देश में आज की जहरीली हवा और उसके खतरे

20 अक्टूबर 2015
संपादकीय

देश भर में नकारात्मक बातों का एक सैलाब सा आया हुआ है। बलात्कार की खबरों से मीडिया भरा हुआ है, और जो लोग अब तक बलात्कार नहीं कर पाए हैं, और ताकत की जगहों पर बैठे हैं, वे जुबानी बलात्कार करने में लगे हुए हैं। शायद ही कोई पार्टी ऐसी बची हो, जिसके लोगों ने बलात्कार को लेकर अपनी हिंसक सोच का हमला महिलाओं पर न किया हो। लेकिन इससे परे देश में आज साम्प्रदायिकता को लेकर, धार्मिक भेदभाव को लेकर, किसी के देशभक्त होने, या गद्दार होने को लेकर, देश में रहने के हक रहने और न रहने को लेकर, खान-पान को लेकर, और किसी पाकिस्तानी के हिंदुस्तान आने, न आने को लेकर, तरह-तरह की हिंसा हो रही है, और ऐसा लग रहा है कि देश एकाएक कई सदी पीछे धकेल दिया गया है। किताबों पर रोक की बात हो रही है, और लेखकों को, विचारकों को गोलियां मारी जा रही है। गांधी का नाम लेकर चुनाव जीत लेने के बाद अब गोडसे को स्थापित करने, महिमामंडित करने का अभियान चल रहा है, और गाय की आड़ लेकर लोगों को पाकिस्तान धकेलने की कोशिश चल रही है।
दुनिया का इतिहास गवाह है कि जब भी कोई देश इस किस्म की गैरजरूरी हिंसा या अय्याशी में डूब जाता है, वह विदेशी हमलों के लिए तैयार सामान रहता है। आज चूंकि हिंदुस्तान की सरहद से हमला आसान नहीं है, इसलिए हमला इस देश की अर्थव्यवस्था पर होगा, यहां की उत्पादकता पर होगा, यहां की संभावनाओं पर होगा, यहां के होनहार-हुनरमंद दिमागों पर होगा, यहां के कारोबार-कारखानों पर होगा। आज अगर मोदी सरकार और उसके साथी-समर्थक यह मानते हैं कि गाय के नाम को लेकर देश भर में फैलाई जा रही हिंसा से इस देश में आने वाले पूंजीनिवेश पर फर्क नहीं पड़ेगा, तो वे गलती पर हैं। अगर उनको लगता है कि इस किस्म की साम्प्रदायिक धर्मांन्धता को बढ़ाते चलने के बाद भी इस देश के काबिल नौजवान दिमाग यहां बने रहेंगे, तो यह उनकी चूक होगी। देश के ऐसे माहौल के बीच अधिक से अधिक लोग बाहर जाने के बारे में सोचेंगे क्योंकि वहां उनकी खूबियों की इज्जत भी अधिक होगी, और उनको आगे बढऩे की संभावनाएं भी ऐसे हिंदुस्तान के मुकाबले बहुत अधिक मिलेंगी।
इतिहास गवाह है कि एक वक्त जब भारत के राजा-महाराजा रास-रंग में डूबे हुए अय्याशी में लगे हुए थे, तब विदेशी हमलावरों को भारत में घुसने का मौका मिला था। जब कभी कोई देश अपनी बुनियादी जरूरतों को छोड़कर गैरजरूरी मुद्दों में उलझ जाता है, तो तमाम जुमलों और नारों के बावजूद वह डूबने लगता है। आज हिंदुस्तान की हालत कुछ वैसी ही दिख रही है। आज अगर इस देश में जनता की बेचैनी आग की तरह भभक नहीं रही है, तो यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल सस्ता होने की वजह से है। वरना खाने-पीने की महंगाई ने कोई कसर छोड़ी नहीं है। आज देश की तात्कालिक और दीर्घकालीन जरूरतों को छोड़कर जिस तरह के भावनात्मक-भड़कावे को देश की मूल जरूरत बनाने की कोशिश चल रही है, उससे हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र तो नहीं बन पाएगा, एक खोखला राष्ट्र जरूर बन जाएगा। पिछली यूपीए सरकार को कोस-कोसकर पिछला आम चुनाव जीतना तो आसान था, अब मोदी सरकार के लिए, एनडीए के लिए यह आसान नहीं होगा कि देश में लगातार लगाई जा रही, और फैलाई जा रही आग से राख हो रही संभावनाओं पर अगला चुनाव लड़ा जा सके। हम न सिर्फ देश की बर्बादी की बात कर रहे हैं, बल्कि हम अगले चुनाव में मोदी और उनकी पार्टी की संभावनाओं की लगातार बढ़ रही बर्बादी की बात भी कर रहे हैं। आज जो लोग इस देश को साम्प्रदायिकता में झोंक रहे हैं, वे लोग अगले चुनाव के नतीजे अपने माथे पर लेने के लिए सामने नहीं रहेंगे, उस दिन वे अपने-आपको गैरराजनीतिक साबित कर देंगे। इसलिए चाहे देश, लोकतंत्र, और इंसानियत के हित में न सही, अपने-आपके हित में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इन खतरों को समझना चाहिए। किसी देश की हवा में इतना जहर फैला हो, तो वहां पर नफरत के अलावा और कोई चीज नहीं बन सकती। 

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