प्रकृति और पर्यावरण पर धार्मिक हिंसा रोकना जरूरी

8 सितंबर 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी हुई प्रतिमाओं पर रोक लगाई गई है, और उनको मूर्तिकारों से ही जब्त किया जा रहा है। पिछले कुछ बरसों से लगातार सरकार यह चेतावनी देते आ रही थी कि जिन प्रतिमाओं को विसर्जित किया जाता है, उनको घुलने वाली मिट्टी से ही बनाया जाए, और उन पर गैररासायनिक रंग ही इस्तेमाल किए जाएं ताकि तालाबों और नदियों का पानी जहरीला न हो। लंबे समय से प्लास्टर ऑफ पेरिस की प्रतिमाओं का चलन बढ़ते चल रहा था और गणेश या दुर्गा विसर्जन के बाद नदियों का हाल मूर्तियों के कबाड़ जैसा हो जाता था। 
हिंदुस्तान में धर्म का स्वरूप बहुत ही घातक और नुकसानदेह हो चुका है। मुंबई हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद उसी शहर में दो दिन पहले जन्माष्टमी पर दही की हांडी को अदालती-सीमा से कई गुना अधिक ऊंचाई पर टांगा गया, और वहां तक चढऩे के फेर में सैकड़ों लोग घायल हुए। अभी छत्तीसगढ़ में ही बिजली विभाग को यह नोटिस जारी करना पड़ा है कि गणेशोत्सव या दुर्गोत्सव में प्रतिमा पंडालों और आसपास की सजावट में बिजली चोरी न करें, वरना कार्रवाई की जाएगी। यह जाहिर है कि धार्मिक कार्यक्रमों के लिए बिजली चोरी, सड़क पर कब्जा, सरकारी जमीनों पर अवैध निर्माण, ट्रैफिक के बीच जुलूस निकालते हुए ट्रैफिक जाम, लाऊडस्पीकरों पर शोर करके लोगों का जीना हराम करना जैसे कई काम किए जाते हैं। ईश्वर से इनमें से किसी बात से शायद ही लेना-देना हो। कबीर कह गए थे कि मुल्ला मस्जिद की मीनार पर चढ़कर इस तरह, मुर्गे की तरह बांग देता है, कि मानो खुदा बहरा हो गया है। हिंदू धर्म के लोग भी हर त्यौहार पर इसी अंदाज में लाऊडस्पीकर बजाते हैं कि उनकी आवाज सीधे ही ईश्वर तक पहुंच जाए। 
भारत में धर्म कई किस्म के प्रदूषण का सबसे बड़ा गुनहगार हो गया है। लोग तालाबों और नदियों में धार्मिक सामानों को इस तरह डालते हैं कि मानो वे नदी-तालाब न हों, और घूरा हों। यह सिलसिला हर कीमत पर थामना होगा, क्योंकि आज भी गंगा का पानी पीना तो दूर रहा, नहाने के लायक भी नहीं बचा है। देश के तमाम तीर्थस्थान गंदगी से भरे पड़े हैं। वहां पहुंचने वाले श्रद्धालुओं का दर्शन करना भी बिना गंदगी को झेले नहीं हो सकता। और सरकार या समाज में से कोई लोग धार्मिक पाखंड पर कार्रवाई की बात करें, तो पुणे से लेकर बेंगलूरु तक ऐसे लोगों को गोली मारी जा रही है। आज अगर कबीर जिंदा होते, तो उनको गोली मारने के लिए धर्मांध और कट्टर पाखंडियों में मुकाबला चलते रहता। 
सरकारों को कुछ हौसला दिखाना चाहिए, और जल प्रदूषण से लेकर कोलाहल तक, ऐसी बातों को इसलिए रोकना चाहिए कि जब एक धर्म कानून को कुचलता है, तो दूसरे धर्म के कट्टर लोगों को लगता है कि कानून को न कुचलने तक उनकी आस्था अधूरी रहेगी। देखा-देखी हिंसा बढऩे लगती है, और लहू बहने के पहले भी लोगों की जिंदगी से सुख-चैन और सुविधाओं को छीनकर धर्म उससे अधिक हिंसा करते रहता है। आज अगर नदी-तालाब का प्रदूषण रोका नहीं गया, तो उनके पानी में सिर्फ धार्मिक कचरा, और जहर रह जाएंगे, और इंसान वहां उतर भी नहीं पाएंगे। प्रकृति और पर्यावरण पर धार्मिक हिंसा रोकना जरूरी है।

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