संघ के साथ मोदी सरकार की बैठक से उठे सवाल

संपादकीय
4 सितंबर 2015

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की एक लंबी बैठक इन दिनों चल रही है जिसमें यह संगठन केन्द्र सरकार के मंत्रियों के साथ कई मुद्दों पर बात कर रहा है। अभी देश इस अटकल में डूबा है कि क्या प्रधानमंत्री मोदी भी इस बैठक में जाएंगे जिसमें अलग-अलग मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने की भी चर्चा है। भाजपा और आरएसएस के बीच के संबंध कभी भी इन दोनों के आलोचकों के बयानों से परे नहीं रहे हैं। इसकी एक वजह यह हो सकती है कि संघ अपने आपको एक गैरराजनीतिक संगठन कहता है जो कि महज हिन्दुत्व के मुद्दे को लेकर चलता है। वह अपने आपको भाजपा की राजनीति, चुनावी राजनीति, या सरकार चलाने से अलग बताता है, और आलोचकों का यह मानना है कि जब आरएसएस जनसंघ के जमाने से भाजपा पर इस कदर काबिज है कि भाजपा के संगठन मंत्री अनिवार्य रूप से संघ से आते हैं, तो फिर उसे अपने आपको गैरराजनीतिक बताने की कोशिश क्यों करनी चाहिए। लेकिन हम अभी संघ पर चर्चा नहीं कर रहे, और न ही भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार पर चर्चा कर रहे। आज हम इस पर बात करना चाहते हैं कि सरकार चला रहे लोग किस हद तक और किन लोगों के लिए जवाबदेह हो सकते हैं, या उन्हें होना चाहिए, या उन्हें नहीं होना चाहिए। 
सरकार पर हमेशा ही सत्तारूढ़ पार्टी की विचारधारा, और उसके लोगों का असर रहता है, और रहना भी चाहिए क्योंकि किसी पार्टी के राजनीतिक-चुनावी घोषणा पत्र के बाद ही वह पार्टी सरकार में आ पाती है, और उसे अपने राजनीतिक एजेंडा को सरकारी नीतियों और कार्यक्रमों पर देश के संविधान के भीतर-भीतर लागू करने का पूरा हक रहता है, और पूरी जिम्मेदारी भी रहती है। भारतीय जनता पार्टी के साथ एक दिक्कत यह है कि पार्टी के संगठन से परे आरएसएस की रीति-नीति और उसकी विचारधारा, उसकी सोच और उसके सिद्धांत भाजपा और उसकी सरकारों पर भी लागू करने की कम या अधिक कोशिश होती है। आज संघ-भाजपा के आलोचक केन्द्र सरकार के मंत्रियों या प्रधानमंत्री के इस बैठक में जाने को लेकर आक्रामक हैं कि संघ मोदी सरकार के लिए एक संविधानेतर ताकत की तरह काम कर रहा है। 
देश का इतिहास इस बात का गवाह है कि गांधी अपने आखिरी दिन तक नेहरू-सरकार के लिए एक संविधानेतर ताकत रहे। इसके बाद इमरजेंसी के पहले से संजय गांधी इंदिरा-सरकार के लिए इस देश के इतिहास की सबसे बड़ी संविधानेतर ताकत रहे हैं। बाद में महाराष्ट्र से लेकर मुम्बई महानगरपालिका तक बाल ठाकरे का यही दर्जा रहा। और जनसंघ-भाजपा की पहली राज्य सरकार से लेकर आज की मोदी सरकार तक आरएसएस का ऐसा दर्जा है। लेकिन इसके बीच भी अगर देखें, तो यूपीए सरकार के दस बरस में सोनिया गांधी की अगुवाई वाली, उनकी खुद की मनोनीत की गई एनएसी का दर्जा मनमोहन-सरकार पर कुछ इसी तरह का रहा। राष्ट्रीय सलाहकार परिषद को एक सरकारी दर्जा भी दिया गया था, उसमें आईएएस अफसर भी रखे गए थे, उसमें सरकारी नीतियों और कामकाज पर चर्चा होती थी, उसमें नए कार्यक्रम और नए कानून बनाए जाते थे, जो कि बाद में सोनिया के मार्फत मनमोहन-सरकार लागू करती थी। खुद मनमोहन-मंत्रिमंडल को देखें, तो उसमें सर्वसम्मति से पारित एक प्रस्ताव को सरकार से बाहर के राहुल गांधी ने जिस तरह दिल्ली प्रेस क्लब में कैमरों के सामने फाड़कर फेंक दिया था, और फिर मनमोहन-मंत्रिमंडल ने अपना ही वह सर्वसम्मत प्रस्ताव रद्द किया। अब अगर एक नौजवान ने अपनी ही पार्टी की अगुवाई वाली सरकार के मंत्रिमंडल के फैसले को इस तरह फेंक दिया, और बदल दिया, तो क्या यह उस सरकार पर एक संविधानेतर दबाव नहीं था? 
किसी भी राजनीतिक दल या सरकार को अपने सलाहकार या मार्गदर्शक छांटने का पूरा नैतिक और संवैधानिक हक है। भारत में कांग्रेस पार्टी का लंबा इतिहास बताता है कि उसके किसी ओहदे पर रहे बिना गांधी ने जिस तरह उसके हर पहलू पर अपना काबू रखा, अपनी मर्जी लादी, अपनी मर्जी से किसी को अध्यक्ष बनने से रोका, किसी को अध्यक्ष बनने दिया, वह संगठन के संविधान से परे की ताकत नहीं थी, तो और क्या थी? जब सैद्धांतिक बहस होती है, तो उसे व्यक्तिवादी बनाना गलत होता। इसलिए हम आज की यहां की चर्चा में कांग्रेस पर गांधी के असर, या नेहरू सरकार पर गांधी के असर को आज भाजपा पर आरएसएस के असर, मोदी सरकार पर आरएसएस के असर से तुलना के लायक पाते हैं। अलग-अलग नजरिए के लोगों को गांधी और आरएसएस के बीच बहुत बड़ा फर्क दिखता है, लेकिन जहां तक किसी राजनीतिक दल या सरकार पर बाहरी असर की बात है, तो आज मोदी सरकार पर संघ की पकड़ में कोई अनहोनी नहीं है। 
जिन लोगों को इमरजेंसी के बाद की जनता पार्टी सरकार की याद होगी, उनको यह भी याद होगा कि उस समय भी यह मुद्दा जोर-शोर से उठा था कि जनता पार्टी सरकार के मंत्री जनसंघ से इस नई पार्टी में आए थे, और अब चूंकि जनसंघ का अस्तित्व नहीं रह गया था, इसलिए ऐसे मंत्रियों को संघ के प्रति अपनी निष्ठा जारी नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि नए गठबंधन वाली जनता पार्टी का संघ से वास्ता नहीं था। लेकिन आज मोदी सरकार एक गठबंधन, एनडीए, की सरकार है, और उसके भाजपा के मंत्री अगर भाजपा से परे भी किसी और संगठन के साथ उठ-बैठकर वैचारिक विचार-विमर्श करते हैं, तो इस पर कैसे रोक लगाई जा सकती है? जिन लोगों को मोदी सरकार के चलते संघ के असर के बढऩे का डर है, उन लोगों को इस असर को रोकने के दूसरे रास्ते ढूंढने होंगे, एक कुतर्क के आधार पर किसी पार्टी या सरकार को किसी संगठन से अलग नहीं किया जा सकता। 
और एक दूसरी बात यह भी है कि एनडीए के भीतर भी भाजपा का यह चेहरा हमेशा से उजागर रहा है कि उसके संघ से संबंध हैं, और उसके अनगिनत मंत्री और नेता संघ से अपने संबंधों को लेकर अपने गर्व को उजागर करते आए हैं। किसी व्यक्ति या संगठन से अघोषित या लुके-छिपे संबंध अधिक खतरनाक होते हैं। इसलिए मोदी सरकार या भाजपा के संघ के साथ संबंध अगर उजागर हैं, तो यह अधिक लोकतांत्रिक स्थिति है, बजाय इसके कि किसी प्रधानमंत्री निवास पर बैठकर प्रधानमंत्री की तानाशाह औलाद देश पर इमरजेंसी लादे, और पूरे संविधान को अपने पांव तले दबाकर रखे।

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