दबे हुए इतिहास को तो उजागर होना ही चाहिए

29 सितंबर 2015 
संपादकीय

नेताजी सुभाष चंद्र बोस का इतिहास हमेशा से रहस्य में घिरा रहा है। उनकी मौत को लेकर भी दशकों तक यह अटकल चलती रही कि वे मर चुके हैं या कहीं साधू बनकर जी रहे हैं। देश पर आधी सदी से अधिक राज करने वाली कांगे्रस पार्टी के भीतर सुभाष बाबू को नेहरू का एक बड़ा प्रतिद्वंद्वी माना जाता था, इसलिए यह भी माना गया कि नेहरू की दिलचस्पी सुभाष चंद्र बोस के न रहने में जरूर रही होगी। ऐसी गंभीर शंका के लिए सुबूत तो नहीं थे, लेकिन इस बात के सुबूत जरूर थे कि नेहरू सरकार ने लगातार नेताजी पर सरकारी खुफिया एजेंसियों से निगरानी करवाई थी। इस सिलसिले में इतने किस्म के फर्जी और गढ़े हुए कागजात भी हमेशा लोगों के बीच तैरते रहे, कि जिसको जैसा नतीजा निकालना हो, उस किस्म के कागज लेकर आरोप लगाना जारी रहा। ऐसे में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी ने यह हिम्मत दिखाई है कि आजादी के पहले से लेकर अब तक के बंगाल सरकार के नेताजी से संबंधित कागजात वे जारी कर रही हैं। इससे एक तो नेहरूवादियों को अपने प्रिय नेता पर लगे हुए आरोपों में से अगर कोई आरोप बेबुनियाद होंगे, तो उनको हटाने का एक मौका मिलेगा। और दूसरी बात यह भी होगी कि जो लोग आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर भारतीय इतिहास के इस सबसे महत्वपूर्ण दौर का इतिहास लिख रहे थे, अब उनके हाथ कुछ नई बुनियाद लगेगी।
हमारा यह मानना है कि इतिहास को बहुत छुपाकर रखना मुजरिमों का काम होता है। जब इतिहास इतना पुराना हो चुका रहता है कि वह वर्तमान को नुकसान नहीं पहुंचा सकता, तब उसका उजागर हो जाना सबके भले का रहता है। भारत में लोगों को याद होगा कि कई बरस पहले देश के एक बड़े नेता रहे मौलाना अबुल कलाम आजाद की लिखी एक किताब का एक सील बंद रखा गया तीस पेज का हिस्सा सामने आया था जिसे उन्होंने अपनी मौत के बीस बरस बाद ही खोलने के लिए कहा था।  यह हिस्सा उनकी आत्मकथा इंडिया विन्स फ्रीडम, का अप्रकाशित हिस्सा था। इसमें उनके समकालीन कुछ लोगों के बारे में ऐसी आलोचना से भरे हिस्से थे जो कि सरकार के लिए और मौलाना के साथियों के लिए शर्मिंदगी की वजह बन सकते थे।
इतिहास के प्रति हर किसी की यह जिम्मेदारी रहती है कि वे अपने देश-प्रदेश की जनता, और अपने को जानने-मानने वाले लोगों के सामने इतिहास की जरूरी हकीकत को उजागर करके जाएं। इसलिए नेहरू ने अगर सुभाष चंद्र बोस के साथ कोई ज्यादती की थी, सरकार और खुफिया मशीनरी का बेजा इस्तेमाल किया था, तो भी वह बात अब सामने आनी चाहिए। गांधी हों, नेहरू हों, या गोडसे हो, इन सबकी हकीकत पूरी पारदर्शिता के साथ सामने आनी चाहिए। और यह भी हो सकता है कि नेताजी की उजागर हो रही फाईलों से नेहरू पर चली आ रही तोहमतें खत्म भी हों।
दुनिया के सभ्य देशों और विकसित लोकतंत्रों में सार्वजनिक जगहों पर रहे लोगों से जुड़ी हर बात उजागर करने का एक लगातार सिलसिला चलता है। दुनिया में सबसे अधिक साजिशों और हमलों का जिम्मेदार अमरीका भी शायद बीस बरस बाद तमाम फाईलों को उजागर कर देता है, और हो सकता है इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी हुई कुछ गोपनीय फाईलें हों, लेकिन अधिकतर हिस्सा सामने आ जाता है। यह भारत के लिए एक अच्छी बात है कि दबे हुए इतिहास के सामने आने का एक सिलसिला शुरू हो रहा है, और इससे अब सरकारों में बैठे लोग गलत काम करने के पहले यह याद रखेंगे कि आने वाले बरसों में इन कामों का इतिहास भी उजागर होगा।

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