नफरती-हिंसक बातों के जवाब में भलमनसाहत की जरूरत

संपादकीय
17 अक्टूबर 2015

कुछ दिन पहले मुम्बई की एक खबर थी कि किस तरह एक पाकिस्तानी बच्ची के इलाज के लिए वहां के लोगों ने पैसे इक_े किए, और उसका ऑपरेशन करवाया, ठीक होकर वह पाकिस्तान लौटी। अभी पाकिस्तान से लेकर भारत तक के मीडिया पर पाकिस्तान में फंसी हुई एक भारतीय हिन्दू लड़की की तस्वीरें और कहानी छाए हुए हैं कि किस तरह उसे भारत लाने की, उसके परिवार की शिनाख्त की कोशिश चल रही है। पाकिस्तान में उसे एक मुस्लिम समाज सेवक ने अपने परिवार में रखा हुआ है और वहां वह हिन्दू धर्म का अपना पूजा-पाठ अपने हिसाब से कर रही है। हाल ही में आई एक हिन्दी फिल्म बजरंगी भाईजान की कहानी देखें तो एक खालिस हिन्दू-हिन्दुस्तानी एक मुस्लिम-पाकिस्तानी बच्ची को उसके घर पहुंचाने के लिए अपनी जान खतरे में डालकर सरहद पार करके वहां जाता है। असल जिंदगी को देखें तो सरहद के दोनों तरफ ऐसे बहुत से लोग मिलते हैं जो एक-दूसरे को बचाने के लिए खासी मेहनत करते हैं, एक-दूसरे को अपने घरों और दिलों में जगह देते हैं। 
लेकिन दूसरी तरफ सरहद के दोनों तरफ ऐसे सामाजिक और राजनीतिक नेता हैं, ऐसे धार्मिक नेता हैं, और फौजी अफसर हैं जो कि भड़काने और नफरत की बातों में लगे रहते हैं। और यह भड़काना सिर्फ एक-दूसरे देश के खिलाफ नहीं हैं, यह तो अपने देश के भीतर ही दूसरे धर्म के लोगों, अपने ही धर्म के दूसरे समुदायों के लोगों के खिलाफ हिंसा के लिए भड़काने की बात है। पाकिस्तान में कुछ मुस्लिम संगठन ईसाईयों को तो मार ही रहे हैं, लेकिन वे इस्लाम को मानने वाले कुछ दूसरे मुस्लिम सम्प्रदायों को भी मार रहे हैं। हिन्दुस्तान में कुछ हिन्दू मुस्लिमों के खिलाफ खानपान को लेकर हिंसक और देशद्रोह के बयान दे रहे हैं, उनको पाकिस्तान जाने को कह रहे हैं, लेकिन ऐसे हिंसक लोग हिन्दू धर्म के भी अनगिनत लोगों के खानपान के खिलाफ लगे हुए हैं, और गाय को मुद्दा बनाकर इंसानों को मार रहे हैं। एक तरफ तो हिन्दू समाज के लोग अपने लोगों की आबादी अधिक बताने के लिए दलितों और आदिवासियों को हिन्दू बताते थकते नहीं हैं, लेकिन दलित आदिवासी लोगों को उनके खानपान के तौर-तरीकों से दूर करने के काम में भी ऐसे हिन्दू लगे हुए हैं जो कि एक बहुत छोटे, सवर्ण कहे जाने वाले, शुद्धतावादी तबके के हैं, और वे अपनी एक संस्कृति को पूरे देश की संस्कृति बनाने के लिए असीमित मनचाही हिंसा पर आमादा हैं। 
सदियों से इस देश में तरह-तरह की संस्कृतियां साथ-साथ रहते आई हैं। और लोकतंत्र तो यहां पौन सदी के भीतर ही आया है। अब लोकतंत्र के पहले के दिनों में भी जो आजादी भारत के अलग-अलग तबकों को थी, लोगों का एक-दूसरे के लिए जो बर्दाश्त था, कबीर के समय से जो प्रगतिशील सोच चली आ रही थी, उन सबको आज लोकतंत्र के इस दौर में भी कुचलकर खत्म किया जा रहा है। आज भी आम जनता को अगर बिना उकसावे और भड़कावे के जीने दिया जाए तो भारत और पाकिस्तान के लोग एक-दूसरे के साथ आवाजाही और खेलकूद, फिल्म और संगीत,  साहित्य और कला, सभी में भागीदारी के लिए उत्साही हैं। दोनों तरफ के इंसान एक-दूसरे के काम आने को खड़े हैं। दोनों ही देशों में आम लोग अपने-अपने लोगों से बिना भेदभाव मोहब्बत से साथ जीने को भी तैयार हैं। लेकिन जिन लोगों का धंधा नफरत से चलता है, उनको भी अपनी दुकान चलानी है। और इसलिए वे पहले दूसरे देश के खिलाफ हिंसा का फतवा देते हैं, फिर अपने ही देश में दूसरे धर्म के खिलाफ जान लेना शुरू करते हैं, इसके बाद अपने ही धर्म के दूसरे तौर-तरीकों के, दूसरे रीति-रिवाजों के लोगों को मारना शुरू करते हैं, और फिर जब यह भी या तो पूरा हो जाता है, या मुमकिन नहीं होता है, तो वे अपने ही बच्चों को प्रेम विवाह करने के जुर्म में मारना शुरू करते हैं। 
जो भी यह सोचते हैं कि मोहब्बत या नफरत किसी इंसान में टुकड़े-टुकड़े में आ सकती हैं, वे गलत सोचते हैं। जिनका मिजाज मोहब्बत का होता है, वे एक बच्ची को पाकिस्तान पहुंचाने भी अपनी जान-जोखिम में डालकर जा सकते हैं, या पाकिस्तान में अपने मुस्लिम घर में एक हिन्दू बच्ची को मंदिर सजाकर उसकी पूजा के साथ उसे बेटी बनाकर रख सकते हैं। दूसरी तरफ जो लोग नफरत पर जिंदा रहते हैं, वे जब तक किसी से नफरत न कर लें, तब तक वे दोपहर का खाना नहीं खा पाते, और रात को चैन से सो नहीं पाते। ये दोनों देश तो एक मिसाल हैं, दुनिया में जहां-जहां लोग नफरत कर रहे हैं, वे अपनी आने वाली पीढ़ी के लिए नफरत के पेड़ लगाकर जा रहे हैं। ऐसा करना कुदरत के पेड़ों की मिसाल के लायक तो नहीं है, लेकिन नफरती लोग अपनी आने वाली पीढ़ी को हिंसा की वह विरासत दे रहे हैं जिससे उनकी ही आने वाली पीढिय़ां जल मरेंगी। नफरत की ऐसी लपटों के बीच अमन-पसंद प्रेमी लोगों को दूसरे इंसानों से प्रेम को बढ़ाना होगा, क्योंकि नफरती-हिंसा चाहे कितनी अधिक दिखती हो, अधिक लोग तो अमन-पसंद ही हैं। 
नफरत के हर राजनीतिक या साम्प्रदायिक, धार्मिक या फौजी बयान के जवाब में लोगों को भली बातों को बढ़ावा देना होगा, और ऐसा करने पर आखिरकार जीत भलमनसाहत की होगी। 
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