इस देश में मजदूर-कर्मचारी कोई इंसाफ नहीं पा सकते

संपादकीय
2 सितंबर 2015
आज देश भर में जगह-जगह कर्मचारियों और मजदूरों की हड़ताल का बड़ा असर रहा। बरसों बाद इतनी बड़ी हड़ताल हुई, और बिना किसी हिंसा के मजदूर संगठनों, कर्मचारी संगठनों ने केन्द्र सरकार की मजदूर-नीतियों में हुए अन्यायपूर्ण फेरबदल का विरोध किया। यह हड़ताल मोटे तौर पर संगठित तबके के एक हिस्से तक सीमित रही, और देश के मजदूरों का जो बहुत बड़ा हिस्सा असंगठित है, उस वर्ग की हिस्सेदारी न तो मजदूर आंदोलनों में हो पाती है, और न ही मजदूरों के लिए जो कानून बनते-बिगड़ते हैं, उनमें असंगठित मजदूरों की जगह रहती। मजदूरों की इस हड़ताल से जुड़ी मांगें कल ही इसी पन्ने पर हमने विस्तार से छापी थीं, इसलिए आज उस पर अधिक चर्चा जरूरी नहीं है, लेकिन देश के मजदूर-मोर्चे से जुड़ी दो बातों पर बात करना जरूरी है। 
मोदी सरकार आने के बाद कारखानेदारों को बढ़ावा देने के लिए, दुनिया भर के देशों से पूंजीनिवेश खींचकर लाने के लिए मजदूर कानूनों को जिस तरह कारखानेदारों के हित में बदला गया है, उससे भारत के मजदूरों की हालत धीरे-धीरे चीन के उन मजदूरों की तरह हो जाएगी, जो कि वहां आर्थिक उदारवाद के बाद मजदूरों को मशीन का पुर्जा बना चुकी है। वामपंथी दलों को छोड़कर इस देश में कोई ऐसे मजदूर संगठन या कर्मचारी संगठन नहीं बचे हैं, जो कि इन मुद्दों की समझ रखते हों। कांग्रेस पार्टी ने तो देश और प्रदेशों में अपने मजदूर संगठन इंटक में ऐसे लोगों को बड़े-बड़े पदाधिकारी बनाकर रखा है जिन्होंने जिंदगी में मजदूरों को कभी करीब से देखा भी नहीं है। जिस तरह एक घरेलू या जेबी पार्टी चलती है, उसी तरह से कांग्रेस ने मजदूर संगठन को ढाल रखा है। दूसरी तरफ आज केन्द्र में भाजपा की अगुवाई वाली मोदी सरकार के रहने से भाजपा से जुड़े मजदूर संगठन, भारतीय मजदूर संघ ने अपने आपको इस हड़ताल से अलग कर लिया है। इसलिए आज जहां-जहां भाजपा का राज है, वहां इस संगठन से मजदूर कोई उम्मीद नहीं कर सकते। कांग्रेस से तो मजदूर कोई भी उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि उसका मजदूरों के लिए रूख कमोबेश वही रहते आया है जो कि आज मोदी सरकार का है। ऐसे में वामपंथी मजदूर संगठन अकेले ऐसे बच गए हैं जो कि देश में अपनी सत्ता लगभग खत्म हो जाने के बाद भी वामपंथी दलों की वैचारिक प्रतिबद्धता के चलते हुए काम कर रहे हैं, और कम से कम हक की बात को तो सामने रख रहे हैं। देश के राजनीतिक संगठनों में मजदूर संगठनों का दीवालिया होना एक बड़े नुकसान की बात रही है। 
अब दूसरी बात मजदूर कानूनों पर अमल की है। पूरे देश में जगह-जगह राज्य सरकारों का हाल मजदूरों और कर्मचारियों के हक के लिए बहुत ही गैरजिम्मेदारी का है। असंगठित मजदूरों की बात तो छोड़ ही दें, जो मजदूर या कर्मचारी संगठित वर्ग के हैं, और जिनके लिए मजदूर कानूनों का जिक्र भी जगह-जगह होता है, न तो ऐसे लोगों को कोई कानूनी हक मिलता, और न ही मामला मजदूर अदालतों तक पहुंचने पर वहां से कोई इंसाफ मिलता। लोगों का देखा हुआ है कि किसी कारखाने या संस्थान में हड़ताल होने पर दस-बीस हजार रूपए में ही उस हड़ताल को अवैध घोषित करवाने में मजदूर अदालतें जुट जाती हैं। किसी हादसे के बाद बरसों गुजर जाते हैं, लेकिन मजदूरों को मुआवजा नहीं मिल पाता, उनके घरवालों को भी बरसों तक मुआवजे के लिए धक्के खाने पड़ते हैं। 
आज इन्हीं दो बातों को दूर करने की जरूरत है। एक तो यह कि राजनीतिक दलों को अपने मजदूर संगठनों को ईमानदारी से मजबूत करना चाहिए, और उनको ईमानदार रखना चाहिए। हो सकता है कि यह उम्मीद बहुत अधिक हो, लेकिन जब तक देश की राजनीति में ईमानदार राजनीतिक दलों को बढ़ावा नहीं मिलेगा, कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां अपने बेअसर मजदूर संगठनों को कागजी शेर की तरह खड़ा भर रखेंगी, उनसे किसी मजदूर का कोई फायदा न हुआ है, न होगा। दूसरी तरफ चाहे जो पार्टी सत्ता में हो, और पार्टियों से परे जो सरकारी अफसर विभाग चलाते हैं, उनके वर्गहित मजदूरों और कर्मचारियों के वर्गहितों से बिल्कुल अलग रहते हैं। इसलिए कारखानेदार और कारोबारी अपनी मर्जी से मजदूर कानूनों की लुग्दी बनाकर उसे कुचलते रहते हैं, और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो पातीं। इस देश में आर्थिक उदारीकरण का यह भयानक नतीजा रहा है कि मजदूर और कर्मचारी कोई इंसाफ नहीं पा सकते। 

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