छत्तीसगढ़ में प्रशासनिक सुधार की जरूरत, और मौजूदा सोच

संपादकीय
05 अक्टूबर 2015

छत्तीसगढ़ में पंचायतों के हजारों डाटा एंट्री ऑपरेटरों की हड़ताल चल रही है, इसके पहले पिछले बरस लाख-दो लाख शिक्षाकर्मियों की हड़ताल भी हो चुकी है। समय-समय पर कई विभागों के अस्थायी या स्थायी कर्मचारियों की हड़ताल सिर्फ इसी राज्य में नहीं होती है, बल्कि हर राज्य में किसी न किसी तबके को सड़कों पर उतरना पड़ता है। इस बीच आज एक दूसरा विवाद भी चल रहा है कि छत्तीसगढ़ के बस्तर जैसे आदिवासी इलाके में स्कूलों में कुछ विषय पढ़ाने के लिए हजारों शिक्षकों को राज्य के बाहर से लाया जा रहा है, ताकि वहां खाली पड़े हुए पद भरे जा सकें और बच्चों को पढ़ाई नसीब हो। यह एक मुद्दा कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मुठभेड़ का मामला भी बन गया है क्योंकि कांग्रेस इसे राज्य के बेरोजगारों पर चोट करना मान रही है, और इसे लेकर कांग्रेस का आंदोलन चल रहा है। 
लेकिन राज्य सरकार के जिम्मे की बात अगर देखें, तो कुछ मोर्चों पर सरकार की कमी और खामी दिखाई पड़ती है। किसी भी सरकार के पास तात्कालिक और दीर्घकालीन दोनों तरह की सोच और योजनाएं रहनी चाहिए। यहां पर मौजूदा मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह सत्ता में ग्यारह बरस पूरे कर चुके हैं, और बारहवें बरस में अगर यह स्थिति है कि किसी विषय को पढ़ाने वाले लोग नहीं हैं, या किसी विभाग में नियमित कर्मचारी नहीं हैं, और बरस-दर-बरस संविदा कर्मचारियों से काम चलाया जा रहा है, तो यह सरकार के हिस्से की एक बड़ी कमजोरी है। और यह बात सिर्फ हड़ताल पर उतरे हुए कर्मचारियों की नहीं हैं, सरकार के बहुत से विभागों में हालत यह है कि जिम्मेदार अधिकारियों के ओहदों पर भी बरसों से नियमित नियुक्तियां नहीं हुई हैं, विभाग के भीतर पदोन्नति नहीं हुई हैं, और लोगों को अस्थायी रूप से किसी पद का काम दिया जा रहा है, और कभी भी हटा दिए जाने की आशंका उनके सिर पर रहती है, और इसी के चलते उनसे गलत काम भी आसानी से करवाए जाते हैं। 
अभी सरकार ने एक प्रशासनिक सुधार आयोग जिंदा करके एक रिटायर्ड मुख्य सचिव को उसका अध्यक्ष बनाया है। लेकिन जो लोग इसी राज्य में बरसों तक, या राज्य बनने के समय से लेकर अब तक लगातार सबसे बड़े ओहदों पर रहे हैं, वे सरकार को या राज्य को अब नया क्या दे सकते हैं? अगर रिटायर्ड अफसरों को किसी बेहतर ढांचे की कल्पना हो सकती है, तो इसका इस्तेमाल वे अपने कामकाज के बरसों में भी कर सकते थे। आज सरकार को एक बाहरी सोच की जरूरत है, एक बाहरी मूल्यांकन की जरूरत है, और एक बिल्कुल ही क्रांतिकारी फेरबदल के बिना यह ढांचा असरदार नहीं हो सकता। राज्य में अलग-अलग विभागों में लाखों कर्मचारी बिना किसी सुरक्षित भविष्य के कामचलाऊ तरीके से लगे हुए हैं, और राज्य को उसका फायदा भी ठीक से नहीं मिल पाता है। राज्य सरकार को अपने ढांचे और अपनी सेवाओं के हर स्तर पर कामचलाऊ इंतजाम को खत्म करना चाहिए। सरकारी जुबान में जिसे तदर्थ व्यवस्था कहा जाता है, वह भ्रष्टाचार को बढ़ावा देती है, और जहां-जहां नियमित इंतजाम हो सकता है, वहां पर भी राजनीतिक ताकतें ढांचे को मजबूत और स्थायी नहीं होने देतीं, स्थिरता को पसंद नहीं करतीं। 
छत्तीसगढ़ अब नया राज्य होने की रियायतों का हकदार नहीं रह गया है। इसे बने हुए डेढ़ दशक गुजर चुका है, और नया राज्य होने के नाते इसे एक नया ढांचा बनाने का फायदा भी मिल चुका है। अब सरकार को प्रशासनिक सुधार की कागजी कार्रवाई करने के बजाय जनता के बीच के जानकार लोगों, राजनीति से जुड़े लोगों, और छत्तीसगढ़ से बेहतर प्रशासन वाले राज्यों के जानकार लोगों की राय लेनी चाहिए, वरना यह राज्य विकास की अपनी संभावनाओं को नहीं छू पाएगा, आज भी उनसे पीछे चल रहा है। प्रशासनिक सुधार के नाम पर पुराने नौकरशाहों से राज्य को कुछ नहीं मिल सकता, लेकिन सरकार में दिक्कत यह है कि उनसे परे सोचना आसान नहीं रहता। सरकारी सोच घूम-फिरकर उन्हीं तक सीमित रह जाती है। यह सिलसिला बदलना चाहिए। 

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