छत्तीसगढ़ की पाठ्य पुस्तक में महिलाओं का साफ अपमान

संपादकीय
23 सितंबर 2015

छत्तीसगढ़ की एक स्कूली किताब में छपी हुई एक लाईन देश भर में एक खबर बन गई है। इसे चुनौती देते हुए सरगुजा की एक नौजवान शिक्षिका ने राज्य के महिला आयोग को शिकायत भेजी, और मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक छत्तीसगढ़ फिर चर्चा में आ गया, इस बार बुरी चर्चा में। इस स्कूली किताब में देश में बेरोजगारी के जो कारण गिनाए गए हैं उनमें महिलाओं का काम करना भी एक कारण बताया गया है। यह बात सही है कि 25-50 बरस पहले जब महिलाएं नौकरियों में कम आती थीं, तब तकरीबन सारी नौकरियां पुरूषों के लिए मौजूद रहती थीं। जैसे-जैसे महिलाएं  अधिक आने लगीं, तो पुरूषों का लगभग एकाधिकार खत्म सा हो गया, और वे इसलिए भी पिछड़ते चले गए कि कॉलेज के इम्तिहान में लड़कियों को लड़कों के मुकाबले आमतौर पर अधिक नंबर मिलते हैं। इस बारे में छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा विभाग से जुड़े एक अफसर का बयान भी अखबार में आया है जिसने यह कहा है कि यह लेखक के अपने विचार हैं, और शिक्षक अपनी तरह से इसकी व्याख्या कर सकते हैं। 
यह बहुत ही बेइंसाफी वाली किताब है जिसमें महिलाओं के लिए सदियों से चली आ रही एक हिकारत साफ दिखती है। इस बात को शिक्षकों के पढ़ाने के दौरान किसी व्याख्या के लिए नहीं छोड़ा जा सकता, और इसे सीधा-सीधा खारिज किया जाना चाहिए। अगर महिलाओं के आने से रोजगार कम होने की बात कही जा रही है, तो यह बात रोजगार पर महिलाओं के हक को ही मानने से इंकार करती हैं। रोजगार पाना कोई पुरूषों की 'बपौतीÓ  नहीं थी जो कि अब टूट रही है। पहले अगर बराबरी के हक नहीं मिलते थे, और अब महिलाएं सामने आकर समाज में अपने हक का इस्तेमाल कर रही हैं, तो इसे रोजगार के अवसर घटाने वाला कहना बहुत ही अपमानजनक है, और सरकार को किताब का यह हिस्सा तुरंत खारिज करना चाहिए। अगर सरकार ऐसा नहीं करेगी तो कोई भी अदालत बड़ी आसानी से दखल देकर सरकार को इसके लिए मजबूर कर सकती है। 
लेकिन छत्तीसगढ़ में महिलाओं को लेकर संवेदनशीलता पैदा नहीं हो पा रही है। अभी कुछ दिन पहले सोनिया गांधी की पार्टी के राजधानी के विधानसभा चुनाव के उम्मीदवार रहे विकास उपाध्याय नाम के नौजवान ने शिक्षा विभाग के इसी दफ्तर में जाकर किसी मुद्दे पर अफसरों को नालायक या निकम्मा साबित करने के लिए उन्हें चूडिय़ां भेंट की। अब अगर इंदिरा गांधी और सोनिया गांधी की पार्टी के नेता, बड़े पदाधिकारी, चुनावी-उम्मीदवार अगर चूडिय़ों को कमजोरी का प्रतीक, नालायकी या निकम्मेपन का प्रतीक मानते हैं, तो इसके खिलाफ कोई भी जागरूक पार्टी कार्रवाई करती। लेकिन कांग्रेस पार्टी की लीडरशिप पता नहीं अपने आपमें ही इस कदर मगन क्यों है कि अपनी पार्टी के बड़े नेताओं के राजनीतिक-शिक्षण की फिक्र भी उसे नहीं है। एक दिलचस्प बात यह है कि अभी पाठ्य पुस्तक में महिलाओं के अपमान का मुद्दा सौम्या गर्ग नाम की जिस शिक्षिका ने राज्य महिला आयोग के सामने उठाया है, उसी ने कई महीने पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट तक इस बात को लेकर दौड़ लगाई थी कि देश भर में जहां-जहां चूडिय़ों वाले बयान दिए जा रहे हैं, उनके खिलाफ जुर्म दर्ज किया जाना चाहिए। इस शिक्षिका का तर्क था कि यह अपमान एक अपराध है। 
हमारे नियमित पाठक यह जानते हैं कि हम बरसों से लगातार इस मिसाल को लेकर लिखते आ रहे हैं, और महिलाओं से भेदभाव, उनके अपमान की भाषा से लेकर रीति-रिवाजों तक जो-जो बातें हैं, उनके खिलाफ लगातार तर्क देते हैं। लेकिन भारत की राजनीति में आदमी-औरत की समानता कोई मुद्दा नहीं है, और यही वजह है कि राजनीति के काबू में चलने वाले शासन-प्रशासन में भी संवेदनशीलता नहीं आ पाती है। हम छत्तीसगढ़ सरकार से सिफारिश करते हैं कि ऐसे भेदभाव वाली बातों को किताबों से तुरंत खारिज किया जाए, और सरकार को अगर जरूरत हो तो समझदार लोगों की एक ऐसी कमेटी बनाई जाए जो कि किसी भी तरह के सामाजिक भेदभाव वाली बातों को पाठ्य पुस्तकों से निकालकर बाहर फेंके। 

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