चैनल पर आदमी और औरत की मारपीट के बाद अब और क्या?

14 सितंबर 2015
संपादकीय

एक टीवी चैनल पर राधे मां को लेकर चल रही बहस के दौरान राधे मां वाले हिन्दू धर्म से ही जुड़े हुए दो भगवाधारी लोगों के बीच जीवंत प्रसारण पर मारपीट आने लगी, तो टीवी देखते लोग हक्का-बक्का रह गए। ये दोनों ही धर्मगुरू के रूप में इस बहस में स्टूडियो में पेश किए गए थे, और इस आदमी और इस औरत का पहले शायद किसी ने नाम भी न सुना हो, लेकिन हिन्दुस्तान में जटा और भभूत रहने पर कोई भी साधू कहला सकते हैं, भगवा साड़ी में हर महिला साध्वी कहला सकती है, और संत तो किसी भी कपड़े में कोई भी कहला सकते हैं। ऐसे में टीवी चैनल के स्टूडियो में आपस में मारपीट करते आदमी और औरत को धर्मगुरू का दर्जा पाने के लिए कोई खास मेहनत नहीं करनी पड़ती, कपड़ों के रंग से धर्म के ओहदे तय हो जाते हैं। 
हिन्दुस्तानी मीडिया में एक दिक्कत खड़ी हो रही है कि टीवी चैनलों के पास वक्त हर दिन पूरे चौबीस घंटे का खड़ा हो जाता है, और यह भूखा वक्त हर पल खाने को मांगता है। इसी तरह अखबारों में पन्ने बढ़ते चले गए हैं, और उनको भरने के लिए हर गैरखबर को भी खबर मानने की मजबूरी वहां काम करने वाले लोगों की हो गई है। ऐसे में समाचार और विचार में जितने बड़े पैमाने पर मिलावट हो रही है, वह देखने के लायक है। टीवी चैनलों में चूंकि अखबारों के संपादकीय की तरह विचारों के कॉलम अलग से नहीं होते, इसलिए वहां के रिपोर्टर ही, या स्टूडियो में बैठे प्रस्तुतकर्ता भी, समाचारों के तथ्यों के साथ-साथ अपने विचारों की मनमानी मिलावट करके उसे खबर की शक्ल में पेश करते हैं। फिर अखबारों में पाठक को बांधने के लिए एक पन्ने पर कई खबरें हो सकती हैं, और पाठक पन्नों को पलट-पलटकर देख भी सकते हैं, और मनचाही खबरों पर रूक सकते हैं, अनचाही खबरों को छोड़ सकते हैं, लेकिन टीवी की अपनी सीमाएं हैं, और वहां पर खबरें रेल के डिब्बों की तरह एक के पीछे एक लगी रहती हैं, और दर्शक के सामने एक खबर को छोड़कर उसके बाद की खबर तक जाने की सहूलियत नहीं होती, इसलिए दर्शक सीधे चैनल बदलने का काम करते हैं। ऐसे नुकसान से बचने के लिए टीवी चैनलो के सामने यह मजबूरी रहती है कि दर्शक को पल-पल बांधकर रखा जाए। एक बहुत ताकतवर जंगली जानवर को जंजीर से बांधकर रखना कुछ आसान काम हो सकता है, लेकिन टीवी समाचार चैनल के दर्शक को एक ही चैनल से बांधकर रखना उसके मुकाबले खासा अधिक मुश्किल काम है। 
ऐसे में स्टूडियो में मारपीट चैनल का एक नफा है, क्योंकि यह मारपीट दर्शक को बांधकर रख सकती है, और अगले दिन खबर तो बनती ही है। अब देखना यह है कि पीछे रह गए बाकी समाचार चैनल किन और लोगों के बीच मारपीट करवा सकते हैं, या किन और लोगों के बीच मारपीट से अधिक कुछ करवा सकते हैं। यह बाजारू मुकाबला अखबारों में हो, या कि टीवी चैनलों में, है बहुत भयानक। और पन्नों को और घंटों को भरने के चक्कर में समाचार और विचार के फासले को खत्म कर दिया गया है, और महत्वहीन तथ्यों को समाचार की तरह पेश करने की मजबूरी अखबारों के सामने भी आ गई है। ऐसे मीडिया के ग्राहकों को कई बार मीडिया के बाजारू मुकाबले के चलते यह भी पता नहीं चलता कि लुभावनी और चटपटी, सनसनीखेज और भांडाफोड़ खबरों से परे कौन सी ऐसी घटनाएं देश-प्रदेश और दुनिया में हो रही हैं जो कि जिंदगी के लिए सचमुच मायने रखती हैं। जब तक कुछ बिकाऊ नहीं है, दर्शनीय और पठनीय नहीं है, तब तक ऐसी खबरों का मीडिया के लिए महत्व अब खो चुका है। 
अब विज्ञापन देने वाला बाजार भी ऐसी ही खबरों को चाहता है जो कि चाहे महत्वहीन हों, लेकिन लोगों को बांधकर रख सकें। ऐसे रस्सी से बांधे गए जानवरों को बाजार अपनी मर्जी का चारा परोस और खिला सकता है, और वही बाजार का सपना होता है। आने वाले दिनों में टीवी चैनलों पर एक भगवा आदमी, और एक भगवा औरत के बीच मारपीट से आगे और होता है क्या, इसका इंतजार करें। 

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