमी है, उस पर अमल की कमी है, और नेताओं की मनमर्जी की अधिकता भी है। इस देश को सत्ता पर बैठे व्यक्तियों की व्यक्तिगत पसंद-नापसंद, और प्राथमिकता से ऊपर उठने की जरूरत है, और देश को एक व्यवस्था के तहत चलाने की जरूरत है। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक किसी हादसे की चोट से सरकार के घुटने बिलबिलाएंगे, और आनन-फानन कोई रास्ता ढूंढेंगे, लेकिन उससे अगले हादसे नहीं टलेंगे। 

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