किसान की मौत के सिवा और कुछ मुमकिन नहीं

संपादकीय
30 अक्टूबर 2015

देश के एक प्रमुख सामाजिक विचारक रहे, और आम आदमी पार्टी में जाकर अपना महत्व खो बैठे योगेन्द्र यादव ने किसानों के मुद्दों के अध्ययन के बाद कहा है कि बैंक और बीमा कंपनियां किसानों के साथ तरह-तरह की बेईमानी कर रही हैं। उनका कहना है कि जब किसान बैंक से कर्ज लेता है तो बिना उससे पूछे, बिना उसकी अनुमति लिए जबर्दस्ती उसके अकाउंट से पैसा काटकर बीमा करवा दिया जाता है। बीमा करवाना है या नहीं इसका फैसला किसान नहीं ले सकता। बीमा किस कंपनी से करवाना है, किन शर्तों पर करवाना है यह भी किसान के हाथ में नहीं। बैंक खुद फैसला करता है। बीमे के बाद कोई कागज किसान के हाथ में नहीं होता। दुर्घटना की हालत में उसे नहीं पता होता कि उसे बीमे का क्या भुगतान मिलना चाहिए। जब फसल खराब होती है तो भी किसान को नहीं मालूम कि वह कहां जाए, कहां दावा करे।
छत्तीसगढ़ में भी किसानों के फसल बीमा को लेकर तरह-तरह की साजिशें होती रही हैं। कहीं किसान के बोए हुए रकबे से अधिक का बीमा करवाकर सहकारी समितियां या बैंक उसका प्रीमियम उसके खाते से सीधे ही घटा देते हैं, तो कभी मौसम आधारित बीमा होने से उसको किसी तरह का फायदा, फसल बर्बाद होने पर भी नहीं मिल पाता। दरअसल किसान की बदहाली सरकार और बाजार की मिलीजुली साजिश का नतीजा है। एक तरफ तो घटिया बीज की शिकायत बनी रहती है, दूसरी तरफ खेतों में सरकार की तरफ से जो योजनाएं लागू होती हैं, उनमें बीज, पौधों, खाद, मशीनों, सिंचाई पंपों से लेकर खेत के भूमि-सुधार तक, बहुत सी बातों में सरकारी दखल भ्रष्टाचार से भरी हुई है। नतीजा यह होता है कि गरीब किसान मौसम की मार भी झेलता है, और सरकार की मार भी, और इससे भी आगे बढ़कर जब वह बाजार की मार झेलता है, तो फिर वह टूट ही जाता है। जब उसकी खेती सरकारी कर्ज पर टिकी रहती है, तो जो बैंक और जो सहकारी समितियां उसके कर्ज से लेकर खाद-बीज तक के काम में लगी रहती हैं, वे सब एक बड़े संगठित भ्रष्टाचार में भागीदार बन जाती हैं। 
आज हिन्दुस्तान के शहर सोने की महंगाई की शिकायत नहीं करते, पेट्रोलियम के दाम जब चाहे तब पांच-दस फीसदी घट-बढ़ जाते हैं, लेकिन उसकी शिकायत कोई नहीं करते। लेकिन जब किसान की उपज के दाम बढ़ते हैं, तो शहरों को लगता है कि उनका खून चूसा जा रहा है। बाजार किसान की उपज के बाद जितना मोटा मुनाफा कमाता है, उतना किसान पूरी जिंदगी में कभी नहीं कमा सकता। और अब तो वायदा कारोबार के नाम पर, कभी आयात और कभी निर्यात के फैसलों के रास्ते, बाजार जैसा मोटा मुनाफा कमाता है, उसका कोई हिस्सा किसान तक कभी नहीं पहुंच पाता। यही वजह है कि देश भर में जगह-जगह किसान आत्महत्या कर रहे हैं, और राज्य सरकारें लगातार यह साबित करने में लगी रहती हैं कि ये आत्महत्या खेती की वजह से नहीं हैं, किसी निजी वजह से हैं। भारत में खेती की अर्थव्यवस्था को इस तरह खत्म किया जा रहा है, कि बड़े-बड़े पूंजीपति ही बड़ी-बड़ी खर्चीली खेती कर सकें, और छोटे किसान पानी को तरसते रह जाएं, और बैंक-बीमा कंपनियों से कभी कोई मुआवजा न पा सकें। 
आज देश की सरकार की जो सोच है, उसमें खेती की कोई प्राथमिकता नहीं है। किसानों के बजाय सरकार की दिलचस्पी उन लोगों में हैं जो कि बड़ा-बड़ा आयात कर सकते हैं। कभी प्याज तो कभी दाल, तो कभी तेल, इन सबकी महंगाई को पहले सोच-समझकर आसमान पर ले जाया जाता है, और उसके बाद इन सामानों को आयात करने का एक माहौल बनाया जाता है, ताकि गिने-चुने इम्पोर्टर रातों-रात अरबों की कमाई कर सकें। देश के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में सरकारों की दिलचस्पी जरा भी नहीं है। हम पहले भी इस जगह लिख चुके हैं कि भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती के साथ-साथ बहुत से और स्वरोजगार जब तक नहीं जोड़े जाएंगे, तब तक किसान का जिंदा रहना मुश्किल होगा। लेकिन हस्तशिल्प से लेकर दूध, फल, सब्जी, शहद, और फूल जैसे दर्जनों दूसरे काम हैं जिनको गांवों से जोडऩे पर किसान मौसम की मार को बर्दाश्त करने लायक बन सकेेगा। अभी तो जब कुदरत ऊपर से मार करती है, तब बैंक, बीमा, बाजार, और सरकार जमीन पर से उस पर मार करते हैं। ऐसे में किसान की मौत के सिवाय और कुछ मुमकिन नहीं है। 

जनता के पैसों से स्मारक पर रोक, का मोदी का फैसला सही, लेकिन खुद भी तो वही किया है

संपादकीय
29 अक्टूबर 2015

दिल्ली में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के जीवनकाल का सरकारी बंगला उनके स्मारक में बदलने से मोदी सरकार ने मना कर दिया है। यह सरकार के उस फैसले के तहत है जो कुछ महीने पहले घोषित किया जा चुका था, कि किसी मंत्री-सांसद, या किसी और की स्मृति में किसी सरकारी बंगले को स्मारक में नहीं बदला जा सकता। इस बात को लेकर कुछ लोग सरकार की आलोचना कर रहे हैं, और इसे डॉ. अब्दुल कलाम का अपमान करार दे रहे हैं, लेकिन हम सरकार के इस फैसले के हिमायती हैं। 
इस देश में स्मारकों के नाम पर जनता की छाती पर खूब बोझ डाला हुआ है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार ने अपने पिता बाबू जगजीवन राम की स्मृति में उनका रहा हुआ बंगला स्मारक बनवाने के लिए अपनी ही पार्टी की यूपीए सरकार से खासी खींचतान की थी। उनके अलावा भी कभी चौधरी चरणसिंह के रहे हुए बंगले को स्मारक बनाने की बात उठती है, तो कभी किसी और की याद को जनता के खर्च से जिंदा रखने की। दिल्ली में महात्मा गांधी, नेहरू, इंदिरा, राजीव की समाधियों के साथ-साथ उन्हीं के टक्कर की एक समाधि ऐसे संजय गांधी की याद में भी बनाई गई है जिनका इस देश में योगदान महज इमरजेंसी थी। न तो वे किसी ओहदे पर रहे, और न ही अपने परिवार के दो और लोगों की तरह उनकी जिंदगी किसी आतंकी हमले में गई थी। ऐसे में सरकारी खर्च पर दिल्ली में एक बड़ी सी समाधि पूरी तरह नाजायज थी, और वह जनता की छाती पर हमेशा के लिए एक बोझ रहेगी। यह सिलसिला आगे बढ़ाना बहुत गलत होगा। 
लेकिन मोदी सरकार के ही कुछ और फैसलों को देखने की जरूरत है। मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के पहले से सरदार पटेल की एक प्रतिमा को अमरीका की स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से दुगुनी ऊंचाई की बनाने की घोषणा की थी, और एक सामाजिक-राजनीतिक अभियान चलाकर देश भर से उस प्रतिमा के लिए गांव-गांव से लोहा मांगा गया था। लोगों को लग रहा था कि जनसहयोग से मिले लोहे से भारतीय इतिहास के इस लौह पुरूष की प्रतिमा बनेगी। लेकिन बाद में पता लगा कि केन्द्र या गुजरात सरकार कुछ हजार करोड़ रूपए खर्च करके यह स्मारक बनवा रहे हैं। खबर तो यह भी है कि भारत की एक बड़ी कंपनी चीन की किसी कंपनी के साथ मिलकर इस प्रतिमा को बना रही है, और जनसहयोग के लोहे का क्या हुआ इसकी कोई खबर नहीं है। स्मारकों की चर्चा करें तो एक दूसरी बात याद आती है। उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री रहते हुए मायावती ने दलित समुदाय के देश के सबसे महान नेता बाबा साहब आंबेडकर, अपनी खुद की बसपा के संस्थापक कांशीराम, अपनी पार्टी के चुनाव चिन्ह हाथी, और अपनी खुद की जैसी विशाल प्रतिमाएं राजधानी लखनऊ में बनवाई, और उन पर जिस तरह से लाखों करोड़ रूपए दाम की जमीन, और हजार करोड़ के करीब की लागत झोंकी गई, वह भारत में सबसे हिंसक स्मारक बना है। इसके बनाने में जो भ्रष्टाचार हुआ, और उस पर सुप्रीम कोर्ट में जो मामला चल रहा है, उस पर हम अभी नहीं जाते। लेकिन लोगों की नीयत स्मारकों को लेकर जो है, उसका सबसे अश्लील प्रदर्शन मायावती की तरफ से किया गया, जब उन्होंने अपनी खुद की प्रतिमाओं पर इस तरह से जनता की दौलत के हजारों या लाखों करोड़ एक पूरा पार्क बनवाने में खर्च किए। लेकिन बात यहीं पर खत्म नहीं होती है। जिस तरह गुजरात में सरदार पटेल की आसमान छूती प्रतिमा बनवाई जा रही है, ठीक उसी तरह महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा अपने आदरणीय ऐतिहासिक शिवाजी का एक स्मारक समंदर में बनवा रही है, और उस पर भी हजारों करोड़ खर्च होने जा रहे हैं। 
ऐसे देश में जो कि रियायती खाने की वजह से दो वक्त खा पाता है, जहां पर बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जहां पर इलाज और पढ़ाई का बजट केन्द्र सरकार लगातार काटती जा रही है, और मौजूदा सरकार ने शायद 15-20 फीसदी कटौती अभी साल भर में ही की है, उस देश में केन्द्र या राज्य के पैसों से हजारों करोड़ लागत के स्मारक बनाना, उसके लिए सरकारी जमीन देना, सरकारी बंगला देना, पूरी तरह से अलोकतांत्रिक है। मोदी सरकार भी डॉ. अब्दुल कलाम के जन्म स्थान रामेश्वरम में उनका एक बड़ा स्मारक सैकड़ों करोड़ की लागत से बनाने जा रही है। लेकिन दिल्ली में उनके बंगले को स्मारक में न बदलने का फैसला हम सही मानते हैं, और सुप्रीम कोर्ट को दखल देकर ऐसे किसी भी खर्च की सीमा तय करनी चाहिए कि किस स्मारक पर कौन सी सरकार कितने बरस में अपने बजट का कितना हिस्सा खर्च करे, और कहां पर वे थम जाएं। ऐसा इसलिए जरूरी है कि लोकतंत्र में अपने पसंदीदा लोगों की महानता को आम जनता का पेट काटकर आसमान की तरफ खड़ा करने की नेताओं की नीयत खुद होकर थमने वाली नहीं है। देश भर में इसके लिए सुप्रीम कोर्ट को एक आदेश देना पड़ेगा कि सरकार यह सिलसिला जनता के खजाने से खत्म करे, वरना किसी दूसरे राज्य में किसी और को मायावती बनने से कैसे रोका जा सकेगा? कल के दिन एक और आत्ममुग्ध नेता जयललिता अगर सरदार पटेल की प्रतिमा से दुगुनी ऊंचाई की अपनी प्रतिमा, और अपने नेता एम.जी.आर. की प्रतिमा चेन्नई के समंदर में बनवाना शुरू कर देंगी, तो उनको कौन रोक सकेगा? देश भर में यह सिलसिला ही थमना चाहिए। 

मुशर्रफ के दावों के बाद भी अमरीकी मदद जारी रहेगी?

संपादकीय
28 अक्टूबर 2015
पाकिस्तान के पिछले फौजी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने जितना खुलकर अपनी सरकार और अपनी फौज का आतंक-समर्थन गिनाया है, और जिस तरह अमरीका पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला करने वाले ओसामा-बिन-लादेन को अपना हीरो कहा है, उस पर कुछ कहना और करना अमरीका के लिए बड़ा भारी काम होगा। इस बात को दुनिया में अधिकतर जानकार मानते आए हैं कि पाकिस्तान लगातार अड़ोस-पड़ोस में आतंक को बढ़ावा देते रहा है, और भारत पर हुए कई हमलों को लेकर भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना केस भी रखा है कि कैसे पाकिस्तान से आए लोगों ने मुंबई अटैक किया, और बाकी हमले किए। लेकिन अमरीका की पाकिस्तान के लिए मोहब्बत कई लोगों को हैरान करती है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अमरीका से मिलने वाली फौजी और नगद मदद से चलता है। ऐसे में भारत जैसे देश का यह कहना अमरीका अब अनसुना नहीं कर सकता कि जो मदद अमरीका से पाकिस्तान को मिलती है उसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंक में किया जाता है। परवेज मुशर्रफ की कही ये बातें कल से भारत के मीडिया में छाई हुई हैं, और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कुछ कड़े तेवरों के साथ कल एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह कहा है कि पाकिस्तान जो जुबान समझता है उसको उसी जुबान में समझाया जाना चाहिए। 
दुनिया में कोई लोकतांत्रिक देश ऐसी गुंडागर्दी के साथ इस बात का दावा नहीं करता कि दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी उसका हीरो है, या उसने भारत के कश्मीर से लेकर अफगानिस्तान के तालिबान तक को ट्रेनिंग दी, मदद दी, हथियार दिए। मुशर्रफ के बारे में लोगों को अच्छी तरह याद है कि कारगिल में फौजी घुसपैठ करने को लेकर भी उन्होंने बरसों बाद जाकर इस बात पर बड़ा फख्र जाहिर किया था कि हिन्दुस्तान की अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार सोती रही, और पाकिस्तानी फौजें कारगिल में दूर तक घुसकर हिन्दुस्तानी इलाकों पर कब्जा कर चुकी थी। इसके बाद का कारगिल युद्ध इतिहास में दर्ज है, और उसकी अधिक चर्चा आज मुशर्रफ या पाकिस्तान को लेकर करना जरूरी नहीं है। 
अमरीका के लिए फौजी नजरिए से शायद यह बात जरूरी है कि ईरान और चीन  के बीच में बसे पाकिस्तान को इनमें से किसी की भी जेब में जाने से वह रोके, और अपने साथ बनाए रखे। जिस तरह से दुनिया के बड़े कारोबारी अपने कारखानों के इलाकों में, अपनी खदानों के इलाके में वहां के स्थानीय मवाली-रंगदार को हफ्ता देते हैं, उसी तरह अमरीका पाकिस्तान को इस इलाके में अपना अड्डा चलाने के लिए, जमीन के भाड़े की तरह, रंगदारी की तरह हफ्ता देता है। अब जब ये तमाम बातें सामने आ गई हैं कि जनरल मुशर्रफ ने किस तरह तालिबानों और लादेन जैसे लोगों को बढ़ावा दिया, जिन्होंने अमरीका पर हमला किया, न्यूयॉर्क की इमारतों को मिट्टी में मिलाकर अमरीकी गुरूर को धूल में मिला दिया, तो उसके बाद अब अमरीका को सार्वजनिक रूप से अपने नजरिए का खुलासा करना चाहिए। आज दुनिया में जो देश लोकतांत्रिक होने की बात कहते हुए लगातार आतंक को बढ़ावा देता है, उसे अमरीका चढ़ावा देता है। अब भारत के इस दावे में दुनिया को एक अधिक दम दिखेगा कि पाकिस्तान को मिलने वाली अमरीकी मदद आतंक के लिए इस्तेमाल होती है। 
अमरीका ने अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा आतंक-का-शिकार बताते हुए इराक पर हमला किया, लीबिया पर हमला किया, और बाकी देशों पर उसके हमले चल ही रहे हैं। एक तरफ तो अमरीका अपने घर में सीमित देशों पर हमला करके लाखों लोगों को मार चुका है, और वहां पर लोकतंत्र स्थापित करने का नाटक करता है, आतंकियों को मारने के लिए दुनिया के देशों को धमकाकर अपने साथ ले जाता है। दूसरी तरफ जनरल मुशर्रफ के ऐसे खुले दावों के बाद अगर अमरीका पाकिस्तान की आर्थिक मदद जारी रखता है, तो उसका पाखंड खुलकर उजागर होता है। भारत को जनरल मुशर्रफ की कही इन नई बातों को लेकर अमरीका के सामने जमकर विरोध करना चाहिए, क्योंकि भाजपा की ही अटल सरकार पर मुशर्रफ ने फौजी हमला किया था। 

मैगी की वापिसी से एक खतरे की भी वापिसी...

संपादकीय
27  अक्टूबर 2015

लंबे सरकारी प्रतिबंध और अदालती लड़ाई के बाद अब ऐसा लगता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी नेस्ले की भारतीय बाजार की हिट मैगी फिर दुकानों में सजने जा रही है। इसमें नुकसानदेह तत्व मिलने पर एक-एक करके कई राज्यों में और फिर देश भर में इस पर रोक लगाई गई थी, लेकिन अब कई प्रयोगशालाओं के परीक्षण के बाद इसे फिर इजाजत मिल रही है। इससे देश भर के उच्च और उच्च-मध्यम आयवर्ग के ऐसे लोगों को बड़ी खुशी हो रही है जो दो-चार मिनट में पक जाने वाली इस पैकेटबंद-मसालेदार सेंवई के आदी हो चुके थे। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल यह उठता है कि क्या भारत में लोगों को सेहतमंद खाने के लिए बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सरकार पूरी कर पा रही है?  
भारत की आबादी में डायबिटीज के मरीजों का अनुपात लगातार बढ़ते चल रहा है। लोगों में, खासकर संपन्न तबके में वजन बढऩे का खतरा भी गंभीर होते जा रहा है। जो महंगे स्कूल-कॉलेज हैं, उनमें खान-पान की कैंटीन में मिलने वाले कूड़े सरीखे नुकसानदेह सामानों को लेकर पश्चिम के संपन्न देश वैसे ही बहुत फिक्रमंद हैं, और भारत के महंगे स्कूल-कॉलेज इस मामले में पश्चिम से कहीं पीछे नहीं हैं। एक तरफ तो अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भारत के मंझले शहरों तक पहुंच चुके हैं, और एक टेलीफोन पर खाने के सामान घर तक पहुंचा देते हैं, और दूसरी तरफ संपन्न तबके का अपने घर पर भी डिब्बाबंद, बोतलबंद खाना-पीना लगातार बढ़ते जा रहा है। एक सोच यह हो सकती है कि संपन्न तबके की सेहत अगर बिगड़ती है, तो वह सरकार पर इलाज का बोझ नहीं डालती। इस तबके के लोग अपने खर्च पर इलाज करा लेते हैं, लेकिन देश की सेहत को इससे बिगड़ती ही है। इसलिए सरकार और समाज इन दोनों को इस जागरूकता के लिए कोशिश करनी चाहिए। 
दूसरी बात यह कि भारत की खुली और उदार बाजार-व्यवस्था के तहत आज खान-पान जितना बिगड़ रहा है, उतने ही महंगे अस्पताल बढ़ते भी चल रहे हैं। ऐसे में बिना किसी साजिश के भी हो यह रहा है कि बाजार एक तरफ तो महंगा कूड़ा खिलाकर लोगों की सेहत बिगाड़ रहा है, और फिर उसी बाजार की एक दूसरी दूकान लोगों को महंगा इलाज बेच रही है। ये दोनों काम बाजार को माकूल बैठते हैं। इस बिना गढ़ी हुई बाजारू साजिश को खत्म करने की जरूरत है। आज दुनिया भर के आंकड़े ये बता रहे हैं कि कोकाकोला जैसे डिं्रक की एक-एक बोतल में कितने चम्मच शक्कर है, और वह पूरी सेहत के लिए किस हद तक नुकसानदेेह है। और बाजार के हमलावर तेवर हैं कि हर दिन सबसे मशहूर फिल्मी सितारे ऐसे कूड़े को बढ़ावा देते टीवी पर दिखते हैं। देश में जनता के लिए खान-पान की जागरूकता का एक बड़ा अभियान छेडऩे की जरूरत है। सरकार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन अलग-अलग तरह के जो भी सामाजिक या किसी और तरह के भी संगठन हैं, उनको अपने सदस्यों को बचाने के लिए खानपान के विशेषज्ञों के व्याख्यान करवाने चाहिए, ताकि उनके सदस्य सेहतमंद भी बने रहें, और लंबी जिंदगी भी जी सकें। हर स्कूल और कॉलेज को भी अपने बच्चों को सावधान करने की कोशिश करनी चाहिए, खासकर जो जितने संपन्न तबके वाले हैं, उनको उतनी ही अधिक कोशिश की जरूरत है। मैगी और कोलाकोला एक ब्रांड न होकर उससे भी अधिक एक जीवनशैली के प्रतीक बन गए हैं, और इनके खतरों को कम नहीं आंकना चाहिए। आज देश में नौजवान पीढ़ी के कई लोग ऐसे हैं जो मां के आने के इंतजार से अधिक मैगी के आने का इंतजार कर रहे हैं, उनको सावधान करना जरूरी है।

बलात्कार घटाने की कोशिश सबको मिलकर करनी चाहिए

संपादकीय
26 अक्टूबर 2015

छत्तीसगढ़ में आए दिन बलात्कार हो रहे हैं, और छोटी बच्चियों से लेकर आदिवासी युवतियों तक, बुजुर्ग महिलाओं तक, और सरकारी छात्रावास में रहने वाली लड़कियों तक से बलात्कार की खबरें रोज छप रही हैं। लेकिन ऐसा जुर्म होता है, पुलिस तक मामला जाता है, खबर छपती है, और सब कुछ दफन हो जाता है। बरसों बाद जाकर किसी-किसी मामले में सजा हो जाती है, लेकिन इतने संपन्न राज्य में जहां सरकार और समाज कई तरह के मामलों में हजारों करोड़ खर्च करते हैं, इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक चर्चा तक नहीं होती कि बलात्कार क्यों होते हैं, और उनको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है। हम यह नहीं कहते कि हर बलात्कार रोकने के लायक होता है, बहुत से मामले ऐसी स्थितियों में होते हैं जहां तक सरकार और समाज की पहुंच नहीं होती। लेकिन छत्तीसगढ़ में ही हर कुछ महीनों में कोई एक ऐसी लड़की आत्महत्या करती है जो कि पड़ोस के लड़कों की छेड़छाड़ से परेशान रहती थी। अब जहां लड़कियों की सुरक्षा की यह स्थिति है, वहां पर बलात्कार के बाद बहुत सी लड़कियां और महिलाएं पुलिस तक जाने का हौसला भी नहीं जुटा पाती होंगी। 
इस राज्य में बाकी हिन्दुस्तान की तरह एक जरूरत बिल्कुल खड़ी हुई है, समाज और सरकार को मिलकर लड़कियों और महिलाओं के सम्मान के लिए, उनके बेहतर अधिकारों के लिए, और उनकी बेहतर हिफाजत के लिए अभियान छेडऩे की जरूरत है। इसके साथ-साथ समाज के तमाम लोगों को यह बताने की जरूरत भी है कि सेक्स-अपराधियों के साथ कानून कितना कड़ा हो सकता है, और ऐसे मामले में पकड़ाने से लेकर सजा पूरी होने तक हो सकता है कि बलात्कारी का पूरा परिवार ही तबाह हो जाए। आमतौर पर बलात्कारी उस पीढ़ी के रहते हैं कि उनके आगे-पीछे दूसरी पीढिय़ां भी रहती हैं। एक बलात्कार के साथ-साथ बलात्कारी के बच्चों की बाकी जिंदगी भी तबाह हो सकती है, और हो सकता है कि वे जब तक जेल से लौटें, तब तक मां-बाप चल बसें। हमारा मानना है कि लोगों को जुर्म की सजा के खतरों से समय रहते अगर अच्छी तरह आगाह किया जाता है, तो लोग जुर्म से कतरा भी सकते हैं। 
फिर सरकार से परे समाज की भी यह जिम्मेदारी रहती है कि आस-पड़ोस में, सड़क पर या सार्वजनिक जगहों पर, स्कूल या अस्पताल में, हॉस्टल या खेल के मैदान पर अगर वे किसी तरह का देह-शोषण देखते हैं, छेड़छाड़ या बदमाशी देखते हैं, तो उनको भी खुलकर ऐसी बातों का विरोध करना चाहिए। सरकार की पुलिस चाहे कितनी ही बड़ी और ताकतवर क्यों न हो, उसके आकार और उसके खर्च का बोझ जनता पर ही पड़ता है। एक-एक बलात्कार की जांच से लेकर उसकी सजा तक सरकार पर लाखों रूपए का खर्च होता है। अगर जनता जागरूक रहे, तो सरकार का ऐसा खर्च घट भी सकता है, और खर्च से अधिक महत्वपूर्ण बात हम पहले ही लिख चुके हैं कि मुजरिम ऐसे जुर्म से बच सकते हैं। 
सरकार और समाज को मिलकर सार्वजनिक रूप से जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, और यह भी गारंटी करनी चाहिए कि समाज में जो कमजोर तबके हैं, उनके साथ दबंगई दिखाने वाले ताकतवर लोग समय रहते सजा पा जाएं। आज जो लोग छेडख़ानी करते हैं, और बच जाते हैं, वैसे ही लोग कल बलात्कार तक पहुंचते हैं। इससे परे बलात्कारियों की एक किस्म ऐसी भी होती है जो परिवार के पहचान के लोग रहते हैं, और ऐसे लोगों से अपने बच्चों को सावधान करना हर परिवार की जिम्मेदारी है। लेकिन भारत में मां-बाप और बच्चों के बीच बातचीत के मुद्दों को लेकर इतनी झिझक कायम रहती है कि बहुत सी बातों को खुलकर किया ही नहीं जाता। सरकार को चाहिए कि मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के ऐसे सार्वजनिक व्याख्यान करवाए जाएं जो कि मां-बाप को सावधान और चौकन्ना करने का काम करें। 
बलात्कार पूरी तरह से बंद नहीं हो सकते, लेकिन उनको घटाने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। इसके लिए सबको भिड़कर काम करने की जरूरत है। 

टोनी ब्लेयर का इकबाल-ए-जुर्म

26 अक्टूबर 2015
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने युद्ध के बाद की योजनाओं में हुई खुफिया गलतियों के लिए माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि युद्ध की वजह से तथाकथित इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ ऐसे दावों में कुछ सच्चाई है। लेकिन उन्होंने कहा कि सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए माफी मांगना मुश्किल है। ब्लेयर ने कहा कि यदि ऐसा न होता तो इराक आज का लीबिया बन जाता। 2003 में इराक पर अमरीका और सहयोगी देशों ने हमला किया था और सद्दाम हुसैन का शासन खत्म कर दिया था। अमरीकी टीवी चैनल सीएनएन से बात करते हुए ब्लेयर ने कहा कि यदि इराक में उनकी नीतियां नाकाम हुई हैं तो उसके बाद की नीतियां भी कामयाब नहीं हुई हैं। उन्होंने कहा कि यदि इराक पर हमला नहीं किया जाता तो वहां गृह युद्ध छिडऩे का खतरा था। उन्होंने कहा, मैं इस बात के लिए माफी मांगता हूँ कि जो ख़ुफिया जानकारियां हमें मिली थीं वो गलत थीं।
ये बातें पिछले दो दिनों से मीडिया में खबरों में छाई हुई हैं, और इनसे दुनिया के बहुत बड़े समझदार तबके का यह मानना सही साबित हो रहा है कि किस तरह अमरीका ने झूठे सुबूतों को गढ़कर, उनकी बुनियाद पर इराक पर हमले की इमारत खड़ी की थी, और लाखों लोगों को लोकतंत्र के नाम पर मार डाला। इस हमले में ब्रिटिश प्रधानमंत्री सबसे बढ़-चढ़कर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ रहा और ब्रिटेन की जनता ने टोनी ब्लेयर को उसके लिए कभी माफ नहीं किया है। 
पिछले पन्द्रह बरसों में दुनिया में अमरीका का एक ऐसा अभूतपूर्व हमला देखा है जिसने एक के बाद एक देश पर झूठे आरोप लगाकर उन पर बमबारी की, वहां पर आतंकियों को बढ़ावा दिया, वहां का तख्त पलटा, वहां के शासकों को मारा, दुनिया के दूसरे देशों में घुस-घुसकर फौजी कार्रवाई की, और संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने पैरों के जूतों से अधिक नहीं माना। खुद अमरीका के भीतर मानवाधिकारवादियों, अमन-पसंद लोगों का एक ऐसा तबका है जो अमरीका के उस हमलावर तेवरों का विरोधी रहा है, और यही वजह रही कि जॉर्ज बुश ऐसे हमलों के बाद ऐसे हारे कि पिछले दो चुनाव वहां पर उनकी विरोधी पार्टी, डेमोक्रेट्स ने जीते, और पहली बार अमरीका के इतिहास में एक अश्वेत राष्ट्रपति बना। 
अब टोनी ब्लेयर जिन गुनाहों को खुद होकर मान रहे हैं, उनको देखते हुए यह बात फिर लग रही है कि जिस तरह अमरीका ने दुनिया पर हमला किया था, वैसे झूठे सुबूत गढ़कर कोई भी देश अपनी ताकत से दूसरे देश पर हमला कर सकता है, और ऐसे में किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की न तो कोई जरूरत रह गई है, और न ही उसका कोई महत्व रह गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को देशों के बीच के तनाव के मौकों के लिए गढ़ा गया था, लेकिन अमरीका ने जिस हिकारत के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ की तमाम चेतावनियों को कुचलते हुए मनमानी हमले किए, उसी की दूसरी मिसाल इजराइल के उन हमलों में देखने मिलती है जो वह रात-दिन फिलीस्तीन पर करते रहता है। 
अब आज अगर संयुक्त राष्ट्र एक कागजी, और एक महज बहस की ताकत रखने वाली संस्था बनकर रह जाता है, तो फिर दुनिया के बीच देशों का आपसी कारोबार सिर्फ उनकी ताकत पर चलना तय है। और ऐसे में देशों के बीच के टकराव कब तक टलते रहेंगे, इसका अंदाज लगाना एक तरह से आसान नहीं है, और एक तरह से मुश्किल नहीं है। 
आज एक-एक करके कई देशों के पास परमाणु हथियारों के जो जखीरे इक_ा हो गए हैं, वे दुनिया को सौ-पचास बार तबाह करने के लिए काफी हैं। ऐसे में कौन सा देश कब अपनी समझ खोकर दूसरों पर हमला कर बैठे, या कि कब किसी देश के हथियारों पर से वहां की सरकार का काबू चले जाए, और कब आतंकी परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर बैठें, और वे एक खत्म न होने वाले झगड़े की शुरुआत कर देंगे, जिसका अंत हो सकता है कि दुनिया के अंत के साथ हो। 
आज पाकिस्तान जैसा देश पिछले एक बरस में आधा दर्जन बार सरकार के स्तर  पर परमाणु हथियारों की ताकत की बाहें फड़का चुका है। सरकार के अलग-अलग लोग भारत के सिलसिले में ऐसी बात कर चुके हैं। दूसरी तरफ यह बात भी सामने आई है कि पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक ने किस तरह मध्य-पूर्व के कुछ देशों को परमाणु तकनीक बेची थी, या दी थी। अब ऐसे में इन देशों में खासी ताकत रखने वाले फौजी अफसर, वहां के तानाशाह, या वहां के धर्मान्ध कट्टरपंथी, कब धर्म के नाम पर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को जायज मान लें, इसका अंदाज कौन लगा सकता है? 
दुनिया में अमरीका के न्यूयॉर्क में विश्व व्यापार केन्द्र की इमारतों पर लादेन के विमानों के हमले को देखा हुआ है। जब धर्म के नाम पर वह हमला हो सकता है, तो धर्म के नाम पर परमाणु हथियार पाने और चलाने का काम क्यों नहीं हो सकता? जिन देशों में सरकार और फौज में मजहब के नाम पर कारोबार चलता है, वहां पर चार लोग मिलकर अगर यह तय कर लें कि उनको परमाणु हथियार का इस्तेमाल करना है, तो उसके लिए जरूरी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को कैदी बनाकर भी वह काम किया जा सकता है, और पाकिस्तान में लोगों ने पहले भी कई बार फौजी अफसरों को सत्ता पर कब्जा करते देखा है, और राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को हटाते और फांसी चढ़ाते भी देखा है। 
ब्रिटेन, जिसे कि भारत जैसे लोकतंत्र के मॉडल का एक जन्मदाता भी कहा जाता है, वह अगर दुनिया के सबसे बड़े गुंडे देश के साथ मिलकर इस तरह किसी बेकसूर देश पर साजिशी हमला करता है, तो दुनिया के सभ्य देश होने की परिभाषा ही खत्म हो जाती है। सद्दाम हुसैन हो, या कि कर्नल गद्दाफी, इन्होंने जो किया अपने देश में किया था, इन्होंने किसी और के साथ मिलकर किसी और देश में जाकर लोकतंत्र कायम करने के नाम पर हमले नहीं किए थे। लोग शायद इस बात को अब तक भूले नहीं होंगे कि इस हमले के पीछे अमरीका ने सौ बार यह दावा किया था कि इराक में रासायनिक हथियारों के भंडार हैं जो कि मास-डिस्ट्रक्शन, व्यापक बर्बादी करने की ताकत रखते हैं। लेकिन इन हमलों के बाद साबित हुआ कि अमरीका का वह दावा सौ फीसदी झूठा था, और बाद में जो जांच रिपोर्ट आईं, उनसे यह भी साबित हुआ कि अमरीका ने किसी गलत जानकारी पर ऐसा गलत नतीजा नहीं निकाला था, बल्कि एक झूठ गढ़कर हमले की साजिश तैयार की थी। 
टोनी ब्लेयर ने अपने देश की बड़ी बेइज्जती की है। आज उन्होंने अपना जो जुर्म कुबूला है, उससे उन लाखों जिंदगियों की कोई भरपाई नहीं हो सकती जो कि इराक और लीबिया में ब्रिटिश-अमरीकी फौजों ने खत्म की हैं। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के तहत या अलग से एक ऐसी अदालत बननी चाहिए जो कि युद्ध अपराध का मुकदमा इन देशों पर चला सके और मरने वालों को मुआवजा दिलाने के लिए इन देशों के खजानों को खाली कर सके। यह काम कैसे होगा, यह सोचना आसान तो नहीं है, लेकिन यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है कि अगर दुनिया मरने वाले लाखों लोगों के साथ ऐसा इंसाफ नहीं कर सकेगी, तो फिर उनके पीछे जिंदा बचे लोग जिंदगी भर अपना इंसाफ खुद करते चलेंगे, और उसका दाम आज के हमलावर देशों को अपने लोगों की जिंदगी की शक्ल में चुकाना होगा। 

बच्चों की हसरतों की कब्र कामयाब देश की बुनियाद कभी नहीं बन सकती

25 अक्टूबर 2015
संपादकीय
कल भारत के एक बड़े मशहूर रहे फिल्म गायक मन्ना डे की पुण्यतिथि थी। उनके बारे में जो खबरें आईं, वे बताती हैं कि उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, लेकिन उनकी दिलचस्पी संगीत में थी और वे इसी क्षेत्र में आगे बढ़े। उन्होंने शोहरत तो बहुत पाई, लेकिन यह एक अलग बात है कि उनका आखिरी वक्त बड़ी फटेहाली का रहा, और शायद उनके पास इलाज के लिए भी इंतजाम नहीं बचा था। इन दो बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि लोगों को अपनी पसंद का काम ही करना चाहिए, और उसी में वे आगे बढ़ सकते हैं। दूसरी तरफ यह भी लगता है कि मां-बाप की बात भी सुन लेनी चाहिए, और शोहरत से परे मन्ना डे को शायद इतनी कमाई भी जाती कि बुढ़ापे में वे इलाज के मोहताज न हुए होते।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि संगीत के उद्योग में लोग कमा नहीं पाते, और वकालत में कमा ही लेते हैं। वकालत में भी ऐसे बहुत से लोग दिखते हैं जो कि महीनों तक अपना कोट नहीं धुलवा पाते, और गाने वाले लोगों को अरबपति होते हुए भी मुंबई ने देखा हुआ ही है। हमारा मानना यह है कि बच्चों की दिलचस्पी जिस हुनर या काम में होती है, उसी में उनको आगे बढऩे देना चाहिए। लोग अगर अपनी पसंद का काम करते हैं, तो हो सकता है कि वे कामयाबी के आम पैमाने पर किसी दूसरे पेशे के मुकाबले कुछ पीछे रह जाएं, लेकिन वे अपने हुनर के पैमाने पर खूब बढिय़ा काम कर सकते हैं। आज दिक्कत यह है कि अधिकतर मां-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के विषय तय करने से लेकर उनके कामकाज तय करने में भी दखल रखना चाहते हैं, और अगर बात हिंदुस्तान की है, तो यहां तो मां-बाप लड़के-लड़कियों के लिए जीवनसाथी तय करने का एकाधिकार भी अपना ही मानते हैं, और फिर बाद में यह भी तय करना चाहते हैं कि उनके बच्चे कब हों, और कितने हों। जात से बाहर या धर्म से बाहर, या अपने ही गोत्र में, पे्रम-विवाह करने वालों का कत्ल करने का हक भी बहुत से मां-बाप अपना मानते हैं, और अपने बच्चों के पे्रम-संबंधों से निपटने के लिए अधिकतर मां-बाप शहंशाह अकबर बनकर अनारकली को दीवार में चुनवाए बिना अपनी जिंदगी अधूरी समझते हैं। 
हिंदुस्तान में आम लोगों को मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं की बहुत जरूरत रहती है ताकि वे अपने बच्चों की जिंदगी को उनकी पसंद से ढलने का एक मौका देना सीख सकें। मन्ना डे अगर वकील हो गए रहते, तो शायद वे उतने कामयाब नहीं हुए रहते जितने कि वे अपनी पसंद की गायकी में हुए। काम कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता, और मां-बाप को चाहिए कि बच्चों की पसंद को लेकर उनके साथ यह चर्चा जरूर करें कि उनकी पसंद उनको कमाई और कामयाबी से कहां तक ले जा पाएगी। उसके नफे और नुकसान पर उनको खुलकर चर्चा करनी चाहिए, लेकिन उसके बाद उनको बच्चों के मन की पढ़ाई करने देनी चाहिए, या बच्चों की मर्जी का काम करने देना चाहिए। दुनिया में जो भी देश विकसित हुए हैं, वे अपने बच्चों और अपनी नौजवान पीढ़ी की हसरतों को कुचलकर विकसित नहीं हुए हैं। जिस दीवार में हसरतों की अनारकली चुनी हुई रहती है, वह दीवार किसी देश की मजबूत इमारत की बुनियाद नहीं बन सकती। देश में नौजवान पीढ़ी के मर्जी से जीने, मर्जी से शादी करने को लेकर जितने तरह की अडंगेबाजी समाज और परिवार की तरफ से होती है, उससे भी उनकी संभावनाएं खत्म होने लगती हैं। इसलिए बच्चों के शौक, उनकी पढ़ाई, उनके कामकाज से लेकर उनके पे्रम और विवाह संबंधों तक उनकी पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए।
पिछले कई हफ्तों से देश के कुछ गिने-चुने जलते-सुलगते मुद्दों पर लिखते-लिखते थकान इतनी हो गई थी, कि मन्ना डे से जुड़ी एक लाईन की यह जानकारी एक राहत की तरह आई, और उन्हीं बातों को कई-कई बार लिखने की बोरियत को बहा ले गई। 

दलितों पर जुल्म जारी रखते हुए आगे नहीं बढ़ सकता यह देश

संपादकीय
24 अक्टूबर 2015

महाराष्ट्र में दलितों की एक पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रामदास अठावले ने मांग की है कि दलितों को आत्मरक्षा के लिए हथियार दिए जाएं। उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा है, और देश भर में जगह-जगह दलितों के साथ हो रही ज्यादती के अलावा, अभी केन्द्रीय मंत्री, भाजपा के जनरल वी.के. सिंह के दलित-विरोधी एक अपमानजनक बयान के बाद अठावले भड़के हुए थे। उन्होंने इस बयान की निंदा करते हुए कहा कि अगर पुलिस और सरकार दलितों पर हमले नहीं रोक सकते, तो दलितों को हथियारों का लाइसेंस देना चाहिए। उनका कहना था कि इसके अलावा दलितों के पास अपनी आत्मरक्षा का और कोई विकल्प नहीं है। 
देश में आज एक सवर्ण-ब्राम्हणवादी संस्कृति की जो हवा चलाई जा रही है, उससे दलितों के खिलाफ माहौल पहले के मुकाबले और अधिक खराब होते चल रहा है। कहीं आरक्षण को लेकर उनको गालियां दी जा रही हैं, कहीं मंदिरों में जाने पर उनको मारा जा रहा है, कहीं हिन्दू धर्म के बारे में कुछ लिखने पर उन पर हमले हो रहे हैं, कहीं उनके बच्चों को जिंदा जलाया जा रहा है, और सबसे बड़ी बात यह कि देश की सत्ता चला रहे लोग दलितों के बारे में गंदी जुबान में हिंसक बातें कर रहे हैं। जनरल वी.के. सिंह को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने दलित-संदर्भ में कुत्तों की मिसाल देने पर एक नोटिस भी दिया है। हमारा तो यह भी मानना है कि देश की अदालत भी खुद होकर जनरल सिंह के बयान पर उनको नोटिस देकर बुला सकती थी, और अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई जज सामाजिक सरोकार वाला होता, तो लीक से हटकर वह ऐसा नोटिस जारी करता भी। लेकिन आज जिनके हाथ ताकत है, उनकी नजरों में कमजोर तबकों की कोई इज्जत नहीं है। यही वजह है कि दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, और समाज के सभी तरह के कमजोर लोगों के खिलाफ लगातार हिंसा बढ़ते चल रही है। 
कोई अगर यह सोच रहा है कि इस देश में गाय-भैंस का मांस सिर्फ मुस्लिम खाते हैं, तो वह बहुत बड़ी सामाजिक हकीकत को अनदेखा कर रहा है। देश भर में दलितों और आदिवासियों के बीच भी बीफ का चलन है, और गरीबों के बीच अगर मांसाहार किसी शक्ल में उनकी पहुंच के भीतर है, तो वह बीफ ही है। बाकी मांस महंगा होता है, और जनगणना के आंकड़े भारत में बीफ खाने वालों की जो गिनती बताते हैं, असली गिनती उससे बहुत अधिक है। ऐसा इसलिए है कि जब कोई कागज-पेन लेकर किसी परिवार में पहुंचते हैं, और उनसे खानपान और बीफ खाने के बारे में पूछते हैं, तो लोग डर के मारे हकीकत नहीं बताते। आज सरकार के सर्वे के आंकड़े लेकर कोई अगर घर-घर जाकर लोगों को मारना शुरू करे, तो भी उसमें कोई बड़ी हैरानी नहीं होगी। सरकार के पास जो जानकारी पहुंचती है उसका बेजा इस्तेमाल न नई बात होगी, और न कोई खास बात होगी। इसीलिए लोग आधार कार्ड जैसी पहचान को लेकर डरे हुए भी हैं। आज देश में ऊंची समझी जाने वाली जाति का जो दबदबा चल रहा है, उसके चलते हो सकता है कि एक दिन सत्ता की ताकत से लोग ऐसी जानकारी निकालकर छांट-छांटकर लोगों को मारना भी शुरू कर दें। 
संविधान की ताकत इस देश में दलितों को बिल्कुल भी नहीं बचा पा रही है। दलित वहीं पर सुरक्षित हैं, जहां पर उन्होंने धर्मांतरण कर लिया है और वे बौद्ध या मुस्लिम हो गए हैं, या फिर उन जगहों पर जहां पर वे अपनी गिनती और संगठित होने की वजह से एक बड़ी ताकत हैं। इससे परे देश में जातिवाद इतना गहरा बैठा हुआ है कि दलितों के लिए ऊंची जाति के घमंड वाले लोगों के मन में हिकारत के अलावा कुछ नहीं है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए क्योंकि सामाजिक टकराव अगर बढ़ते चलेगा तो देश की तरक्की धरी रह जाएगी। आज केन्द्र सरकार सामाजिक भेदभाव और सामाजिक टकराव को पूरी तरह अनदेखा कर रही है, और ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जिनसे लग रहा है कि सरकार के कुछ लोग, और सरकार के करीबी बहुत से लोग ऐसे टकराव को बढ़ावा दे रहे हैं। जिन लोगों का देश की अर्थव्यवस्था से, देश के विकास से, कुछ भी लेना-देना नहीं रहता है, वे तो समाज के अलग-अलग तबकों को काट सकते हैं, लेकिन जो लोग देश को आगे ले जाना चाहते हैं उन लोगों को यह अनदेखी बंद करना चाहिए। दलितों पर जुल्म इस देश को बहुत भारी पड़ेगा, और खासकर जो पार्टियां सवर्ण-ब्राम्हणवादी राजनीति कर रही हैं, वैसी संस्कृति को बढ़ावा दे रही हैं, उनको भी बहुत भारी पड़ेगा। 

गंदी और हिंसक हरकतों के बाद धर्म और वर्दी की आड़

संपादकीय
23 अक्टूबर 2015


फिल्मी गायक अभिजीत पिछले कुछ महीनों में बहुत ही गंदे और हिंसक, साम्प्रदायिक और भड़काऊ बयान देते आए हैं। अब उनके खिलाफ उनके ही आयोजित एक दुर्गोत्सव में एक महिला ने उनके खिलाफ छेडख़ानी की रिपोर्ट लिखाई है। इस पर अभिजीत ने बयान दिया है कि वे हिन्दू हैं, इसलिए उनके खिलाफ साजिश की जा रही है। हूबहू यही बयान एक वक्त बापू कहे जाने वाले, और आसाराम नाम से कुख्यात, बलात्कार के मामले में बरसों से विचाराधीन कैदी बने हुए आसाराम ने कही थी, और उनके कई समर्थकों ने भी दलील दी थी कि यह हिन्दू धर्मगुरुओं के खिलाफ साजिश का हिस्सा है। लोगों को याद होगा कि बरसों पहले जब क्रिकेट खिलाड़ी अजहरुद्दीन को मैच फिक्सिंग के मामले में पकड़ा गया था, तो उन्होंने अपने मुस्लिम होने की आड़ ले ली थी, और कहा था कि अल्पसंख्यक होने के कारण यह उनके खिलाफ साजिश है। कल ही केन्द्रीय मंत्री वी.के. सिंह ने दलित बच्चों को जलाकर मारने के संदर्भ में कुत्ते को मारने की मिसाल दी, और इस पर जब चारों तरफ से उन पर थूकना शुरू हुआ तो उन्होंने भागकर अपनी फौजी वर्दी की आड़ ले ली कि वे तो फौज में रहे हुए हैं जहां पर जात-पात का कोई काम नहीं रहता। 
मुजरिमों के साथ दिक्कत यह है कि जब वे किसी जाति या धर्म, पार्टी या संगठन के प्रतिनिधि रहे बिना भी निजी स्तर पर कोई जुर्म करते हैं, तो तोहमत लगने पर, फंसने पर तुरंत ही कभी अपने आदिवासी होने, कभी अपने कांग्रेसी या भाजपाई होने, कभी दलित या मुसलमान होने, कभी साधु-संत या पिछड़े वर्ग का होने की आड़ ले लेते हैं। अगर ऐसा जुर्म वे अपने तबके के लिए हो रहे किसी आंदोलन के दौरान करते, तो भी समझ आता। इसी देश की इसी राजधानी दिल्ली में हफ्तों तक वन रैंक वन पेंशन का आंदोलन चला, तब वी.के. सिंह का मुंह बंद ही मिला। उस वक्त उनको अपने भूतपूर्व सैनिक होने की जिम्मेदारी याद नहीं आई, लेकिन आज जब उनकी हिंसक बकवास पर चारों तरफ से धिक्कार बरसने लगी, तो वे अपने फौजी दिनों की आड़ में जाकर छुप गए। 
इस तरह की रियायत किसी बच्चे को, किसी अनजान को, किसी कमसमझ को, या किसी मानसिक विचलित को तो दी जा सकती है, लेकिन इनमें से किसी भी तबके की रियायत पाने वाले को ताकत और अहमियत के किसी ओहदे पर रहने का क्या हक है? इसके पहले भी जनरल वी.के. सिंह प्रेस के लोगों को वेश्याओं के बराबर गिनते हुए उनको प्रेस्टीट्यूट कह चुके हैं, और भी समय-समय पर बहुत सी गंदी बातें उन्होंने कही हैं। दिक्कत यह है कि जो सबसे दुष्ट हैं, और जो सबसे भ्रष्ट हैं, वे दौड़-दौड़कर अपने कुसूर छुपाने के लिए राष्ट्र के पीछे जाकर छुप जाते हैं। लेकिन भारत में आज एक बात अच्छी है कि छोटे से लेकर बड़े तक, मीडिया का एक खासा बड़ा हिस्सा इस किस्म की मक्कारी को खुलकर उजागर कर रहा है। और फिर औपचारिक मीडिया से परे सोशल मीडिया पर आम लोग भी खुलकर सभी तरह की बातें लिख रहे हैं। उनमें भड़काऊ, हिंसक, और साम्प्रदायिक बातें भी हों, लेकिन उनमें ऐसी बातों के खिलाफ लिखने वाले लोग भी कम नहीं हैं। 
हैरानी की बात यह है कि आज मोदी सरकार और देश में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन देश की नब्ज की तरफ से पूरी तरह से बेपरवाह है। पिछली भारी-भरकम और ऐतिहासिक जीत को मोदी और उनके साथियों ने एक स्थायी अधिकार सा मान लिया है, और न तो जनभावनाओं की कोई परवाह की जा रही है, न ही इंसानियत के किसी तौर-तरीके की। एक के बाद एक बड़े-बड़े नेता घोर साम्प्रदायिक बयान दे रहे हैं, और इस पर एनडीए चुप है, भाजपा चुप है, और मोदी चुप हैं। देश में आज अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित, महिलाएं, लड़कियां, मांसाहारी, और आक्रामक हिन्दुत्व से वैचारिक असहमति रखने वाले लोग, ये तमाम लोग बहुत बुरी तरह से हिंसक हमलों का खतरा झेल रहे हैं, और केन्द्र सरकार को यह बात फिक्र की नहीं लग रही है। केन्द्र की ऐसी भयानक चुप्पी, ऐसी हिंसक ताकतों के लिए बढ़ावे से कम कुछ नहीं रहती, और जिस तरह से लोग हैवानियत के बयान दे रहे हैं, उससे यह लगता है कि क्या इस तबके की चुप्पी इससे बेहतर होगी? प्रधानमंत्री मोदी को तुरंत ही देश के इस हाल पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान में हो रहे ऐसे मामलों को बाकी दुनिया भी ध्यान से देख रही है। 

देश को धार्मिक भड़कावे से बचकर रहने की जरूरत

संपादकीय
21 अक्टूबर 2015
पंजाब में बरसों बाद एक ऐसा तनाव खड़ा हुआ है कि राज्य की पुलिस के अलावा सीमा सुरक्षा बल को वहां हिंसक हालात काबू करने के लिए तैनात किया गया है। सिखों के धर्मग्रंथ, गुरूग्रंथ साहब के कुछ पन्ने वहां बिखरे मिले, और इस मामले में संवेदनशील इस समुदाय की भावनाएं भड़क उठीं। अब तक यह जाहिर नहीं है कि यह काम किसने किया है, लेकिन पंजाब पुलिस ने दो सिखों को ही इस सिलसिले में गिरफ्तार किया है और ऐसा शक जताया जा रहा है कि भारत के बाहर से कुछ लोगों ने यहां तनाव फैलाने के लिए ऐसा करवाया है। पुलिस ने इस बारे में इन नौजवानों की विदेशों से हुई टेलीफोन बातचीत भी टैप की है। 
यह पहला मौका नहीं है कि भारत में धार्मिक ग्रंथ को लेकर इस तरह का तनाव हुआ हो। इसके पहले भी अलग-अलग धर्मों के ग्रंथों को लेकर, उनके अपमान को लेकर, कहीं पर किसी की प्रतिमा को लेकर, कहीं तस्वीर को लेकर तनाव होते आए हैं। इसी तरह किसी धर्मस्थल पर किसी जानवर के गोश्त को फेंककर, तो कहीं किसी दूसरे धर्म के धर्मस्थल पर किसी दूसरे जानवर के गोश्त को फेंककर तनाव खड़ा करने का काम पिछले महीनों में ही उत्तर भारत में कई जगह हो चुका है। और भारत के साम्प्रदायिक तनाव के इतिहास में ऐसे बहुत से मामले दर्ज हैं। अभी कुछ दिन पहले ही दक्षिण भारत से ऐसी तस्वीरें आई थीं कि वहां दलितों के मसीहा अंबेडकर की प्रतिमाओं को दलित-विरोधियों से बचाने के लिए उनके आसपास लोहे के जंगले बनाकर उनको बचाया जा रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि कुछ शरारती लोग अगर किसी धर्म के लोगों को भड़काने की नीयत से इस तरह का काम करते हैं, तो और उनका मकसद पूरा हो जाता है, लोग भड़क जाते हैं, सड़कों पर उतर आते हैं, और शहरों या प्रदेश का कामकाज ठप्प हो जाता है, हिंसा और तोडफ़ोड़ में नुकसान भी होता है जिंदगी भी अस्त-व्यस्त होती है, तो ऐसी शरारत करने के लिए दुनिया की कई ताकतें आमादा रह सकती हैं। भारत के अलग-अलग धर्मों के लोगों को भड़काने का काम अधिक मुश्किल नहीं है। आज देश में धार्मिक तनाव कुछ इस तरह का है कि हर धर्म मानो बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है, और उसके लोग भड़कने के लिए एकदम तैयार हैं। यह नौबत देश के लिए बहुत खतरनाक है। किसी भी धर्म के लोगों को उनके धर्म का अपमान होने पर सरकार को कार्रवाई का मौका देना चाहिए। जब भीड़ के दबाव के तहत कोई कार्रवाई होती है, तो एक बहुत बड़ा खतरा यह रहता है कि किसी बेकसूर को फांसकर पुलिस तनाव को खत्म कर दे, और असली मुजरिम बचे ही रह जाएं। यह नौबत इसलिए खतरनाक है क्योंकि बच गए मुजरिम फिर ऐसी हरकत कर सकते हैं। इसलिए हर धर्म के प्रमुख लोगों को, उनके इलाके के राजनीतिक और सामाजिक नेताओं को जनता की भावनाओं के साथ इतना तालमेल बनाकर रखना चाहिए कि किसी छुपे हुए बेनाम, बेचेहरा मुजरिम की बदमाशी पर भावनाएं ऐसी न भड़कें कि उनसे किसी का भला न हो सके। 
भारत जैसा विशाल देश, इतने सारे धर्म, और हर मोड़ पर कोई न कोई धर्मस्थल, ऐसे में भड़काने के लिए, आतंक फैलाने के लिए, लोगों को एक-दूसरे से टकराने के लिए देश के बाहर की ताकतें, और देश के भीतर की भी ताकतें बड़ी आसानी से ऐसी शरारत कर सकती हैं। देश के लोगों में न्याय की भावना, एक वैज्ञानिक सोच, लोकतंत्र के प्रति सम्मान, और सरकार के प्रति एक तर्कसंगत नजरिया होना चाहिए। भावनाओं का भड़कना तो बहुत आसान रहता है, लेकिन भड़की हुई भावनाओं को काबू में करना बहुत मुश्किल रहता है और कई बार नुकसान, बड़ा नुकसान हो जाने बाद ही किसी तरह से भावनाएं शांत हो पाती हैं। देश में और प्रदेश में जब ऐसे नेता रहते हैं कि जिनके ऊपर जनता को यह भरोसा रहता है कि उनकी नजरों में सारे धर्म बराबर हैं, और उनकी सरकार के चलते किसी धर्म के साथ ज्यादती नहीं होगी, तब भी तनाव अपने आप कुछ कम होते हैं। लेकिन यह सिलसिला खतरनाक है। हमारा मानना है कि कोई भी धर्म हो, उसका अपमान करने वाले मुजरिमों को एक जांच के बाद ही पकड़ा जा सकता है, उसके पहले सड़कों पर तनाव से सबका नुकसान होता है। इससे बचा जाना चाहिए। पंजाब में तो आज सरकार ही अकाली दल की है जो कि सिखों की राजनीति ही करती है। दूसरी तरफ केन्द्र में सरकार जिस एनडीए गठबंधन की है, उसमें भी अकाली दल हिस्सेदार है। इसलिए पंजाब में आज हुई किसी भी वारदात की जांच और उस पर कार्रवाई में केन्द्र और राज्य सरकारों से किसी कमी का कोई खतरा नहीं है। ऐसे में वहां की जनता को, और बाकी देश में भी सिखों को शांत रहकर इन दोनों सरकारों को कार्रवाई करने का मौका देना चाहिए, वरना दबाव में झूठे नतीजे सामने आ सकते हैं। 

देश में आज की जहरीली हवा और उसके खतरे

20 अक्टूबर 2015
संपादकीय

देश भर में नकारात्मक बातों का एक सैलाब सा आया हुआ है। बलात्कार की खबरों से मीडिया भरा हुआ है, और जो लोग अब तक बलात्कार नहीं कर पाए हैं, और ताकत की जगहों पर बैठे हैं, वे जुबानी बलात्कार करने में लगे हुए हैं। शायद ही कोई पार्टी ऐसी बची हो, जिसके लोगों ने बलात्कार को लेकर अपनी हिंसक सोच का हमला महिलाओं पर न किया हो। लेकिन इससे परे देश में आज साम्प्रदायिकता को लेकर, धार्मिक भेदभाव को लेकर, किसी के देशभक्त होने, या गद्दार होने को लेकर, देश में रहने के हक रहने और न रहने को लेकर, खान-पान को लेकर, और किसी पाकिस्तानी के हिंदुस्तान आने, न आने को लेकर, तरह-तरह की हिंसा हो रही है, और ऐसा लग रहा है कि देश एकाएक कई सदी पीछे धकेल दिया गया है। किताबों पर रोक की बात हो रही है, और लेखकों को, विचारकों को गोलियां मारी जा रही है। गांधी का नाम लेकर चुनाव जीत लेने के बाद अब गोडसे को स्थापित करने, महिमामंडित करने का अभियान चल रहा है, और गाय की आड़ लेकर लोगों को पाकिस्तान धकेलने की कोशिश चल रही है।
दुनिया का इतिहास गवाह है कि जब भी कोई देश इस किस्म की गैरजरूरी हिंसा या अय्याशी में डूब जाता है, वह विदेशी हमलों के लिए तैयार सामान रहता है। आज चूंकि हिंदुस्तान की सरहद से हमला आसान नहीं है, इसलिए हमला इस देश की अर्थव्यवस्था पर होगा, यहां की उत्पादकता पर होगा, यहां की संभावनाओं पर होगा, यहां के होनहार-हुनरमंद दिमागों पर होगा, यहां के कारोबार-कारखानों पर होगा। आज अगर मोदी सरकार और उसके साथी-समर्थक यह मानते हैं कि गाय के नाम को लेकर देश भर में फैलाई जा रही हिंसा से इस देश में आने वाले पूंजीनिवेश पर फर्क नहीं पड़ेगा, तो वे गलती पर हैं। अगर उनको लगता है कि इस किस्म की साम्प्रदायिक धर्मांन्धता को बढ़ाते चलने के बाद भी इस देश के काबिल नौजवान दिमाग यहां बने रहेंगे, तो यह उनकी चूक होगी। देश के ऐसे माहौल के बीच अधिक से अधिक लोग बाहर जाने के बारे में सोचेंगे क्योंकि वहां उनकी खूबियों की इज्जत भी अधिक होगी, और उनको आगे बढऩे की संभावनाएं भी ऐसे हिंदुस्तान के मुकाबले बहुत अधिक मिलेंगी।
इतिहास गवाह है कि एक वक्त जब भारत के राजा-महाराजा रास-रंग में डूबे हुए अय्याशी में लगे हुए थे, तब विदेशी हमलावरों को भारत में घुसने का मौका मिला था। जब कभी कोई देश अपनी बुनियादी जरूरतों को छोड़कर गैरजरूरी मुद्दों में उलझ जाता है, तो तमाम जुमलों और नारों के बावजूद वह डूबने लगता है। आज हिंदुस्तान की हालत कुछ वैसी ही दिख रही है। आज अगर इस देश में जनता की बेचैनी आग की तरह भभक नहीं रही है, तो यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने की वजह से है। वरना खाने-पीने की महंगाई ने कोई कसर छोड़ी नहीं है। आज देश की तात्कालिक और दीर्घकालीन जरूरतों को छोड़कर जिस तरह के भावनात्मक-भड़कावे को देश की मूल जरूरत बनाने की कोशिश चल रही है, उससे हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र तो नहीं बन पाएगा, एक खोखला राष्ट्र जरूर बन जाएगा। पिछली यूपीए सरकार को कोस-कोसकर पिछला आम चुनाव जीतना तो आसान था, अब मोदी सरकार के लिए, एनडीए के लिए यह आसान नहीं होगा कि देश में लगातार लगाई जा रही, और फैलाई जा रही आग से राख हो रही संभावनाओं पर अगला चुनाव लड़ा जा सके। हम न सिर्फ देश की बर्बादी की बात कर रहे हैं, बल्कि हम अगले चुनाव में मोदी और उनकी पार्टी की संभावनाओं की लगातार बढ़ रही बर्बादी की बात भी कर रहे हैं। आज जो लोग इस देश को साम्प्रदायिकता में झोंक रहे हैं, वे लोग अगले चुनाव के नतीजे अपने माथे पर लेने के लिए सामने नहीं रहेंगे, उस दिन वे अपने-आपको गैरराजनीतिक साबित कर देंगे। इसलिए चाहे देश, लोकतंत्र, और इंसानियत के हित में न सही, अपने-आपके हित में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इन खतरों को समझना चाहिए। किसी देश की हवा में इतना जहर फैला हो, तो वहां पर नफरत के अलावा और कोई चीज नहीं बन सकती। 

छत्तीसगढ़ की राजधानी में बड़े-बड़े जुर्म, और पुलिस

संपादकीय
19 अक्टूबर 2015

देश भर की खबरों में पिछले चार महीनों से बने हुए रायपुर के नन-बलात्कार कांड में पुलिस ने सैकड़ों लोगों की छानबीन के बाद डीएनए जांच के आधार पर दो नौजवानों को गिरफ्तार करके मीडिया के सामने पेश किया, जो कि उसी इलाके में घूमने वाले, नशे के आदी लोग थे। इस घटना को लेकर छत्तीसगढ़ सरकार और पुलिस को देश भर से सवालों के जवाब भी देने पड़ रहे थे, और मीडिया में कुछ ऐसा माहौल भी बन रहा था कि यह बलात्कार देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता का एक नतीजा हो सकता है। अभी जो नतीजा पुलिस ने सामने रखा है, वह ऐसी किसी साम्प्रदायिकता की उपज नहीं दिख रहा है, और ऐसा न हो तो ही इस शांत राज्य के लिए बेहतर है। 
यह मौका रायपुर पुलिस के बारे में कुछ लिखने का है। पिछले कुछ बरसों में लगातार इस शहर में जितने बड़े-बड़े मामले हुए, उनमें से अधिकतर मामले पुलिस ने सुलझा लिए। इसमें कई तरह की हत्या, कई तरह की लूट, कई तरह की डकैती के मामले थे, और पुलिस की कामयाबी उसे कुछ तारीफ का हकदार बनाती है। आमतौर पर पुलिस के खिलाफ लिखने की जरूरत पड़ती है, और पुलिस का काम ऐसा है कि उसकी खामियां सिर चढ़कर बोलती हैं, और उसकी खूबियां अनदेखी रह जाती हैं। इसलिए हम सरकार के किसी अमले के अच्छे काम, या उसकी किसी खूबी को अनदेखा करने के बजाय उस पर लिख रहे हैं। इस शहर में बड़े-बड़े जुर्म कम नहीं हुए, खासे हुए हैं, लेकिन उनमें मुजरिमों को पकड़ लेना, करोड़ों की नगदी को बरामद करके पेश कर देना छोटी बात नहीं है। कई बार पुलिस की ऐसी तस्वीर बनती है कि वह जुए की फड़ में जब्त रकम को भी दबा देती है, लेकिन रायपुर पुलिस ने शहर से एक डकैती में गई पौन करोड़ के करीब की रकम फिल्मी अंदाज में जब्त की, और जब तक डकैत पूना पहुंचकर ट्रेन से उतरते, तब तक रायपुर पुलिस वहां पहुंचकर उनका इंतजार कर रही थी। 
भ्रष्टाचार की कहानियां सरकार के किसी भी दूसरे विभाग की तरह पुलिस विभाग को लेकर भी चलती रहती हैं, उनसे कोई इंकार नहीं हो सकता। लेकिन बड़े-बड़े जुर्म में मुजरिमों का लगातार पकड़ा जाना हमारे हिसाब से पुलिस की एक बड़ी कामयाबी है। दूसरी बात लगे हाथों यह भी कहना ठीक है कि छत्तीसगढ़ की इस राजधानी में संगठित अपराध, संगठित गुंडागर्दी, संगठित उगाही के दिन खत्म हो गए हैं। पिछले कुछ बरसों में लगातार पुलिस का कुछ ऐसा दबाव अपराधियों पर रहा कि ऐसे गिरोह और ऐसे नामी-गिरामी गुंडे एक-एक कर घर बैठ गए। 
कुछ लोगों को लग सकता है कि बलात्कार के आंकड़ों में छत्तीसगढ़ देश में सबसे ऊपर के राज्यों में आता है, लेकिन बलात्कार को हम आमतौर पर रोके जा सकने वाले अपराध में नहीं गिनते। कुछ मामले ऐसे जरूर रहते हैं जिनमें छेडख़ानी की शिकायतों के बाद भी पुलिस लापरवाही बरतती है, और फिर ऐसे में हौसला बढऩे के बाद गुंडे बलात्कार करते हैं, और ऐसे मामलों में पुलिस जवाबदेह गिनी जानी चाहिए। लेकिन बलात्कार के अधिकतर मामले पुलिस के रोके रूकने वाले नहीं रहते। इनके लिए जनता को ही सावधान रहना चाहिए, या फिर अधिक से अधिक यह हो सकता है कि बलात्कारी को पकड़कर अदालत से सजा दिलवाने की अपनी जिम्मेदारी पुलिस पूरी करे। नन-बलात्कार कांड में आज महीनों बाद यह नौबत आ रही है, और बिना किसी सुबूत के, बिना किसी संदेह के, इन मुजरिमों को पकडऩा आसान भी नहीं था। 
किसी भी प्रदेश या शहर में पुलिस की कामयाबी के लिए समाज की एक जागरूक हिस्सेदारी भी जरूरी होती है। यह बात तो सही है कि आज पुलिस का बहुत सा काम टेलीफोन कॉल रिकॉर्ड और उससे मुमकिन हुई तलाश की वजह से आसान हो गया है, लेकिन फिर भी चौकसी में जनभागीदारी का महत्व कम नहीं हो जाता। लोगों को खुद भी समाज में अपराध की आशंकाओं पर नजर रखनी चाहिए, और उसी से एक बेहतर पुलिसिंग मुमकिन है। फिलहाल यह मौका रायपुर पुलिस को उसकी कामयाबी पर बधाई देने का है। 

कितने हिन्दुस्तानी मां-बाप ऐसे बेटे पर फख्र करेंगे?

19 अक्टूबर 2015
अमरीका के दक्षिण कैरोलिना में आई बाढ़ में एक बस्ती बुरी तरह से घिर गई है, और टापू बन गई है। वहां पर एक परिवार का 15 बरस का लड़का घर की मोटरबोट से लोगों को बाहर की आबादी तक लाने ले जाने के काम में रात-दिन लगा हुआ है। और बाहर की जमीन तक पहुंचाने, वहां से सामान लाने के अलावा वह डूबे हुए उन इलाकों में भी लोगों को इधर-उधर ला-ले जा रहा है, जहां पर सड़कें ही नदी बनी हुई हैं, और वहां भी बोट चल रही है। अभी रात साढ़े 10 बजे वह एक परिवार को बोट से छोड़कर आया, तो उसके पिता ने कहा कि उन्हें अपने बेटे पर बड़ा फख्र है कि वह इस काम में लगा हुआ है। 
हिन्दुस्तान में 15 बरस के बच्चों के आम मां-बाप ऐसी बाढ़ के किसी वक्त अपने बच्चों को घर पर हिफाजत से रखने के अलावा शायद ही और कुछ सोचें। यह भी हो सकता है कि जिन इलाकों में आदतन बाढ़ आती है, असम जैसे वैसे इलाकों में बच्चे भी ऐसी मदद में डूबते हैं और वे हमारी नजरों में न आ पाते हों। लेकिन यह पूरी मिसाल भारत में भी बच्चों के सोचने के लायक है, और उनके मां-बाप के भी। 
15 बरस की जिस उम्र में खाते-पीते घरों के बच्चे दोपहिया चलाने लगते हैं, मोबाइल फोन सस्ते से महंगा पाने की कोशिश करने लगते हैं, वे बच्चे समाज के लिए क्या करना सीखते हैं? क्या वे इतने बड़े नहीं हो गए रहते कि उन्हें बिना खतरे वाले सामाजिक कामों में लगाया जाए? जब कहीं बाढ़ आती है, तो लोगों के घर बह जाते हैं, पहनने को कपड़े नहीं बचते, वैसे में देश भर में लोग कपड़े और बाकी जरूरी सामान जुटा सकते हैं, और उन्हें डूबे हुए, या भूकंप में बिखरे हुए इलाकों के लिए भेज सकते हैं। बच्चों से लेकर नौजवानों तक ऐसे काम में लग सकते हैं। 
फिर सामाजिक जागरूकता के बहुत से ऐसे अभियान होते हैं जिनमें बच्चों को लगाया जा सकता है। वे वालंटियर होकर सार्वजनिक जगहों पर गंदगी फैलाते लोगों को रोकने के काम में एक औपचारिक दर्जा देकर लगाए जा सकते हैं, लोगों को पार्किंग ठीक करने के काम में लगाए जा सकते हैं, और जहां लोग कतार में न लगते हों, वहां भी उन्हें रोकने-टोकने के काम में उनको लगाया जा सकता है। कभी-कभी एनसीसी जैसे किसी संगठन के बच्चे चौराहों पर ट्रैफिक काबू में रखने में मदद करते दिखते हैं, लेकिन बाकी बच्चों को भी ऐसे काम में लगाया जा सकता है। 
अब सवाल यह है कि इस देश में दसियों करोड़ ऐसे किशोर-किशोरी और नौजवान हैं जिनके पास बहुत सी ऊर्जा है, और कुछ न कुछ खाली वक्त है। अब इनको किसी नेता से तो कोई प्रेरणा मिल नहीं सकती। नेताओं की साख का ऐसा भ_ा बैठा हुआ है कि लोग उनका मुंह भी देखना नहीं चाहते। लेकिन कुछ फिल्म सितारे ऐसे हैं, कुछ खिलाड़ी ऐसे हैं, और कुछ होनहार बच्चे ऐसे हैं कि जिनकी कही हुई बात नौजवान पीढ़ी पर असर करे। आज अगर सानिया मिर्जा से लेकर साइना नेहवाल तक, और अनुष्का शर्मा से लेकर विराट कोहली तक, ऐसे दर्जनों लोग हो सकते हैं जिनको अगर सरकार या समाज ऐसे किसी अभियान में लगाए, तो वे अपने निजी असर से करोड़ों लोगों को कहीं पेड़ लगाने में लगा सकते हैं, तो कहीं रक्तदान में। 
कोई भी देश तब आगे बढ़ सकता है जब वह अपनी संभावनाओं पर काम करे। जो मौजूदा क्षमता है, उस पर तो हर कोई, हर देश काम कर लेते हैं। लेकिन जो अब तक अनछुई बची हुई संभावनाएं हैं, उनका आसमान अपार होता है। भारत में ही अगर दसियों करोड़ लोग कुछ किस्म के सामाजिक कामों में लगें, तो यह देश पूरी तरह से बदल सकता है। लेकिन जो लोग ऐसे अभियान के ब्रांड एम्बेसडर बनें, उनकी अपनी विश्वसनीयता अच्छी होनी चाहिए, उनकी अपनी एक शोहरत भी होनी चाहिए। 
दरअसल आज हिन्दुस्तान में नौजवान पीढ़ी के सामने धर्म से उपजी नफरत का जहर बाहें फैलाए खड़ा है। यह जहर लोगों के जहन में भरते चले जा रहा है, और उनके खाली दिमाग को शैतान का डेरा बनाते चल रहा है। ऐसे में अगर किसी रचनात्मक और सकारात्मक काम में नौजवान दिमागों को नहीं लगाया गया, तो फिर नफरत में तो यह ताकत रहती ही है कि वह बड़ी तेजी से लोगों पर काबू कर ले। इसके बाद आज टेक्नालॉजी की दिलाई हुई डिजिटल-बर्बादी भी है जो कि लोगों के दिमाग गैरजरूरी कूड़े से भरते चल रही है। ऐसे में एक बड़ी जरूरत है नौजवान पीढ़ी को जिम्मेदारी का एहसास कराने की, और उन्हें एक संगठित तरीके से ऐसे काम में लगाने की जिसमें कि उनको खुद को एक गौरव भी हासिल हो। 
आज हमको यह लगता है कि ऐसे किसी भी काम से राजनीति को अपने आपको दूर रखना होगा, क्योंकि वह प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) साबित हो चुकी है। भारत में आज जिस सामाजिक मुद्दे को बर्बाद करना हो उससे नेता और राजनीतिक जोड़ देना काफी हो जाता है। अब जहां तक सरकारी योजनाओं या मदद का सवाल है, तो सत्ता चलाने वाली पार्टी की यह जाहिर प्राथमिकता होती है कि उससे पार्टी का क्या फायदा होगा? भ्रष्टाचार वाले फायदे के अलावा भी शोहरत वाले फायदे की हसरत किसी राजनीतिक पार्टी के मन से हट नहीं सकती। ऐसे में सरकारी मदद के बिना, सरकार के बिना, राजनीति के बिना सामाजिक क्षेत्र में ऐसा आंदोलन छेडऩे के लिए स्थानीय स्तर पर भी, और राष्ट्रीय स्तर पर भी लोगों की जरूरत है। 
आज अगर रतन टाटा जैसे लोग, या कि अजीम प्रेमजी जैसे लोग सामाजिक आंदोलनों से जुड़ते हैं, तो अपनी दौलत से परे भी, वे अपनी साख से, अपनी लीडरशिप के हुनर से भी लोगों को जोड़ सकते हैं, और देश की तस्वीर को बदल सकते हैं। आज अमरीका में बिल गेट्स ने अपनी खुद की आधी दौलत समाज सेवा के लिए लगाकर एक आंदोलन छेड़ा जिसमें लगातार दुनिया के दूसरे खरबपति जुड़ते जा रहे हैं, और वे भी अपनी आधी-आधी पूंजी समाज को देने का काम कर रहे हैं। भारत में भी ऐसे काम में लोग जुड़ सकते हैं। अमिताभ बच्चन, सचिन तेंदुलकर, आमिर खान जैसे लोग जो कि आज भी शायद हर बरस सैकड़ों करोड़ रूपए कमाते हैं, वे अगर अपने खाली वक्त को, और अपनी कुछ दौलत को अपने पसंदीदा किसी एक सामाजिक काम के लिए लगाएं, और देश भर में अपने प्रशंसकों को जोड़ें, तो पल भर में देश में जरूरत से कई गुना रक्तदान हो सकता है, जरूरत से कई गुना नेत्रदान हो सकता है, और जितने पेड़ कटते हैं, उनके कई गुना पेड़ लग भी सकते हैं। भारत में भी अच्छा काम करने वाले लोग हैं, लेकिन वैसे और बहुत से लोगों की जरूरत है। इसमें साख, शोहरत, और वक्त इन सबको लगाने वाले लोग देश को कहां से कहां पहुंचा सकते हैं। 
और जब तक कोई ऐसे संगठित सामाजिक आंदोलन शुरू नहीं होते हैं, मां-बाप को खुद ही अपने बच्चों को ठोस समाजसेवा में लगाने का रास्ता दिखाना चाहिए, और बच्चों को कोई राह दिखाना एक मिसाल पेश करके ही किया जा सकता है। 

बच्चों का यौनशोषण कोई पश्चिमी समस्या नहीं

संपादकीय
18 अक्टूबर 2015

दिल्ली में ढाई बरस की एक बच्ची से बलात्कार हुआ, तो उसके दो मुजरिम पकड़ाए हैं। ये परिवार के जान-पहचान के ही नाबालिग लड़के थे। देश भर में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब ऐसे दस-बीस मामले अस्पताल और पुलिस तक न पहुंचते हों। दिल्ली चूंकि कैमरों के घेरे में रहती है इसलिए वहां की छोटी-छोटी बात भी खबर बन जाती है। फिर दूसरी बात यह कि जब परिवार के लोग यह तय करते हैं कि ऐसे बलात्कार या देहशोषण के मामले पुलिस तक ले जाए जाएं, तभी वे मीडिया की नजर में भी आते हैं। लेकिन इससे कई गुना अधिक मामले सामाजिक शर्मिंदगी या पारिवारिक असुविधा की बात सोचकर घर में ही दबा दिए जाते हैं। 
अब इस नौबत को देखते हुए पूरे देश में जिन बातों की जरूरत है, उनमें पहली तो यह है कि छोटे बच्चों को बिना हिफाजत न छोड़ा जाए। बेंगलुरू जैसे एक बड़े शहर में स्कूली बच्चियों से स्कूलोंं में ही लगातार बलात्कार के मामले सामने आते रहते हैं, और सबसे पढ़े-लिखे शहर का यह हाल है। गांवों में नौबत और खराब होगी, यह तय है। इसलिए पूरे देश में बच्चों की हिफाजत को लेकर न सिर्फ सरकार को बल्कि समाज और परिवार को भी एक नई जागरूकता के साथ और एक नई सावधानी के साथ सोचने की जरूरत है। दूसरी बात यह कि समाज को यह भी समझना पड़ेगा कि बच्चों का देहशोषण करने वाले लोग उसके अपने बीच के होते हैं, और बहुत से मामलों में उनकी परिवार तक, स्कूल तक पहुंच होती है। इसलिए अपने पारिवारिक परिचितों के बारे में ऐसा अंधविश्वास ठीक नहीं है कि वे भला ऐसा कैसे कर सकते हैं। 
तीसरी बात यह कि बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो शायद किशोरावस्था से भी पहले, आठ-दस बरस की उम्र से उन्हें उनके बदन के बारे में, और सावधानी बरतने के बारे में सिखाना बहुत जरूरी है। भारत में दरअसल जब कभी बच्चों को सिखाने के मामले में सेक्स शब्द का इस्तेमाल भी होता है, तो संस्कृति के ठेकेदारों का एक ऐसा तबका उठकर खड़ा हो जाता है जो सोचता है कि यह बच्चों को सेक्स करना सिखाने की योजना है। बच्चों को उनके बदन की जानकारी देना, और सेक्स के प्रति सावधान करना भी एक जरूरी शिक्षा है, और देश का कट्टरपंथी माहौल इसकी इजाजत ही नहीं देता है। नतीजा यह होता है कि बच्चे किशोरावस्था से पार होने लगते हैं, और अपने बदन से लेकर देहसंबंधों तक की उनकी जानकारी पोर्नोग्राफी या अश्लील फिल्मों से मिली रहती है, उन्हें किसी तरह की वैज्ञानिक या मानसिक सीख नहीं मिल पाती। 
देश भर में सेक्स-अपराध बहुत बढ़ रहे हैं, और बच्चों की जिंदगी में सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। स्कूलें दूर-दूर हैं, वहां आना-जाना पड़ता है, खेलकूद में बच्चों को दूर तक जाना पड़ता है, और जब मां-बाप दोनों कामकाजी रहते हैं तो भी बच्चों को घंटों तक अकेले रहना पड़ता है। ऐसे में कम उम्र से भी उनको एक सावधानी सिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि बच्चे परिवार से जुड़े किसी के बारे में मां-बाप को शिकायत करते हैं, तो मां-बाप उनको ही झिड़ककर चुप करा देते हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए, क्योंकि सेक्स-अपराधी चारों तरफ फैले हुए हैं, और मौकों की तलाश में रहते हैं। पश्चिमी देशों में साइबर-पुलिस लगातार ऐसे मुजरिमों को इंटरनेट पर तलाशती रहती है, और पकड़कर सजा भी दिलवाती रहती है। लेकिन भारत अभी तक बच्चों के यौन शोषण के खतरों की तरफ से आंखें बंद किए बैठा है कि मानो यह कोई पश्चिमी समस्या है। 

नफरती-हिंसक बातों के जवाब में भलमनसाहत की जरूरत

संपादकीय
17 अक्टूबर 2015

कुछ दिन पहले मुम्बई की एक खबर थी कि किस तरह एक पाकिस्तानी बच्ची के इलाज के लिए वहां के लोगों ने पैसे इक_े किए, और उसका ऑपरेशन करवाया, ठीक होकर वह पाकिस्तान लौटी। अभी पाकिस्तान से लेकर भारत तक के मीडिया पर पाकिस्तान में फंसी हुई एक भारतीय हिन्दू लड़की की तस्वीरें और कहानी छाए हुए हैं कि किस तरह उसे भारत लाने की, उसके परिवार की शिनाख्त की कोशिश चल रही है। पाकिस्तान में उसे एक मुस्लिम समाज सेवक ने अपने परिवार में रखा हुआ है और वहां वह हिन्दू धर्म का अपना पूजा-पाठ अपने हिसाब से कर रही है। हाल ही में आई एक हिन्दी फिल्म बजरंगी भाईजान की कहानी देखें तो एक खालिस हिन्दू-हिन्दुस्तानी एक मुस्लिम-पाकिस्तानी बच्ची को उसके घर पहुंचाने के लिए अपनी जान खतरे में डालकर सरहद पार करके वहां जाता है। असल जिंदगी को देखें तो सरहद के दोनों तरफ ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जो एक-दूसरे को बचाने के लिए खासी मेहनत करते हैं, एक-दूसरे को अपने घरों और दिलों में जगह देते हैं। 
लेकिन दूसरी तरफ सरहद के दोनों तरफ ऐसे सामाजिक और राजनीतिक नेता हैं, ऐसे धार्मिक नेता हैं, और फौजी अफसर हैं जो कि भड़काने और नफरत की बातों में लगे रहते हैं। और यह भड़काना सिर्फ एक-दूसरे देश के खिलाफ नहीं हैं, यह तो अपने देश के भीतर ही दूसरे धर्म के लोगों, अपने ही धर्म के दूसरे समुदायों के लोगों के खिलाफ हिंसा के लिए भड़काने की बात है। पाकिस्तान में कुछ मुस्लिम संगठन ईसाईयों को तो मार ही रहे हैं, लेकिन वे इस्लाम को मानने वाले कुछ दूसरे मुस्लिम सम्प्रदायों को भी मार रहे हैं। हिन्दुस्तान में कुछ हिन्दू मुस्लिमों के खिलाफ खानपान को लेकर हिंसक और देशद्रोह के बयान दे रहे हैं, उनको पाकिस्तान जाने को कह रहे हैं, लेकिन ऐसे हिंसक लोग हिन्दू धर्म के भी अनगिनत लोगों के खानपान के खिलाफ लगे हुए हैं, और गाय को मुद्दा बनाकर इंसानों को मार रहे हैं। एक तरफ तो हिन्दू समाज के लोग अपने लोगों की आबादी अधिक बताने के लिए दलितों और आदिवासियों को हिन्दू बताते थकते नहीं हैं, लेकिन दलित आदिवासी लोगों को उनके खानपान के तौर-तरीकों से दूर करने के काम में भी ऐसे हिन्दू लगे हुए हैं जो कि एक बहुत छोटे, सवर्ण कहे जाने वाले, शुद्धतावादी तबके के हैं, और वे अपनी एक संस्कृति को पूरे देश की संस्कृति बनाने के लिए असीमित मनचाही हिंसा पर आमादा हैं। 
सदियों से इस देश में तरह-तरह की संस्कृतियां साथ-साथ रहते आई हैं। और लोकतंत्र तो यहां पौन सदी के भीतर ही आया है। अब लोकतंत्र के पहले के दिनों में भी जो आजादी भारत के अलग-अलग तबकों को थी, लोगों का एक-दूसरे के लिए जो बर्दाश्त था, कबीर के समय से जो प्रगतिशील सोच चली आ रही थी, उन सबको आज लोकतंत्र के इस दौर में भी कुचलकर खत्म किया जा रहा है। आज भी आम जनता को अगर बिना उकसावे और भड़कावे के जीने दिया जाए तो भारत और पाकिस्तान के लोग एक-दूसरे के साथ आवाजाही और खेलकूद, फिल्म और संगीत,  साहित्य और कला, सभी में भागीदारी के लिए उत्साही हैं। दोनों तरफ के इंसान एक-दूसरे के काम आने को खड़े हैं। दोनों ही देशों में आम लोग अपने-अपने लोगों से बिना भेदभाव मोहब्बत से साथ जीने को भी तैयार हैं। लेकिन जिन लोगों का धंधा नफरत से चलता है, उनको भी अपनी दुकान चलानी है। और इसलिए वे पहले दूसरे देश के खिलाफ हिंसा का फतवा देते हैं, फिर अपने ही देश में दूसरे धर्म के खिलाफ जान लेना शुरू करते हैं, इसके बाद अपने ही धर्म के दूसरे तौर-तरीकों के, दूसरे रीति-रिवाजों के लोगों को मारना शुरू करते हैं, और फिर जब यह भी या तो पूरा हो जाता है, या मुमकिन नहीं होता है, तो वे अपने ही बच्चों को प्रेम विवाह करने के जुर्म में मारना शुरू करते हैं। 
जो भी यह सोचते हैं कि मोहब्बत या नफरत किसी इंसान में टुकड़े-टुकड़े में आ सकती हैं, वे गलत सोचते हैं। जिनका मिजाज मोहब्बत का होता है, वे एक बच्ची को पाकिस्तान पहुंचाने भी अपनी जान-जोखिम में डालकर जा सकते हैं, या पाकिस्तान में अपने मुस्लिम घर में एक हिन्दू बच्ची को मंदिर सजाकर उसकी पूजा के साथ उसे बेटी बनाकर रख सकते हैं। दूसरी तरफ जो लोग नफरत पर जिंदा रहते हैं, वे जब तक किसी से नफरत न कर लें, तब तक वे दोपहर का खाना नहीं खा पाते, और रात को चैन से सो नहीं पाते। ये दोनों देश तो एक मिसाल हैं, दुनिया में जहां-जहां लोग नफरत कर रहे हैं, वे अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए नफरत के पेड़ लगाकर जा रहे हैं। ऐसा करना कुदरत के पेड़ों की मिसाल के लायक तो नहीं है, लेकिन नफरती लोग अपनी आने वाली पीढ़ी को हिंसा की वह विरासत दे रहे हैं जिससे उनकी ही आने वाली पीढिय़ां जल मरेंगी। नफरत की ऐसी लपटों के बीच अमन-पसंद प्रेमी लोगों को दूसरे इंसानों से प्रेम को बढ़ाना होगा, क्योंकि नफरती-हिंसा चाहे कितनी अधिक दिखती हो, अधिक लोग तो अमन-पसंद ही हैं। 
नफरत के हर राजनीतिक या साम्प्रदायिक, धार्मिक या फौजी बयान के जवाब में लोगों को भली बातों को बढ़ावा देना होगा, और ऐसा करने पर आखिरकार जीत भलमनसाहत की होगी। 
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आसाराम खुद चाहे जैसा हो, उसके सवाल पर सोचना चाहिए

संपादकीय
16 अक्टूबर 2015
एक नाबालिग से बलात्कार के आरोप में लंबे समय से जेल में बंद आसाराम ने अदालत से अपील की है कि उनके मामले की सुनवाई जल्दी की जाए क्योंकि वे 70 बरस के हो चुके हैं। यह मुद्दा सोचने लायक है कि बिना अदालती सुनवाई के, या सुनवाई चलते हुए किसी को कितने बरस जेल में रखा जा सकता है? और यह बात हम आसाराम के मामले में करना नहीं चाहते जिसके केस में कई गवाह मारे गए हैं, कई पर हमले हुए हैं, कई धमकियां पा रहे हैं। आज आसाराम के भक्तों को छोड़कर शायद ही किसी को उनके साथ कोई हमदर्दी हो, लेकिन देश भर में ऐसे लाखों लोग सुनवाई के इंतजार में, फैसले के इंतजार में जेलों में बंद हैं, और इतने-इतने लंबे अरसे से बंद हैं कि शायद उन्हें होने वाली सजा भी उतनी लंबी न हो।
देश की अदालतों का हाल बहुत खराब है। और कुछ लोगों का हिसाब-किताब यह है कि जिस रफ्तार से मामलों का निपटारा हो रहा है, अदालतों में कतार में लगे सारे मामले शायद अगले ढाई सौ साल में निपट पाएंगे। अब यह अंदाज अगर ढाई सौ साल से घटकर डेढ़ सौ साल हो जाए, या पचास साल भी हो जाए, तो भी क्या फर्क पड़ेगा? लोगों की जिंदगी तो अदालत से मामला निपटने तक खत्म ही हो चुकी होगी। और फिर एक बात यह भी है कि जो लोग सचमुच में ही बेकसूर रहते हैं, और यहां पर हम फिर साफ कर दें, कि यह बात हम आसाराम को लेकर नहीं लिख रहे हैं, वैसे बेकसूर लोग तो जब बेगुनाही के दस-दस बरस जेल में गुजारकर छूट रहे हैं तो उनके बयान भी आ रहे हैं कि अब इस लोकतंत्र पर या अदालती इंसाफ पर उनका भरोसा नहीं रह गया। यह बात सोचने की है कि बेगुनाह बरी होने वाले लोगों का भरोसा अगर भारतीय न्याय व्यवस्था पर से उठ रहा है तो जो बेगुनाह किसी वजह से फंसकर सजा पा जाते हैं, उनके भरोसे का क्या हाल होता होगा? 
लोकतंत्र का यह पहलू बहुत ही अमानवीय है। अदालतों के विस्तार और उनकी सहूलियतों को बढ़ाने की बातें दशकों से चली आ रही हैं, और आज हालत यह है कि जिनके पास अधिक पैसा है, और जिनके पास महंगे वकीलों की सहूलियत है, वैसे लोग अपने खिलाफ मामलों को जब तक चाहें तब तक खींचते चलते हैं। नतीजा यह होता है कि जिनके हक जायज हैं, जो इंसाफ के लिए अदालत में खड़े हैं, जो बेकसूर हैं, लेकिन कमजोर हैं, वे पूरी जिंदगी वहां गुजार देते हैं। यही वजह है कि लोगों के मन में देश के लिए, लोकतंत्र के लिए, भारत की मौजूदा व्यवस्था के लिए सम्मान नहीं रह गया है। और फिर एक दूसरी बात यह भी कि भारत के किसी भी दूसरे दायरे की तरह, अदालतों में भी इतना बुरा भ्रष्टाचार फैला हुआ है कि सबसे अधिक ताकतवर या पैसे वाले की जीत की सबसे अधिक संभावना रहती है। 
यह नौबत बदलने की जरूरत है क्योंकि जब समय रहते इंसाफ नहीं होता तो मुजरिमों के हौसले बढ़ते चलते हैं, और वे सजा के बजाय मजा अधिक करते हैं। हमारा एक और ख्याल है कि भारतीय अदालतों में लगने वाली फीस कुछ इस तरह की रहनी चाहिए कि पैसे वालों के मामलों में फीस अधिक ली जाए, और उसे अदालतों पर खर्च के लिए ही अलग रखा जाए। लगातार ऐसा करने पर कुछ बरस बाद हो सकता है कि गरीबों की बारी भी इंसाफ के लिए आ सके। 

महाराष्ट्र के डांस बार पर से रोक खत्म, एक सही फैसला

संपादकीय
15 अक्टूबर 2015

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले आठ बरस से मुंबई के डांस बार पर राज्य सरकार द्वारा लगाई गई रोक को खत्म कर दिया है। कांग्रेस-एनसीपी की महाराष्ट्र सरकार ने जब यह रोक लगाई थी तब भी हमने इस फैसले का विरोध किया था और इसे एक दकियानूसी कदम बताया था। हमारे नियमित पाठकों को याद होगा कि इन बरसों में हमने दर्जनभर से अधिक बार इसका जिक्र करते हुए कांग्रेस पार्टी की आलोचना की थी, और कहा था कि बार में काम करने वाली दसियों हजार लड़कियां इसके बाद कुछ और अधिक बुरा पेशा करने के खतरे में पड़ गई थीं, और वयस्क मनोरंजन के लिए ऐसी जगहों पर जाने वाले लोग कुछ और खतरनाक बालिग तफरीह की तरफ मुड़ गए। 
शुद्धतावादियों की सोच जिस तरह के सामाजिक सुधार का दावा करती है वैसा सुधार होने के बजाय समाज का नुकसान अधिक होता है। महाराष्ट्र देश का सबसे विकसित और आधुनिक राज्य माना जाता है लेकिन उस राज्य में शिवसेना जैसी सोच के चलते कई राजनीतिक ताकतों के मन में शुद्धतावादी होने की बात उड़ान भरने लगती है। लेकिन यह सिलसिला खतरनाक है और निजी पसंद-नापसंद की आजादी के खिलाफ है ही। मुंबई से लेकर असम तक और राष्ट्रीय महिला आयोग से लेकर इस पार्टी की सरकारों के अफसरों तक, महिलाओं की इज्जत के मामले में इस पार्टी की समझ का दीवाला निकला हुआ है। यह पार्टी एक पुरूषप्रधान हिंसक सोच वाली कट्टर संस्कृति को उसी तरह बढ़ावा दे रही है जिस तरह शिवसेना या श्रीराम सेना देती हैं, जिस तरह से मुस्लिम पंचायतें या खाप पंचायतें फतवे जारी करती हैं। लेकिन अभी सुप्रीम कोर्ट ने जो रोक हटाई है, वह रोक तो महाराष्ट्र में कांग्रेस और एनसीपी की सरकार ने प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर लगाई, और अदालती हार के बाद भी विधानसभा में नया कानून बनाकर उसे फिर जारी रखा था। आज सुप्रीम कोर्ट का फैसला महाराष्ट्र की पिछली सरकार के उस अडिय़ल रवैये के खिलाफ है। 
मुंबई के डांस बार शराबखाने थे और वहां पर सिर्फ वयस्क ग्राहक ही पहुंचते थे। बिना डांस के भी वहां बार चल रहे हैं, जहां सिर्फ बालिग लोगों को ही दाखिला है। इसलिए अगर शराब पीने के साथ-साथ लोग मनोरंजन के लिए नाच देख लेते थे तो उसमें ऐसी कोई सामाजिक बुराई नहीं थी जो कि वेश्यावृत्ति या और कई किस्म के देह संबंधों से अधिक खराब रही हो, या अधिक खतरनाक रही हो। इस देश की संस्कृति में दरबारी नृत्यांगनाओं से लेकर कोठों की तवायफों तक, और सामाजिक जलसों में स्थानीय लोक नर्तकियों तक की लंबी परंपरा रही है। और डांस बार बंद हो जाने के बावजूद देश में जगह-जगह सबसे महंगी होटलों में कैबरे जैसे डांस चलते ही हैं। इसलिए डांस बार पर प्रतिबंध ने ऐसी कोई चीज देश में नहीं रोक दी थी जो कि इस देश के रईसों को हासिल न हो। आज भी देशभर में निजी पार्टियों में हर तरह के डांस के लिए देश-विदेश की नर्तकियां कतार लगाकर काम ढूंढती हैं। 
हिन्दुस्तान को जिस पाखंड से आजाद होना चाहिए, और जिसके लिए कट्टर धर्मान्ध और दकियानूसी लोग अड़े रहते हैं, उनकी पसंद का काम कांग्रेस की अगुवाई वाली महाराष्ट्र की सरकार ने किया था, यह शर्मनाक था। इससे देश में उस हिंसक संस्कृति को बढ़ावा मिलता है जो कि वेलेंटाइन डे पर या नए साल की दावत पर हमले करती है। आज भी सुप्रीम कोर्ट की इस फैसले के बाद आशंका है कि महाराष्ट्र की मौजूदा सरकार इसके खिलाफ फिर कोई तरकीब सोच सकती है। अब महाराष्ट्र की यह जिद खत्म होनी चाहिए, और बिना खतरों वाला यह वयस्क मनोरंजक लोगों को मिलने देना चाहिए। डांस बार में अगर कोई अधिक नुकसानदेह चीज है तो वह शराब है न कि डांस। शराब जारी रहे और डांस रोक दिया जाए, यह बहुत ही बेवकूफी की बात थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस रोक को खत्म करके एक सही फैसला दिया है। 
वयस्क मनोरंजन पर रोक का यह सिलसिला इसलिए खतरनाक है क्योंकि भारत में समाज और सरकार इस हकीकत को मानने से ही इंकार कर देते हैं कि इस देश में वेश्यावृत्ति मौजूद है। जब कभी वयस्क मनोरंजन को खत्म किया जाएगा, ऐसी जरूरत वाले वयस्क लोग किसी अधिक गंभीर बुराई की तरफ मुड़ेंगे। जब चकलाघरों पर पुलिस के छापे बढ़ जाते हैं या बाजार में शरीर का मिलना मुश्किल होने लगता है तो बलात्कार या छेडख़ानी, या देहशोषण के मामले बढऩे लगते हैं। हमने बार-बार यह लिखा है कि सरकारों को समझदारी के जो फैसले करने चाहिए, उसका बोझ सरकारों ने अदालतों पर छोड़ रखा है। जजों से कड़वे फैसले करवाए जाते हैं, और नेता मतदाताओं के सामने चापलूस बने खड़े रहते हैं। इस देश में समलैंगिकता, पोर्नोग्राफी, शराब, जुआ, वयस्क मनोरंजन, ऐसे बहुत से मुद्दों पर सरकारें अपने को संस्कृति का ठेकेदार बनाए रखती हैं, और जजों को सामाजिक मुद्दों पर फैसले देने पड़ते हैं। महाराष्ट्र सरकार के मुंह पर यह अदालती तमाचा पडऩे के बाद के इन बरसों में लाखों पेट क्या-क्या करके जिए होंगे, यह सोचना भी मुश्किल है। 

चुनाव में कामयाब नेता, बड़ा नेता बनने के मौके लगातार खोते हुए

14 अक्टूबर 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दादरी कांड सहित बहुत से मामले हो जाने के बाद पहली बार इन मुद्दों पर मुंह खोला, और अपने हाथ झटक लिए। उन्होंने कहा कि दादरी की घटना या गुलाम अली का विरोध दुखद है, लेकिन उन्होंने पूछा कि इन घटनाओं में केंद्र सरकार की क्या भूमिका है? पिछले एक पखवाड़े से भारत में यह बहस चल रही थी कि रोज इतना-इतना बोलने वाले मोदी इन जलते-सुलगते मुद्दों पर क्यों खामोश हैं, और कब तक खामोश रहेंगे? और अब जब मोदी ने मुंह खोला है, तो लगता है कि इस बोलने से तो उनकी चुप्पी ही बेहतर थी। भारत का प्रधानमंत्री अगर देश को बांट देने की साजिश के बारे में यह कहे कि इसमें केंद्र की क्या भूमिका है, तो मोदी आज सबसे बड़ा नुकसान अपना खुद का कर रहे हैं। देश का नुकसान तो हो रहा है, वह पहले भी हो चुका है, और देश ऐसे नुकसानों से उबर भी चुका है। आज के हो रहे नुकसान और कुछ बरस जारी रहेंगे, तो भी देश उनसे उबर सकता है, उबर जाएगा, लेकिन आज मोदी अपने खुद की संभावनाओं का जो नुकसान कर रहे हैं, उसकी भरपाई वे अपने इस राजनीतिक जीवन में शायद ही कर सकें।
गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक का सफर नरेन्द्र मोदी के लिए सब कुछ लेकर आया। और इसमें भी सबसे बड़ी बात थी एक बड़ा नेता बनने की संभावना। आज वे जो कुछ भी हैं, वे चुनाव के रास्ते जीतकर आए एक कामयाब नेता हैं, लेकिन चुनावी जीत किसी को बड़ा नेता नहीं बना देती। बड़ा नेता बनने के लिए एक बड़प्पन जरूरी रहता है। और मोदी आज बड़प्पन दिखाने में, बड़प्पन का बर्ताव करने में बहुत तंगदिली दिखा रहे हैं, और एक बड़ा नेता बनने की अपनी संभावनाओं को खत्म भी कर रहे हैं। देश में वोटरों के बहुमत से जीतकर आई पार्टी के भीतर बहुमत से किसी ओहदे तक तो कोई भी पहुंच सकते हैं। लेकिन वह बड़ा नेता बनने की मंजिल नहीं होती, वह  इस लंबे रास्ते का एक पड़ाव होता है। मोदी ओहदे की कामयाबी पा चुके हैं, लेकिन वे एक बड़ा नेता बनने के पहले पड़ाव पर ही हैं। 
भारत का प्रधानमंत्री अगर राज्यों की घटनाओं को राज्य सरकारों की जिम्मेदारी मानकर अपने हाथ झटक ले, तो यह गैरजिम्मेदारी है। भारत के संघीय ढांचे में केंद्र सरकार की भूमिका देश के हर उस मामले में है जिसका असर देश भर पर पड़ सकता है, या जिससे समाज टूट और बिखर सकता है। उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार के राज के खिलाफ कुछ कहना आज शायद बिहार के चुनाव को देखते हुए नरेन्द्र मोदी को ठीक न लग रहा हो, लेकिन जिस महाराष्ट्र में गुलाम अली को घुसने नहीं दिया गया, वहां तो मोदी की ही पार्टी की सरकार है, और सरकार में भागीदारी शिवसेना ने ही हिंसा के साथ विरोध करके गुलाम अली को रोका, और सुधीन्द्र कुलकर्णी का मुंह काला किया। क्या अपनी ही पार्टी की सरकार के राज में हुए इस मामले से भी भारत का प्रधानमंत्री हाथ झटक सकता है? 
जिस बहुमत से नरेन्द्र मोदी देश के इस सबसे बड़े ओहदे तक पहुंचे, उस बहुमत के चलते हुए उनके पास एक दरियादिली दिखाकर देश में सम्मान पाने का एक मौका था, आज वे अपने-आप के लिए कमजोर तर्क देकर बचाव भर पा रहे हैं। देश के ऐसे मुद्दों पर चुप्पी रखकर, जिम्मेदारी से बचकर कोई महान या बड़ा नेता नहीं बन सकते। अभी तो हम सिर्फ बड़ा नेता बनने की बात कर रहे हैं, और नरेन्द्र मोदी एक के बाद एक कई मौकों पर ऐसे मौके चूक रहे हैं।

सरकार और समाज के काम जनभागीदारी से आसान और मुमकिन हो सकते हैं

13 अक्टूबर 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों में कई बार रायपुर में लोगों ने अफसरों को ले जाकर दसियों लाख का गुटखा पकड़वाया। सेहत के लिए जाहिर तौर पर नुकसानदेह गुटखा को राज्य सरकार ने काफी समय पहले से प्रतिबंधित कर रखा है, लेकिन लोगों के बीच इसका चलन खत्म नहीं हुआ, और सरकारी काबू न रहने से यह खुलेआम हर शहर, हर मुहल्ले-बस्ती में आसानी से मिल जाता है। कानूनी रोक रहने से अब बेचने वालों को इसके दाम बढ़ाने का बहाना और मिल गया है, और ऐसी बाकी बेअसर सरकारी रोक की तरह गुटखा का कारोबार भी रोक के बावजूद फल-फूल रहा है, और छत्तीसगढ़ के लोगों को कैंसर के हवाले कर रहा है। 
बाकी लोगों सहित हमारा भी यह मानना है कि सरकारी अनदेखी के बिना, या सरकार के कुछ विभागों की अघोषित भागीदारी के बिना इस तरह के सार्वजनिक जुर्म नहीं हो सकते। पूरे प्रदेश में हर सड़क के किनारे अनगिनत होटल-ढाबे, ठेले और दुकानों पर केंद्र सरकार के रियायती घरेलू गैस सिलेंडरों से चूल्हे जलते दिखते हैं, और कारखानों में सरकार की इस रियायत का बेजा इस्तेमाल भी दर्जनों बार पकड़ाया जा चुका है। इसके बावजूद इनमें से किसी के खिलाफ ऐसी कड़ी कार्रवाई नहीं हुई कि लोग केंद्र सरकार की दी हुई इस रियायत की ऐसी डकैती से बाज आएं। ऐसी ही अनदेखी राज्य सरकार की बिजली की सार्वजनिक चोरी की होती है। धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के लिए खुलकर चोरी की बिजली से दूर-दूर तक रौशनी बिखेर दी जाती है, और सरकारी अमला इसे आमतौर पर अनदेखा करते चलता है।
सरकार के नियमों पर अगर अमल नहीं हो सकता, तो ऐसे नियमों के खिलाफ लोगों के मन में हिकारत भी हो जाती है, और ऐसी बेअसर रोक के खिलाफ लोग और अधिक उत्साह और हौसले से जुर्म करने लगते हैं। यह बात सही है कि सरकार के पास इतना अमला नहीं है कि हर पानठेले पर जाकर गुटखा की जांच कर सके, लेकिन जब कड़ी कार्रवाई होने लगती है, तो अपने-आप जुर्म घटने लगते हैं। और जब सरकार लापरवाही से अनदेखी करने लगती है, तो लोग रियायती रसोई गैस को कारों में भी भरने के लिए पंप लगाकर कारोबार करने लगते हैं। 
राज्य सरकार को जनता से भी जानकारी की मदद मांगनी चाहिए। रायपुर में पिछले महीनों में जितनी भी बार गुटखा पकड़ाया है, हर बार गैरसरकारी नौजवानों की मदद से यह हुआ है। जनता से अधिक जानकारी और कहीं से नहीं मिल सकती है। अब तो हर किसी के जेब में फोन का कैमरा रहता है, और सरकार को लोगों का उत्साह बढ़ाना चाहिए। जनभागीदारी एक बड़ा शब्द होता है, सरकार और समाज के तमाम काम जनभागीदारी से आसान और मुमकिन हो सकते हैं। जब लोग जिम्मेदार बनते हैं, तो वे न सिर्फ जुर्म रोकने की जिम्मेदारी निभाते हैं, बल्कि कई तरह के सामाजिक योगदान में भी हिस्सेदार होते हैं। प्रदेश की जनता की सोच को बढ़ावा देकर सरकार अपने काम को आसान भी कर सकती है, और वाहवाही भी पा सकती है। 

जो आज बिखरता लहू देख तालियां बजा रहे हैं, उनसे...

संपादकीय
12 अक्टूबर 2015
पाकिस्तान के एक पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की लिखी एक किताब मुंबई में आज जारी हो रही है, और इसके आयोजक, भाजपा के लालकृष्ण अडवानी के एक सबसे करीबी रहे हुए सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर आज शिवसैनिकों ने कालिख पोत दी। शिवसेना ने इस पर गर्व जताया है, और सोशल मीडिया पर साम्प्रदायिक ताकतें त्यौहार मना रही हैं। सुधींद्र कुलकर्णी एक समय अडवानी के भाषण-लेखक माने जाते थे, लेकिन पिछले कुछ बरसों से वे लगातार समझदारी की बातें लिख रहे हैं, और कई देशों के कार्यक्रमों में बोलने के लिए जाते हैं। आज भारत और पाकिस्तान के बीच शिवसेना जैसी ताकतें जिस तरह का एक तनाव खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं, उसके चलते अभी इसी हफ्ते मुंबई में पाकिस्तानी गायक गुलाम अली का कार्यक्रम रद्द हुआ, और अब किताब जारी करने के इस मौके पर अड़ंगा डाला जा रहा है। 
यह भारत की हवा में घुल रहे उसी जहर का हिस्सा है जो जगह-जगह विचारकों को, लेखकों और साहित्यकारों का कत्ल कर रहा है, और बाकी लोगों को एक घोषित या अघोषित धमकी भी दे रहा है। इसके खिलाफ देश भर से साहित्य अकादमी सम्मान लौटाए जा रहे हैं, और विचारवान लोग बयान भी दे रहे हैं। लेकिन मोदी सरकार इन तमाम बातों से बेखबर है, और विचारकों के असली कत्ल के मुकाबले इस देश में गाय को काटने की झूठी अफवाह को अधिक महत्व दिया जा रहा है, और पूरे देश में खड़े हो रहे इस अभूतपूर्व साम्प्रदायिक, हिंसक तनाव को बढ़ावा भी दिया जा रहा है। देश की कोई भी सरकार इन बातों से अनजान नहीं हो सकती, और जो मीडिया में रोजाना सौ-सौ बार दिख रहा है, वह केन्द्र सरकार को या कुछ राज्य सरकारों को न दिखे ऐसा हो नहीं सकता। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के ऐसे भड़काए जा रहे हिंसक माहौल के बारे में एक भी शब्द कहने के बजाय महज यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि इस बारे में राष्ट्रपति जो कह रहे हैं उसको मानना चाहिए। भारत जैसा विशाल लोकतंत्र राष्ट्रपति को नहीं चुनता, यह देश और इसकी जनता प्रधानमंत्री को चुनती है, और राष्ट्रपति तो एक बहुत ही सीमित अधिकारों वाला समारोह के लिए रखा गया ओहदा है, जिसकी कही बातों का कोई वजन नहीं होता। रबर स्टैम्प कहे जाने वाले राष्ट्रपति के मुंह से निकली गई बहुत ही अमूर्त और परोक्ष बातों का हवाला देकर प्रधानमंत्री भी अगर चुप हैं, तो फिर इस लोकतंत्र में सरकार और संविधान मानो जनता पर मंडराते इस खतरे से अपनी जवाबदेही से भाग जा रहे हैं। अब ऐसा लगता है कि इस लोकतंत्र में महज अदालतें बची हैं, जहां पर ऐसी नौबत के खिलाफ जाकर एक कोशिश की जा सकती है। 
पाकिस्तान के एक पूर्व मंत्री की लिखी किताब से सहमत या असहमत होने के बहुत से मंच हो सकते हैं, और आज तो सोशल मीडिया और इंटरनेट के चलते हुए हर किस्म के मुजरिम और साम्प्रदायिक के लिए भी अपार जगह पड़ी हुई है। ऐसे में एक किताब का विरोध करने के लिए समारोह के आयोजक का मुंह काला करना, ऐसा करने वालों के अपने मुंह की बेइज्जती के अलावा और कुछ नहीं है। नफरत में बेवकूफों को एक करने की अपार ताकत होती है, इसलिए आज हिन्दुस्तान के वे सारे बेवकूफ जो हिंसा और साम्प्रदायिकता में भरोसा रखते हैं, वे शिवसेना की इस हरकत की तारीफ में, और आयोजक सुधींद्र कुलकर्णी को गालियां देते हुए जुट गए हैं। यह देश में एक बहुत खतरनाक माहौल है, और यह लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा नुकसान है। यह बात सिर्फ पाकिस्तान का विरोध करने का नहीं है, यह बात भारत के भीतर भी विचारों की आजादी का विरोध करने की है, और यह विरोध भी मामूली नहीं है, यह विरोध सीधे कत्ल कर रहा है। इस लोकतंत्र में अब एक बेकसूर इंसान की जिंदगी के मायने एक जानवर की हत्या की झूठी खबर से भी कम रह गए हैं। और आज जिन लोगों को यह हिंसा अच्छी लग रही है, वे इस बात को समझ लें कि जब लोकतंत्र खत्म होता है, और हिंसातंत्र कायम हो जाता है, तो कटने वाला अगला गला उनका भी हो सकता है जो कि आज बिखरता लहू देखकर तालियां बजा रहे हैं। इस देश में यह तालिबानी सोच बहुत लंबा नुकसान करने जा रही है, और मूर्खों की भीड़ को अक्ल वापिस देना एक पहाड़ी चढ़ाई जैसा मुश्किल काम होगा। 

कमर कसकर किफायत, और कमाई के रास्तों की जरूरत

संपादकीय
11 अक्टूबर 2015

दक्षिण भारत में डाक तार विभाग में डाकघरों से सरकारी कंपनी का एक सस्ता मोबाइल फोन बेचने का प्रयोग किया, जो कि सफल रहा। अब विभाग निम्न आय वर्ग के लोगों के इस्तेमाल का यह किफायती फोन कुछ और राज्यों से भी बेचना शुरू कर रहा है। देश में कुछ दशक पहले जब दूरसंचार विभाग का निजीकरण शुरू हुआ, और डाक तार विभाग का एकाधिकार खत्म हुआ, तब से डाक और संचार की निजी कंपनियों से सरकार का एक तगड़ा मुकाबला चलते आ रहा है। और ऐसे में अस्तित्व की लड़ाई में सरकारी कंपनियां भी कुछ-कुछ मेहनत करते दिखती हैं। एक वक्त था जब इस देश में फोन के लिए दस-बीस बरस इंतजार करना पड़ता था, और निजी कंपनियां चि_ियों को पहुंचाने का काम गैरकानूनी तरीके से करने पर मजबूर थीं। खुली बाजार व्यवस्था ने तस्वीर बदलकर रख दी है, और अब सरकार को भी जिंदा रहने के लिए कहीं किफायत बरतनी पड़ रही है, तो कहीं पर कमाई के नए रास्ते देखने पड़ रहे हैं। फिर भी आज हिन्दुस्तान में जहां-जहां सरकारी एकाधिकार है, वहां-वहां बदहाली है। जब निजी क्षेत्र के साथ एक मुकाबला होता है, तो खुद सरकार को पता लगता है कि उसका अमला, और उसका कारोबार कितना नुकसान करते हैं। 
यह बात तो एक छोटी सी मिसाल है कि देश के डाकघर कुछ और बेचने का काम कर सकते हैं, और अपनी खुद की कमाई भी बढ़ा सकते हैं, और सरकार के किसी दूसरे विभाग का फायदा भी कर सकते हैं। अभी दो दिन पहले ही डाक दिवस मनाया गया था, और नई पीढ़ी को एक बार फिर डाक के बारे में जानने को मिला, क्योंकि अब चि_ियां लिखना और भेजना बंद सा हो गया है। ऐसे में देश भर में बिखरे हुए सरकार के अपने ढांचे का इस्तेमाल दूसरे काम के लिए भी होना चाहिए, और ऐसा ही काम रेल विभाग को भी अपने रेलवे स्टेशनों पर करना चाहिए, और स्टेशनों के पास की अपनी खाली जमीन पर भी करना चाहिए। आज हर शहर में स्टेशनों के इर्द-गिर्द दर्जनों छोटी-छोटी होटलें खुल जाती हैं, और इनके बजाय ट्रेन मुसाफिरों की जरूरतों के मुताबिक रेलवे की अपनी होटलें खुल सकती हैं, जहां पर लोग अपनी अगली ट्रेन तक कुछ घंटों के लिए भी रह सकते हैं। ऐसा ही काम सरकार को जगह-जगह करना चाहिए, ताकि घाटा गिनाते हुए उसके अपने संस्थान टैक्स देने वाली जनता पर बोझ न बनें। आज भारत की सरकारी विमान कंपनी एयर इंडिया जिस तरह हर बरस दसियों हजार करोड़ का नुकसान देश पर थोप रही है, और अपनी खुद की संपत्ति की संभावनाओं को देख नहीं रही है, वह सिलसिला भी बदलना चाहिए। 
लेकिन जब हम सरकारी ढांचे के बेहतर इस्तेमाल की बात करते हैं, तो राज्य सरकारों को भी अपने स्कूल और कॉलेज की आधे दिन से अधिक खाली रहने वाली इमारतों के इस्तेमाल के बारे में सोचना चाहिए। हर शहर और कस्बे में तरह-तरह के बहुत से कोचिंग सेंटर चलते हैं, और वे सुबह और शाम के वक्त अधिक चलते हैं। ऐसे प्रशिक्षण संस्थानों को सरकार हर दिन कुछ घंटों के लिए अपने क्लास रूम किराए पर देकर स्कूलों को अधिक आत्मनिर्भर बना सकती है। सरकार को यह भी चाहिए कि अपनी इमारतों के अहातों पर, वहां की दीवारों पर मुफ्त लिखे हुए बाजार के इश्तहारों की जगह अपने खुद के इश्तहार वहां पर लिखवाए ताकि सरकार का प्रचार का खर्च घट सके, और सामाजिक योगदान वाली, जनकल्याण वाली योजनाओं की जानकारी सरकारी दीवारों पर रहे। 
सरकारों और स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को कमर कसकर किफायत भी करनी चाहिए, और कमाई के रास्ते भी ढूंढने चाहिए। आज बहुत सी सरकारें और म्युनिसिपलें अपनी संपत्ति को बेचकर या उसके व्यावसायिक इस्तेमाल से कमाई करती हैं, और बिना कल्पनाशीलता के, कम कमाई पर ही थम जाती हैं। आज जब इस देश में ऐसे काबिल और हुनरमंद लोग हैं, प्रतिभाशाली मैनेजर हैं, जो कि दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों के मुखिया होकर अमरीका और दूसरी जगहों पर काम कर रहे हैं, तो भारत के ऐसे मैनेजमेंट विशेषज्ञों का इस्तेमाल इस देश की क्षमता और इस देश के ढांचे के बेहतर इस्तेमाल के लिए किया जाना चाहिए। 

विरोध में सरकारी सम्मान लौटाने से जुड़ी कुछ बातें

संपादकीय
10 अक्टूबर 2015
देश में बढ़ती हुई साम्प्रदायिकता और कट्टरता की हिंसा का विरोध करते हुए बहुत से साहित्यकार, कलाकार तरह-तरह के सम्मान और पुरस्कार लौटा रहे हैं। यह विरोध करने का एक बहुत ही शांतिप्रिय और लोकतांत्रिक तरीका है। ऐसे कई सम्मान केन्द्र सरकार की बनाई हुई साहित्य अकादमी के दिए हुए थे, और कई पुरस्कार किसी और सरकारी संस्था के बांटे हुए थे। पिछले कुछ दिनों से रोज ऐसे एक-दो नाम सामने आ रहे हैं, जो लोग जाहिर तौर पर लोकतांत्रिक सोच वाले हैं, और देश की आज की हालत को लेकर बड़े निराश हैं। देश की आज की हालत पर हम इसी जगह महीने भर में दस से अधिक बार लिख चुके हैं, इसलिए उस पहलू पर लिखने के बजाय आज हम इस पर लिख रहे हैं कि सम्मान और पुरस्कार देने में सरकार की क्या भूमिका होनी चाहिए, और सरकारी हाथों से लेने के वक्त लोगों को क्या सोचना चाहिए। 
सरकार की बनाई संस्थाओं में जितनी भी आजादी रहती होगी, उनमें कहीं न कहीं सरकारी दखल तो रहता ही है। और इसके अलावा जब सरकार सीधे-सीधे खुद ही राष्ट्रीय सम्मान देने लगती है, तो उसमें तो सीधे-सीधे सरकार की पसंद ही चलती है। पद्मश्री से लेकर भारतरत्न तक, और खेलों से लेकर फिल्मों के सम्मान तक, अनगिनत ऐसे सम्मान हैं जिनको लेकर विवाद चलते ही रहते हैं, और ये विवाद सिर्फ हिन्दुस्तान में, और सिर्फ सरकारी सम्मान को लेकर होते हों, ऐसा भी नहीं है। दुनिया में जो सबसे सम्मानित सम्मान हैं, उस नोबल पुरस्कार पर भी यह दाग लगा हुआ है कि उसने शांति पुरस्कार देने के मामले में गांधी को छोड़ दिया, और यह उसकी खुद की एक बड़ी नाकामयाबी रही है। 
खैर, हमारा हमेशा से यह मानना है कि सरकार को किसी भी तरह के सम्मान और पुरस्कार बांटने से परे रहना चाहिए। लोकतंत्र में जो सत्तारूढ़ पार्टियां धर्म और जाति को ध्यान में रखकर राजनीति करती हैं, जो क्षेत्रीयता के आधार पर समझौते करती हैं, जो चुनावों को देखते हुए किसी खास तबके को खुश करने की कोशिश में हमेशा ही लगी रहती हैं, वैसी पार्टियों के राज में चलने वाली सरकारों के हाथ किसी तरह के सम्मान और पुरस्कार बांटने के फैसले नहीं दिए जाने चाहिए। कई बार यह भी होता है कि सम्मान और पुरस्कार की लंबी लिस्ट में अपने कुछ चहेते लोगों के नाजायज सम्मान के लिए सरकारें या सरकारी संस्थाएं कुछ सचमुच ही सम्मानजनक लोगों का सम्मान कर देती हैं, ताकि उनके साथ कतार में अपने नालायकों को भी खड़ा किया जा सके। 
जिस तरह लोकतंत्र में सरकार से कुछ बातों से परे रहने की उम्मीद की जाती है, जिस तरह यह कहा जाता है कि सरकार को धर्म में दखल नहीं देना चाहिए, और धर्म के प्रति बराबरी का एक नजरिया भर रखना चाहिए, उसी तरह सरकार को सम्मान बांटने के अपने मोह से अपने को अलग भी रखना चाहिए। आज अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रूख और रवैये से खफा होकर देश भर से कई लोग अपने सम्मान लौटा रहे हैं, तो यह बात जाहिर है कि ये सम्मान किसी न किसी सरकारी संस्था, या सरकार से जुड़ी हुई संस्था के दिए हुए होंगे। अगर ऐसा नहीं होता तो केन्द्र सरकार के रूख से नाराज लोग भला क्यों अपने सम्मान लौटाते? आज मोदी से नाराज होकर कोई अपने नोबल पुरस्कार तो लौटाने से रहे, आज कैलाश सत्यार्थी अगर देश में भड़की हुई साम्प्रदायिकता से नाराज भी होंगे, तो भी वे मोदी को तो अपना नोबल पदक नहीं भेजेंगे। इसलिए इस मौके पर देश के उन तमाम लोगों को सरकारी सम्मानों और पुरस्कारों के बारे में एक बार फिर सोचना चाहिए कि क्या भारत जैसे लोकतंत्र में सरकारों को इतना बड़ा सम्मान देना ठीक है कि सरकार देश के प्रमुख लोगों का अपनी मर्जी से सम्मान कर सके? आज तो विरोध जाहिर करने के लिए लौटाने को लोगों के हाथ में सम्मान है, लेकिन हम एक ऐसी स्थिति को बेहतर समझेंगे जिसमें लोग सरकारी दखल वाले सम्मान लेना ही बंद कर दें। भारत मेें एक के बाद एक जिस तरह की खामियों वाली सरकारें राज करती हैं, और न सिर्फ देश पर बल्कि प्रदेशों में भी ऐसी ही बदहाली रहती है, उस तरह की सरकारों के तय किए हुए, या दखल वाले सम्मान न लेने की घोषणा लोगों को इस मौके पर करनी चाहिए। आज महज कोई एक सरकार या एक पार्टी ऐसी बुरी नहीं हैं, बल्कि बहुत सी सरकारें और बहुत सी पार्टियां ऐसी हैं कि जिनके हाथों, जिनके तय किए हुए कोई भी सम्मान लेना असल में सम्माननीय किसी भी व्यक्ति के लिए एक अपमान ही हो सकता है। आज इस मौके पर हौसलामंद लोगों को घोषणा आगे को लेकर करनी चाहिए, पाए हुए सम्मान को लौटाना या न लौटाना तो उनकी मर्जी की बात है।

नेपाल से तनाव भारत को बड़ा महंगा पड़ सकता है

संपादकीय
09 अक्टूबर 2015

नेपाल के साथ भारत का एक नया तनाव बड़ा खतरनाक साबित हो सकता है। भारत से नेपाल सड़क के रास्ते उसकी जरूरत का लगभग पूरा सामान जाता है, क्योंकि नेपाल की कोई समुद्री सीमा नहीं है। और अभी वहां भारत की तरफ से चल रही एक अघोषित सड़क नाकाबंदी के चलते नेपाल में पेट्रोलियम की कमी हो गई है, और वहां की जनता भारत के खिलाफ सड़कों पर नाराजगी के नारे लगाते प्रदर्शन कर रही है। भारत में नेपाल के राजदूत का यह कहना है कि अगर भारत इसी तरह नेपाल की नाकेबंदी करेगा तो नेपाल को मजबूर होकर किसी और तरफ देखना होगा। किसी और तरफ से मतलब साफ है कि नेपाल चीन पर निर्भर होगा, और हो सकता है कि चीन ऐसी ही किसी नौबत की राह तक रहा हो। आज भी चीन के साथ भारत का टकराव अरुणाचल प्रदेश में चल ही रहा है, और पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चीन की भारी हलचल भारत के लिए एक फौजी फिक्र का सामान है ही। ऐसे में नेपाल के साथ रिश्ते बिगाडऩे के पहले भारत को दुबारा सोचना चाहिए। अभी यह बात साफ तो नहीं है कि भारत नेपाल के नए बने संविधान में किस-किस तरह के फेरबदल की उम्मीद कर रहा था, और किस नाउम्मीदी के चलते उसने ये संबंध तनावपूर्ण होने दिए हैं, लेकिन यह सिलसिला समझदारी का नहीं लग रहा है। 
भारत के करीब का श्रीलंका वैसे भी अपनी जमीन पर आतंक को काबू करने के लिए चीन की मदद ले ही चुका है, और म्यांमार के साथ भारत के संबंध अपने आप में भी अच्छे नहीं है, और म्यांमार में लोकतंत्र भी नहीं है, ऐसे में किसी पड़ोसी लोकतंत्र को उस पर अधिक निर्भर नहीं रहना चाहिए। पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते पिछले कई बरसों में आज सबसे अधिक तनावपूर्ण लग रहे हैं, और उससे भारत की बातचीत भी बंद है। यह नौबत किसी भी देश के लिए ठीक इसलिए नहीं है कि दुनिया में आज कोई देश टापू की तरह नहीं जी सकता, और लोगों को अगल-बगल को देखते हुए अपनी फौजी तैयारी भी करनी पड़ती है, और देशों की आर्थिक नीतियां भी पड़ोसियों की जरूरतों और संभावनाओं के मुताबिक बदलती हैं। 
भारत आज वैसे भी मध्य-पूर्व के देशों को लेकर, तेल के कुओं वाले देशों को लेकर, फिलीस्तीन और इजराइल को लेकर, ईरान की बदलती हुई अंतरराष्ट्रीय स्थिति को लेकर एक किस्म की अस्थिरता की स्थिति से गुजर रहा है। पश्चिमी देशों की खाड़ी में दखल के चलते हुए वहां पर बहुत किस्म की नई घटनाएं हुई हैं, और भारत को उनके मुताबिक अपनी नीतियों को बदलना भी पड़ रहा है। ऐसे में पड़ोस के नेपाल को लेकर भारत का किसी भी तरह का गैरजरूरी तनाव बड़ा ही नाजायज है। अपनी किसी भी दूसरे पड़ोसी देश के मुकाबले भारत के संबंध नेपाल से सबसे अधिक जुड़े हुए हैं, और सरहद पर भी दोनों देशों में एक-दूसरे के लिए सबसे अधिक उदारता परंपरागत रूप से चली आ रही है। दोनों देशों के लोग एक-दूसरे की जमीन पर काम करते हैं, कारोबार करते हैं, और पीढिय़ों से बसे हुए हैं। ऐसे में अगर नेपाल में आज यह महसूस किया जा रहा है कि भारत उसकी आर्थिक नाकेबंदी कर रहा है, तो इस बारे मेें भारत के मुखिया को सार्वजनिक रूप से बयान देना चाहिए। ऐसी जो भी बातें तनाव खड़ा कर रही हैं, उनको खत्म करना चाहिए, और एक बड़े देश के नाते भारत को पड़ोस के छोटे देश की जरूरतों का अधिक ख्याल रखना चाहिए। आज अगर नेपाल में चीन की दखल बढ़ती है, तो उससे भारत के लिए एक नया फौजी खतरा खड़ा हो जाएगा, और यह आज की भारत की लीडरशिप के लिए एक नासमझी की बात होगी।