तिलक की भावना को गणेश के आशीर्वाद से आगे बढ़ाने की जरूरत

संपादकीय
17 सितंबर 2015

भारत में गणेशोत्सव देश के एक विख्यात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अंग्रेज राज के समय भारतीयों में एक सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता के मकसद से शुरू किया था। आज न अंग्रेज राज रहा, और न स्वतंत्रता संग्राम रह गया। लेकिन सामाजिक-राजनीतिक जागरूकता की जरूरत शायद आज उस वक्त के मुकाबले कुछ अधिक ही है। लेकिन यह देखें कि भारत के बहुत बड़े हिस्से में बड़े जोश-खरोश से मनाया जाने वाला गणेशोत्सव आज कितनी चेतना फैला पा रहा है, तो बड़ी निराशा हाथ लगती है। 
गणेश खुद होकर तो कोई चेतना फैला नहीं सकते लेकिन वे शायद दुनिया के ऐसे सबसे उदार भगवान हैं जो कि अपनी प्रतिमा के साथ, अपनी झांकियों के साथ, अपने हुलिए के साथ लोगों को हर किस्म की आजादी लेने देते हैं। और इसका नतीजा यह होता है कि हर बरस गणेश झांकियां उस साल की घटनाओं से जुड़ी रहती हैं, और लोगों को साल भर की घटनाओं की याद भी दिलाती हैं। लेकिन क्या ऐसी याद सामाजिक-राजनीतिक चेतना को बढ़ाने और फैलाने के लिए काफी है? और गणेशोत्सव का कितना हिस्सा, आयोजन समितियों के खर्च का कितना हिस्सा इस चेतना पर खर्च होता है, अगर इसको देखें, तो निराशा और भी बढ़ जाती है। अधिकतर पैसा प्रतिमा पर, सजावट पर, झांकियों पर, प्रतिमा लाने और विसर्जन कर खर्च हो जाता है, और ऐसे आयोजन का कोई बौद्धिक, सैद्धांतिक, और सामाजिक योगदान वाला उपयोग नहीं हो पाता। 
लोकमान्य तिलक ने गणेशोत्सव को एक और धार्मिक समारोह बनाने के लिए इस तरह शुरू नहीं किया था। गणेश तो वैसे भी हिन्दू धर्म और भारतीय परंपराओं के मुताबिक अपार महत्व पाते ही हैं। हिन्दू रीति-रिवाजों में किसी भी शुभ काम को शुरू करने के पहले सबसे पहली पूजा गणेश की ही होती है। इसलिए गणेशोत्सव से गणेश को कोई अलग महत्व नहीं मिल सकता, तब तक जब तक कि इस मौके का इस्तेमाल देश और समाज के लिए न हो। अगर यह एक और धार्मिक अनुष्ठान बनाकर रख दिया जाएगा, तो गणेश जैसे उदार मन के देवता की उदारता बिना इस्तेमाल के रह जाएगी। इसलिए इस मौके पर जिम्मेदार गणेशोत्सव समितियों को समाज के भले के बहुत से काम करने चाहिए। जहां पर आस्थावान लोगों का मेला जुटता है, वहां पर नेत्रदान के लिए, रक्तदान या देहदान के लिए जागरूकता फैलाई जा सकती है, लोगों को उनके घरों के बेकार सामान समाज के जरूरतमंदों को बांटने के लिए जागरूकता फैलाई जा सकती है, और तरह-तरह के पर्चों, तरह-तरह के भाषण के रास्ते महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा लोगों को समझाया जा सकता है। भारत के बहुत से राज्यों में गणेशोत्सव करोड़ों लोगों को खींचता है, और ऐसे मौके हाथ से जाने नहीं देना चाहिए। सिर्फ रौशनी, सिर्फ संगीत, और सिर्फ हंगामे से गणेशोत्सव का महत्व घट जाता है। देश में ऐसे त्यौहार कम हैं जिनमें इतने दिनों तक इतने लोग एक ऐसे भगवान के दर्शन को पहुंचते हैं, जो उसके साथ किए जाने वाले किसी भी तरह के मजाक का बुरा नहीं मानता। किसी भी और धर्म के ईश्वर, या हिन्दू धर्म के ही बाकी किसी भी देवी-देवता के साथ ऐसी छूट नहीं ली जा सकती। इसलिए हमारी सलाह यह है कि समाज के जिम्मेदार लोग गणेशोत्सव के ऐसे आयोजन की जगहों पर तरह-तरह की विचारोत्तेजक बहस, वाद-विवाद, नारे और पोस्टरों की प्रतियोगिता, जैसे आयोजन और करें, ताकि लोकमान्य तिलक की भावना को, भगवान गणेश के आशीर्वाद से आगे बढ़ाया जा सके। 

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