जो आज बिखरता लहू देख तालियां बजा रहे हैं, उनसे...

संपादकीय
12 अक्टूबर 2015
पाकिस्तान के एक पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी की लिखी एक किताब मुंबई में आज जारी हो रही है, और इसके आयोजक, भाजपा के लालकृष्ण अडवानी के एक सबसे करीबी रहे हुए सुधींद्र कुलकर्णी के चेहरे पर आज शिवसैनिकों ने कालिख पोत दी। शिवसेना ने इस पर गर्व जताया है, और सोशल मीडिया पर साम्प्रदायिक ताकतें त्यौहार मना रही हैं। सुधींद्र कुलकर्णी एक समय अडवानी के भाषण-लेखक माने जाते थे, लेकिन पिछले कुछ बरसों से वे लगातार समझदारी की बातें लिख रहे हैं, और कई देशों के कार्यक्रमों में बोलने के लिए जाते हैं। आज भारत और पाकिस्तान के बीच शिवसेना जैसी ताकतें जिस तरह का एक तनाव खड़ा करने की कोशिश कर रही हैं, उसके चलते अभी इसी हफ्ते मुंबई में पाकिस्तानी गायक गुलाम अली का कार्यक्रम रद्द हुआ, और अब किताब जारी करने के इस मौके पर अड़ंगा डाला जा रहा है। 
यह भारत की हवा में घुल रहे उसी जहर का हिस्सा है जो जगह-जगह विचारकों को, लेखकों और साहित्यकारों का कत्ल कर रहा है, और बाकी लोगों को एक घोषित या अघोषित धमकी भी दे रहा है। इसके खिलाफ देश भर से साहित्य अकादमी सम्मान लौटाए जा रहे हैं, और विचारवान लोग बयान भी दे रहे हैं। लेकिन मोदी सरकार इन तमाम बातों से बेखबर है, और विचारकों के असली कत्ल के मुकाबले इस देश में गाय को काटने की झूठी अफवाह को अधिक महत्व दिया जा रहा है, और पूरे देश में खड़े हो रहे इस अभूतपूर्व साम्प्रदायिक, हिंसक तनाव को बढ़ावा भी दिया जा रहा है। देश की कोई भी सरकार इन बातों से अनजान नहीं हो सकती, और जो मीडिया में रोजाना सौ-सौ बार दिख रहा है, वह केन्द्र सरकार को या कुछ राज्य सरकारों को न दिखे ऐसा हो नहीं सकता। लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के ऐसे भड़काए जा रहे हिंसक माहौल के बारे में एक भी शब्द कहने के बजाय महज यह कहकर पल्ला झाड़ लिया कि इस बारे में राष्ट्रपति जो कह रहे हैं उसको मानना चाहिए। भारत जैसा विशाल लोकतंत्र राष्ट्रपति को नहीं चुनता, यह देश और इसकी जनता प्रधानमंत्री को चुनती है, और राष्ट्रपति तो एक बहुत ही सीमित अधिकारों वाला समारोह के लिए रखा गया ओहदा है, जिसकी कही बातों का कोई वजन नहीं होता। रबर स्टैम्प कहे जाने वाले राष्ट्रपति के मुंह से निकली गई बहुत ही अमूर्त और परोक्ष बातों का हवाला देकर प्रधानमंत्री भी अगर चुप हैं, तो फिर इस लोकतंत्र में सरकार और संविधान मानो जनता पर मंडराते इस खतरे से अपनी जवाबदेही से भाग जा रहे हैं। अब ऐसा लगता है कि इस लोकतंत्र में महज अदालतें बची हैं, जहां पर ऐसी नौबत के खिलाफ जाकर एक कोशिश की जा सकती है। 
पाकिस्तान के एक पूर्व मंत्री की लिखी किताब से सहमत या असहमत होने के बहुत से मंच हो सकते हैं, और आज तो सोशल मीडिया और इंटरनेट के चलते हुए हर किस्म के मुजरिम और साम्प्रदायिक के लिए भी अपार जगह पड़ी हुई है। ऐसे में एक किताब का विरोध करने के लिए समारोह के आयोजक का मुंह काला करना, ऐसा करने वालों के अपने मुंह की बेइज्जती के अलावा और कुछ नहीं है। नफरत में बेवकूफों को एक करने की अपार ताकत होती है, इसलिए आज हिन्दुस्तान के वे सारे बेवकूफ जो हिंसा और साम्प्रदायिकता में भरोसा रखते हैं, वे शिवसेना की इस हरकत की तारीफ में, और आयोजक सुधींद्र कुलकर्णी को गालियां देते हुए जुट गए हैं। यह देश में एक बहुत खतरनाक माहौल है, और यह लोकतंत्र का एक बहुत बड़ा नुकसान है। यह बात सिर्फ पाकिस्तान का विरोध करने का नहीं है, यह बात भारत के भीतर भी विचारों की आजादी का विरोध करने की है, और यह विरोध भी मामूली नहीं है, यह विरोध सीधे कत्ल कर रहा है। इस लोकतंत्र में अब एक बेकसूर इंसान की जिंदगी के मायने एक जानवर की हत्या की झूठी खबर से भी कम रह गए हैं। और आज जिन लोगों को यह हिंसा अच्छी लग रही है, वे इस बात को समझ लें कि जब लोकतंत्र खत्म होता है, और हिंसातंत्र कायम हो जाता है, तो कटने वाला अगला गला उनका भी हो सकता है जो कि आज बिखरता लहू देखकर तालियां बजा रहे हैं। इस देश में यह तालिबानी सोच बहुत लंबा नुकसान करने जा रही है, और मूर्खों की भीड़ को अक्ल वापिस देना एक पहाड़ी चढ़ाई जैसा मुश्किल काम होगा। 

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