आरक्षण पर बहस, शुरुआत मलाईदार तबके से हो

21 सितंबर 2015
संपादकीय

आरक्षण पर राजनीति और उसके दुरुपयोग का आरोप लगाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने एक साक्षात्कार में सुझाव दिया है कि एक समिति बनाई जानी चाहिए जो यह तय करे कि कितने लोगों को और कितने दिनों तक आरक्षण की आवश्यकता होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संविधान में सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग पर आधारित आरक्षण नीति की बात है, तो वह वैसी हो जैसी संविधानकारों के मन में थी। वैसा उसको चलाते तो आज ये सारे प्रश्न खड़े नहीं होते। हम उनकी बात को एक राष्ट्रीय बहस के लायक पाते हैं, लेकिन इस बहस को एक सिरे से शुरू करते हुए हम आरक्षण की जरूरत के बारे में सबसे जरूरी पहलू, क्रीमीलेयर पर आगे बात करना चाहते हैं। आज आरक्षित तबकों के बारे में जब कभी बाकी तबकों की नाराजगी होती है, तो वह आरक्षित लोगों में से क्रीमीलेयर के लोगों की अब बढ़ चुकी ताकत और संपन्नता को लेकर होती है। ऐसे मलाईदार तबके के लोग अपने ही आरक्षित तबके के सही प्रतिनिधि नहीं रह गए हैं, और आरक्षण के बाकी पहलुओं पर बहस चाहे जब हो, राष्ट्र के जिम्मेदार लोगों को मलाईदार तबके का आरक्षण खत्म करने का काम तुरंत करना चाहिए। 
आज हम यहां पर मौजूदा आरक्षित तबकों की बात करना चाहते हैं जो कि कमजोर लोगों को आरक्षण का फायदा देने के नाम पर उन तबकों के ताकतवर लोगों के हाथों में उस फायदे को देने का काम कर रहे हैं। दलित, आदिवासी या ओबीसी, जिस भी जाति के आधार पर आरक्षण तय किया गया उसका मकसद था कि ये समाज देश के भीतर बहुत कमजोर हैं और इसलिए उन्हें बाकी लोगों की बराबरी तक लाने के लिए आरक्षण की जरूरत है। लेकिन इन तबकों के भीतर आरक्षण का फायदा पाने की आर्थिक और शैक्षणिक क्षमता उस मलाईदार तबके में ही लगभग सीमित रह गई है जो कि जाति से इन तबकों का होने के बाद भी ताकतवर हो चुका है और आगे बढ़ चुका है। जब तक किसी भी आरक्षित तबके के भीतर मलाईदार तबके को आरक्षण के फायदे से हटाया नहीं जाएगा तब तक उन जातियों के सबसे कमजोर लोगों को आरक्षित वर्ग के भीतर ही सीमित सीटों पर अपने ही ताकतवर लोगों के बराबर तक मुकाबले में पहुंच पाना नसीब ही नहीं हो सकता। आरक्षित तबके के एक सांसद, विधायक, अफसर या करोड़पति के बच्चे किसी दाखिले के लिए या नौकरी के लिए जितनी तैयारी कर सकते हैं, उतनी तैयारी उनकी जातियों के बाकी 99 फीसदी बच्चे नहीं कर सकते। इसका मतलब यह है कि कमजोर समुदायों के भीतर, जाति और रक्त के आधार पर, एक ऐसे ताकतवर तबके का एकाधिकार सा आरक्षित सीटों पर हो चला है जो कि एक दूसरे नजरिए से देखें तो सामान्य तबके के अधिकांश लोगों से भी बहुत अधिक ताकतवर हो चुका है।
ऐसे में संसद से लेकर अदालत तक और सड़क से लेकर मतदान केंद्र तक जागरूकता का एक ऐसा आंदोलन छेडऩे की जरूरत है जो मलाईदार तबके को देश के किसी भी आरक्षण से बाहर करने के लिए हो। ऐसा कानून लिखकर तैयार करने वाले और ऐसा कानून बनाने वाले लोग चूंकि ऐसे ही मलाईदार तबकों के लोग हैं इसलिए ऐसी राय भी इनके वर्गहित के खिलाफ की है। लेकिन भारत के वामपंथी दलों को इस सामाजिक हकीकत को उठाने की जरूरत है और इसे एक बहुत बड़ा चुनावी राजनीतिक मुद्दा बनाने की जरूरत है क्योंकि राजनीतिक मुद्दा बनाए बिना, वोटों पर असर का खतरा खड़े किए बिना इस देश में ऐसा कोई फैसला सत्ता पर बैठे लोग खुद होकर नहीं लेंगे। यहां पर हम अदालतों में आरक्षण पर बहस के दौरान इस बारे में कही गई बहुत सी बातों को लाना नहीं चाहते क्योंकि कानून की तकनीकी बारीकियों से परे व्यापक जनहित की और सबसे कमजोर तबके की मदद करने की एक सोच जरूरी है जो कि तकनीकी बातों की चर्चा में उलझकर रह जाएगी।

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