सरकार और समाज के काम जनभागीदारी से आसान और मुमकिन हो सकते हैं

13 अक्टूबर 2015
संपादकीय

छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ महीनों में कई बार रायपुर में लोगों ने अफसरों को ले जाकर दसियों लाख का गुटखा पकड़वाया। सेहत के लिए जाहिर तौर पर नुकसानदेह गुटखा को राज्य सरकार ने काफी समय पहले से प्रतिबंधित कर रखा है, लेकिन लोगों के बीच इसका चलन खत्म नहीं हुआ, और सरकारी काबू न रहने से यह खुलेआम हर शहर, हर मुहल्ले-बस्ती में आसानी से मिल जाता है। कानूनी रोक रहने से अब बेचने वालों को इसके दाम बढ़ाने का बहाना और मिल गया है, और ऐसी बाकी बेअसर सरकारी रोक की तरह गुटखा का कारोबार भी रोक के बावजूद फल-फूल रहा है, और छत्तीसगढ़ के लोगों को कैंसर के हवाले कर रहा है। 
बाकी लोगों सहित हमारा भी यह मानना है कि सरकारी अनदेखी के बिना, या सरकार के कुछ विभागों की अघोषित भागीदारी के बिना इस तरह के सार्वजनिक जुर्म नहीं हो सकते। पूरे प्रदेश में हर सड़क के किनारे अनगिनत होटल-ढाबे, ठेले और दुकानों पर केंद्र सरकार के रियायती घरेलू गैस सिलेंडरों से चूल्हे जलते दिखते हैं, और कारखानों में सरकार की इस रियायत का बेजा इस्तेमाल भी दर्जनों बार पकड़ाया जा चुका है। इसके बावजूद इनमें से किसी के खिलाफ ऐसी कड़ी कार्रवाई नहीं हुई कि लोग केंद्र सरकार की दी हुई इस रियायत की ऐसी डकैती से बाज आएं। ऐसी ही अनदेखी राज्य सरकार की बिजली की सार्वजनिक चोरी की होती है। धार्मिक और सामाजिक आयोजनों के लिए खुलकर चोरी की बिजली से दूर-दूर तक रौशनी बिखेर दी जाती है, और सरकारी अमला इसे आमतौर पर अनदेखा करते चलता है।
सरकार के नियमों पर अगर अमल नहीं हो सकता, तो ऐसे नियमों के खिलाफ लोगों के मन में हिकारत भी हो जाती है, और ऐसी बेअसर रोक के खिलाफ लोग और अधिक उत्साह और हौसले से जुर्म करने लगते हैं। यह बात सही है कि सरकार के पास इतना अमला नहीं है कि हर पानठेले पर जाकर गुटखा की जांच कर सके, लेकिन जब कड़ी कार्रवाई होने लगती है, तो अपने-आप जुर्म घटने लगते हैं। और जब सरकार लापरवाही से अनदेखी करने लगती है, तो लोग रियायती रसोई गैस को कारों में भी भरने के लिए पंप लगाकर कारोबार करने लगते हैं। 
राज्य सरकार को जनता से भी जानकारी की मदद मांगनी चाहिए। रायपुर में पिछले महीनों में जितनी भी बार गुटखा पकड़ाया है, हर बार गैरसरकारी नौजवानों की मदद से यह हुआ है। जनता से अधिक जानकारी और कहीं से नहीं मिल सकती है। अब तो हर किसी के जेब में फोन का कैमरा रहता है, और सरकार को लोगों का उत्साह बढ़ाना चाहिए। जनभागीदारी एक बड़ा शब्द होता है, सरकार और समाज के तमाम काम जनभागीदारी से आसान और मुमकिन हो सकते हैं। जब लोग जिम्मेदार बनते हैं, तो वे न सिर्फ जुर्म रोकने की जिम्मेदारी निभाते हैं, बल्कि कई तरह के सामाजिक योगदान में भी हिस्सेदार होते हैं। प्रदेश की जनता की सोच को बढ़ावा देकर सरकार अपने काम को आसान भी कर सकती है, और वाहवाही भी पा सकती है। 

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