यह डिजिटल-हिंसक-इंडिया बनकर न रह जाए

संपादकीय
01 अक्टूबर 2015

अभी जब भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अमरीका में डिजिटल इंडिया को लेकर भाषण दे रहे थे, तो उनके कई आलोचकों ने यह सवाल उठाया कि जिस देश में पटेल-आरक्षण आंदोलन को लेकर गुजरात में, या कश्मीर में इंटरनेट पर कई-कई दिनों के लिए रोक लगाई जा रही है, वहां पर डिजिटल इंडिया का क्या मतलब है? दूसरी तरफ कल दिल्ली से लगे हुए उत्तरप्रदेश के गांव में जिस तरह वहां के लगभग इकलौते मुस्लिम परिवार के खिलाफ गोमांस खाने की हिंसा वाट्सऐप जैसे संदेश-एप्लीकेशन पर फैलाई गई, और जिसके चलते एक बेकसूर की हत्या हुई, वह खतरा भी सामने है। ऐसे में आज देश के सामने एक बड़ा सवाल यह है कि डिजिटल-युग ने जो एक बड़ा औजार लोगों को दिया है, उस औजार को हथियार बनाकर हिंसा और साम्प्रदायिकता भड़काने की नौबत में सरकार क्या करे? 
जब जुर्म होने लगते हैं, तो सरकार की जिम्मेदारी दो तरह की बनती है। एक तो यह कि समाज के लोगों का इतना राजनीतिक-शिक्षण हो कि वे अपराध के खतरे समझें, और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझें। और दूसरी तरफ जब ऐसे सामाजिक-अपराध होने लगते हैं, तो सरकार को इतनी कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए कि लोग ऐसे जुर्म करने से कतराएं। आज केन्द्र सरकार जब बहुत से मामलों में कई वेबसाइटों को बंद कर रही है, कुछ टीवी चैनलों को बंद किया गया है, तो ऐसी कोई वजह नहीं है कि देश भर में भड़काऊ-हिंसक साम्प्रदायिकता फैलाने वाले ट्विटर और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया खातों पर केन्द्र सरकार सीधे कार्रवाई न कर सके। ऐसे जुर्म इंटरनेट की वजह से किसी एक राज्य तक सीमित नहीं हैं, और वे देश भर में बिखरे हुए हैं। लोग हत्या करने के आव्हान पोस्ट कर रहे हैं, किसी एक समुदाय के लोगों को मार डालने की बातें लिख रहे हैं, और ऐसे संदेशों की पहुंच पूरा देश है, पूरी दुनिया है। इसलिए यह सोचना बेकार है कि कोई एक राज्य इन पर काम करे। हमारा यह मानना है कि आज वक्त आ गया है कि केन्द्र सरकार को इंटरनेट पर होने वाले ऐसे जुर्म पर राज्य सरकार की कार्रवाई से परे राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर सीधे खुद भी कार्रवाई करनी चाहिए। राज्यों का अपना अधिकार क्षेत्र है, लेकिन जब बात पूरे देश की हो जाती है तो राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का राष्ट्रीय स्तर पर इस्तेमाल केन्द्र सरकार को करना चाहिए, क्योंकि इंटरनेट पर नियंत्रण राज्य सरकार के दायरे से बाहर है। केन्द्र सरकार को तुरंत ही ऐसी हिंसक बातें लिखने वालों के कम्प्यूटर और उनके इंटरनेट-फोन कनेक्शन का पता लगाकर उनके खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए और कानून में यह इंतजाम भी करना चाहिए कि ऐसे लोग जुर्म साबित होने पर साल-छह महीने के लिए इंटरनेट का उपयोग न कर सकें। ऐसे लोगों पर बंदिश के लिए ऐसा कानून भी बनाना चाहिए कि ये लोग साल-छह महीने के लिए कोई सोशल मीडिया अकाऊंट भी न बना सकें। एक तरफ तो भारत का मौजूदा आईटी कानून जरूरत से अधिक कड़ा बताया जाता है, और दूसरी तरफ इसी कानून के चलते हुए सरकारी अनदेखी से हिंसा को लगातार बढ़ावा मिल रहा है। आज भारत के जो लोग सोशल मीडिया पर हैं, उनमें से लाखों लोग जेल में डाल देने के लायक हैं। लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जिम्मेदारी के बिना नहीं मिल जाती। जिन लोगों के मन में लोकतंत्र, इंसानियत, दूसरे धर्म, दूसरी जाति, और कमजोर तबकों के लिए सिर्फ हिंसा भरी हुई है, उन लोगों के फतवे सोशल मीडिया और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर रोके जाने चाहिए। कल ही हमने इसी जगह पर लिखा है कि किस तरह सत्ता से जुड़े हुए कई लोग और संगठन लगातार हिंसक और साम्प्रदायिक बातें कर रहे हैं, उसके साथ-साथ जब सोशल मीडिया पर हिंसा और साम्प्रदायिकता की ऐसी अनदेखी चल रही है, तो फिर नफरत जंगल की आग की तरह फैल रही है, बढ़ रही है।
भारत को तुरंत ही हालात सम्हालने की जरूरत है, वरना नफरत के जवाब में नफरत फैलते हुए पूरी दुनिया के इतिहास ने देखा है। भारत में भी एक सम्प्रदाय की नफरत के मुकाबले दूसरे सम्प्रदाय की नफरत ने हजारों जानें ली हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को डिजिटल इंडिया की बातों के साथ-साथ यह ध्यान रखना पड़ेगा कि यह डिजिटल-हिंसक-इंडिया बनकर न रह जाए। 

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