लहरों पर शरणार्थियों की मौत देशों के सभ्य और असभ्य होने के सुबूत इतिहास बन रहे हैं...

6 सितंबर 2015
संपादकीय
सीरिया और आसपास के इलाकों से वहां चल रहे गृहयुद्ध में मारे जा रहे लोगों से परे जो लोग बच पा रहे हैं, वे अपने परिवार को लेकर योरप की तरफ बढ़ रहे हैं, ताकि वहां शरण ले सकें। ऐसे दसियों लाख लोगों को आज शरण की जरूरत है, और पिछले कुछ महीनों में लगातार समंदर में हजारों लोग मारे गए हैं जो कि मोटरबोट पर लदकर, उसे ओवरलोड करते हुए समंदर के रास्ते योरप जा रहे थे। ऐसे ही एक बच्चे की तस्वीर ने दुनिया को विचलित कर दिया जो कि सीरिया से मां-बाप के साथ निकला था, और अपने छोटे से भाई के साथ समंदर में मारा गया। यह वह वक्त है जब दुनिया के देशों के सभ्य होने, और उनमें इंसानियत होने का सुबूत मिलता है। सीरिया के आसपास के, मध्य-पूर्व के, खाड़ी के देशों के कई शाह और शेख तेल के कुओं पर बैठे हुए अय्याशी कर रहे हैं, सऊदी अरब जैसे देश इस्लाम का धर्म केंद्र होने के नाम पर दुनिया के मुस्लिमों के बीच एक साम्राज्य चल रहे हैं, लेकिन इसी मुस्लिम बिरादरी के लोग मारे जा रहे हैं, और सऊदी अरब जैसे अतिसंपन्न देशों के चेहरों पर शिकन भी नहीं है। 
दूसरी तरफ योरप के देश हैं जो कि सीरिया जैसे देशों से आ रहे लोगों से संस्कृति में अलग हैं, धर्म की आबादी की बहुतायत में अलग हैं, लेकिन फिर भी ऐसे देशों ने अपने दरवाजे शरणार्थियों के लिए खोल दिए हैं। इनमें जर्मनी सबसे आगे है जिसने करीब आठ लाख शरणार्थियों को बसाहट का ऐलान किया है। आज ही ऑस्ट्रिया, फिनलैंड ने भी दरवाजे खोले हैं, और दुनिया पर एक वक्त राज करने वाले ब्रिटेन ने दरवाजे बंद रखे हैं। इतिहास इन तमाम बातों को दर्ज करते चल रहा है। एक वक्त जर्मनी के हिटलर की नस्लभेदी ज्यादतियों को भी इतिहास ने दर्ज किया था, और एक वक्त जब इराक पर हमले के लिए अमरीकी गिरोह में शामिल होने से जर्मनी ने मना कर दिया था, तो वह बात भी इतिहास में दर्ज है, और आज लोगों की जिंदगी बचाने के लिए जर्मनी जो कर रहा है वह भी दर्ज है। इसके पहले भी लोगों को याद होगा कि तुर्की से जर्मनी पहुंचे हुए प्रवासियों को जर्मनी ने जिस तरह उन्हें वहां बसने का एक मौका दिया था, वह भी योरप के हिसाब से एक बड़ी उदारता थी।
लोगों को यह भी याद है कि जब पूर्वी पाकिस्तान के साथ पश्चिमी पाकिस्तान के लोगों ने अलोकतांत्रिक बर्ताव किया था, और वहां फौजी ज्यादती की थी, तो पूर्वी पाकिस्तान से भारत में दाखिल हुए लाखों शरणार्थियों को भारत ने जगह दी थी, और भारत के लोगों पर एक शरणार्थी टैक्स लगाकर उनका खर्च भी जुटाया था। ऐसे दसियों हजार लोग उस वक्त छत्तीसगढ़ में भी बसाए गए थे, और बाद में बांग्लादेश बना तो ये लोग बांग्लादेशी शरणार्थी कहलाए। भारत ने एक वक्त अफगानिस्तान से आए हुए दसियों हजार शरणार्थियों को जगह दी थी, और तिब्बत का मामला तो सबके सामने है कि चीन की नाराजगी की परवाह न करते हुए भी भारत ने तिब्बत को मान्यता दी थी, और वहां से आए लाखों लोग आज भी भारत में बसे हुए हैं। यह भी एक संयोग है कि छत्तीसगढ़ में बांग्लादेशी शरणार्थी भी हैं, तिब्बती शरणार्थी भी यहां बसाए गए हैं, और पाकिस्तान से आकर यहां शरण की मांग करने वाले हजारों सिंधी नागरिक भी छत्तीसगढ़ में रूके हुए हैं। 
किसी भी देश के सभ्य होने का सुबूत ऐसे ही मौकों पर दर्ज होता है। किसी देश की संपन्नता से वह देश सभ्य नहीं हो जाता, किसी देश की फौजी ताकत से भी वह देश सभ्य नहीं हो जाता। अमरीका के पास ये दोनों ही चीजें हैं, वह दुनिया का सबसे संपन्न देश भी है, और वह दुनिया की सबसे बड़ी फौजी ताकत भी है, लेकिन वह दुनिया का सबसे बड़ा असभ्य, और सबसे बड़ा हमलावर देश भी है। आज जो संपन्न लोग दुनिया के शरणार्थियों को मरते देखते हुए भी अपनी संपन्नता में डूबे बैठे हैं, ऐसे सऊदी अरबियों को इतिहास देखेगा, और धिक्कारेगा। इसी वक्त यह भी साबित हो रहा है कि लोग अपने धर्म के उन्हीं लोगों की मदद करने को आगे बढ़ते हैं, जिनसे उनका खुद का कुछ भला हो सके। जरूरतमंदों के लिए दरवाजे न खोलने, और उनको मरने के लिए समंदर के हवाले कर देने वालों का फैसला उनका अपना खुदा करेगा।

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