मीडिया को कभी-कभी अपने मुद्दों पर भी लिख लेना चाहिए

संपादकीय
9 सितंबर 2015

सीरिया और मध्य-पूर्व के बाकी देशों से गृहयुद्ध से जान बचाकर जो लोग योरप के देशों में शरण के लिए पहुंचने वाले लोगों को लेकर हम इस जगह इसी पखवाड़े एक-दो बार लिख चुके हैं, लेकिन एक ताजा मामला ऐसा आया है जो कि इन शरणार्थियों के अपने देशों, शरण देने वाले देशों, और संयुक्त राष्ट्र की भूमिका या असर से परे, मीडिया को लेकर है। अभी हंगरी में पुलिस ऐसे पहुंचे हुए शरणार्थियों को दौड़ा रही थी, और उसकी शूटिंग करने वाले एक टीवी चैनल की कैमरापर्सन ने रिकॉर्डिंग के साथ-साथ एक हरकत की, जिसकी वजह से उसकी नौकरी चली गई। एक आदमी अपने बच्चे को लेकर भाग रहा था, और इस कैमरापर्सन ने पांव बढ़ाकर उसे उलझाया और गिरा दिया। इन दिनों हर जगहों पर कई कैमरे रहते हैं, इसलिए उसकी यह हरकत तुरंत रिकॉर्ड हो गई, और इंटरनेट की मेहरबानी से पूरी दुनिया ने इसे देख लिया। उसकी कंपनी ने उसे तुरंत बर्खास्त कर दिया, और चारों तरफ दुनिया उसे कोस रही है। 
अब यहां पर यह समझने की जरूरत है कि मीडिया में काम करने वाले लोग, चाहे वे रिपोर्टर हों, चाहे वे फोटोग्राफर हों, चाहे वे दफ्तर में बैठकर विचार लिखने वाले लोग हों, उनकी अपनी कोई न कोई जाति होती है, कोई न कोई धर्म होता है, कोई न कोई नागरिकता होती है। इन सबके चलते हुए मीडिया में काम करना, और अपने सभी तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त रहना आसान बात नहीं है। धर्म से परे भी देश के लिए जिन बातों से खतरे की आशंका हो, जिन लोगों का खानपान पसंद न हो, जिन लोगों का रंग पसंद न हो, जिनकी जुबान अच्छी न लगती हो, उनके लिए नापसंदगी को पूरी तरह खत्म कर पाना बड़ा मुश्किल काम होता है। और ऐसे में मीडिया के बहुत से लोगों के मन जो कि कैमरों पर कैद नहीं हो सकते, वे अपने पूर्वाग्रहों के साथ काम करते हैं। कहीं यह बात छलककर सामने आती हैं, और बहुत से मामलों में इसलिए खप जाती है कि मीडिया को पढऩे वाले, या देखने-सुनने वाले लोग भी उसी किस्म के पूर्वाग्रहों वाले रहते हैं, और उनको कुछ भी अटपटा नहीं लगता। 
अब पश्चिम के देशों, और योरप के देशों की एक बड़ी स्वाभाविक फिक्र यह है कि मुस्लिम देशों से इतनी बड़ी संख्या में आकर शरणार्थी उनके देशों में बसेंगे, तो पता नहीं इनमें से कितने लोग आज दुनिया में इस्लाम के नाम पर चल रहे आतंक के हिस्सेदार होंगे, या आगे चलकर हो जाएंगे? इनमें से कितने लोग वहां की आबादी में धार्मिक संतुलन को आज और आने वाले कल में कितना बदल देंगे? वहां की समाज और संस्कृति की बातों पर दूसरी संस्कृति से आए इन लोगों का कितना असर पड़ेगा? देशों की अर्थव्यवस्था पर ये लोग कितना बोझ होंगे? ऐसी फिक्र से गुजर रहे देशों में मीडिया के लोग भी इंसान होने के नाते कुछ या अधिक दूर तक फिक्रमंद हो सकते हैं, और वैसी फिक्र या वैसी नफरत के चलते हंगरी की यह कैमरावूमैन टांग अड़ाते, शरणार्थी गिराते पकड़ाई, और उसका अपना भविष्य भी उसी तरह जमीन पर मुंह के बल गिरा, जिस तरह उसने एक आदमी और गोद के बच्चे को गिराया। 
मीडिया की जिम्मेदारी जिस तरह की है, उसमें काम करने वाले लोगों को अपने पूर्वाग्रहों से, अपनी नफरत से, या अपने लगाव से बचने की कोशिश करनी चाहिए। यह कहना आसान है, और ऐसा हो पाना खासा मुश्किल है, लेकिन फिर भी लोगों को ऐसा करना चाहिए। लगातार ऐसी कोशिश ही मीडिया के लोगों को एक बेहतर पेशेवर इंसान बना सकती है। हम अपने अखबार में जब कभी भारत और किसी और देश के बारे में लिखते हैं, तो देश की सरहद से ऊपर उठकर लिखते हैं। जब किसी जाति या धर्म के बारे में लिखते हैं, तो उससे संबंधों को अलग रखते हुए लिखते हैं। अगर लोग बारीकी से ध्यान देकर अपने आपको किसी तबके से अलग रखकर, ऊपर उठाकर काम करें, तो निष्पक्ष होना इतना मुश्किल भी नहीं है। और पाठकों या दर्शकों में समझदार लोगों का एक तबका ऐसा जरूर रहता है जो कि ईमानदारी या निष्पक्षता की कीमत समझता है। मीडिया औरों के मुद्दों पर तो रोज ही लिखता है, अपने खुद के मुद्दों पर भी कभी-कभी लिख लेना चाहिए। 

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