मरीजों से लेकर मुर्दों तक को बर्दाश्त बढ़ा लेनी चाहिए

संपादकीय
12 सितंबर 2015

चंडीगढ़ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पहुंचने के पहले ही अफसरों ने पूरे शहर के स्कूल बंद करने का फतवा जारी कर दिया था। इसके अलावा प्रधानमंत्री के कार्यक्रम के दौरान आसपास के पूरे इलाके को इस तरह बंद किया गया था कि एक श्मशान को भी बंद कर दिया गया, और मुर्दे जलने का इंतजार करते खड़े रहे। मोदी ने ट्विटर पर लोगों को हुई दिक्कतों के लिए माफी मांगी, और जांच और कार्रवाई का भरोसा दिलाया है। चंडीगढ़ चूंकि केन्द्र सरकार के सीधे प्रशासन वाला शहर है, इसलिए यह किसी राज्य सरकार की जिम्मेदारी नहीं थी, और मोदी की सरकार खुद ही इसके लिए जिम्मेदार है। 
लेकिन चंडीगढ़ के मुर्दों के इंतजार से परे आज देश भर में लोगों के बीच एक बार फिर इस बात को लेकर नाराजगी हो रही है कि सत्ता पर बैठे लोग जिस तरह से अपने आपको वीआईपी, और वीवीआईपी दर्जा देकर जनता से ऊपर ईश्वर की तरह रहते हैं, क्या वह लोकतंत्र है? यह बात सिर्फ मोदी के साथ हो ऐसा भी नहीं है, यह बात सिर्फ केन्द्र और राज्य के मंत्रियों-मुख्यमंत्रियों की हो, ऐसा भी नहीं है। सत्ता जिनके हाथ आती है, वे उसकी ताकत का एक बहुत ही अश्लील और हिंसक प्रदर्शन किए बिना अपने अहंकार की भूख नहीं मिटा पाते। नेताओं से परे अफसर, अफसरों से परे बड़ी अदालतों के जज, सभी तबकों में यह हाल दिखता है। सांसदों और विधायकों की गाडिय़ों में नंबर प्लेट की जगह सांसद या विधायक लिखा दिखता है, और धीरे-धीरे यही हाल महापौर और पार्षदों तक का होने लगता है। मीडिया भी इससे अछूता नहीं है, और नंबर प्लेट की जगह प्रेस लिखाकर घूमना भी एक आम बात है। 
भारतीय लोकतंत्र में लोग अपने अधिकारों और दूसरों की जिम्मेदारियों के लिए तो बुरी तरह चौकन्ना हैं, लेकिन अपनी जिम्मेदारियों और दूसरों के अधिकारों की समझ उनको छू भी नहीं गई है। नतीजा यह है कि आज के ताकतवर तबके सौ बरस पहले के सामंती तबकों की तरह रहते हैं, और कहीं किसी वीआईपी काफिले से हुए ट्रैफिक जाम में एम्बुलेंस में पड़े लोग दम तोड़ देते हैं, कहीं लोगों की गाडिय़ां छूट जाती हैं, और कहीं बूढ़े या बीमार चक्कर खाकर गिर पड़ते हैं। सत्ता का नशा बहुत हिंसक हो चला है। लोग लालबत्तियों के लिए जिद करते हैं, जिनको अदालती आदेश के चलते लालबत्ती नहीं मिल सकती, वे भी अपनी गाडिय़ों पर असली या नकली बत्तियां लगाकर घूमते हैं, कानून तोड़ते हुए सायरन बजाते हैं, लोगों को सड़कों से धकेलते हुए चलते हैं। यह पूरा सिलसिला किसी अदालती रोक के बिना खत्म होते दिख नहीं रहा है। लेकिन दिक्कत यह है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जज भी पुलिस के काफिलों में चलते हैं, और उनके लिए भी दो शहरों के बीच की सड़कों पर भी दर्जनों या सैकड़ों पुलिसवालों को तैनात किया जाता है कि कोई जानवर भी ऐसे काफिलों के सामने दौड़ न पड़े। अब इस देश की अदालतों में वैसे तो मामले पूरी-पूरी पीढ़ी की उम्र जितने बरस पड़े रहते हैं, लेकिन जज पुलिस सायरन के साथ इस तरह सड़कों पर चलते हैं कि उन्हें जल्दी पहुंचकर तुरंत ही सारे फैसले सुनाने हैं। 
लोकतंत्र में चूंकि सभी सरकारी, संसदीय और अदालती, सभी तबके मुर्दों को इंतजार करवाने का, मरीजों को सड़क पर मारने का हक रखते हैं, इसलिए इस नौबत में सुधार का कोई आसार दिखता नहीं है। ऐसे में मरीजों से लेकर मुर्दों तक को अपनी बर्दाश्त बढ़ा लेनी चाहिए। 

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