देश को धार्मिक भड़कावे से बचकर रहने की जरूरत

संपादकीय
21 अक्टूबर 2015
पंजाब में बरसों बाद एक ऐसा तनाव खड़ा हुआ है कि राज्य की पुलिस के अलावा सीमा सुरक्षा बल को वहां हिंसक हालात काबू करने के लिए तैनात किया गया है। सिखों के धर्मग्रंथ, गुरूग्रंथ साहब के कुछ पन्ने वहां बिखरे मिले, और इस मामले में संवेदनशील इस समुदाय की भावनाएं भड़क उठीं। अब तक यह जाहिर नहीं है कि यह काम किसने किया है, लेकिन पंजाब पुलिस ने दो सिखों को ही इस सिलसिले में गिरफ्तार किया है और ऐसा शक जताया जा रहा है कि भारत के बाहर से कुछ लोगों ने यहां तनाव फैलाने के लिए ऐसा करवाया है। पुलिस ने इस बारे में इन नौजवानों की विदेशों से हुई टेलीफोन बातचीत भी टैप की है। 
यह पहला मौका नहीं है कि भारत में धार्मिक ग्रंथ को लेकर इस तरह का तनाव हुआ हो। इसके पहले भी अलग-अलग धर्मों के ग्रंथों को लेकर, उनके अपमान को लेकर, कहीं पर किसी की प्रतिमा को लेकर, कहीं तस्वीर को लेकर तनाव होते आए हैं। इसी तरह किसी धर्मस्थल पर किसी जानवर के गोश्त को फेंककर, तो कहीं किसी दूसरे धर्म के धर्मस्थल पर किसी दूसरे जानवर के गोश्त को फेंककर तनाव खड़ा करने का काम पिछले महीनों में ही उत्तर भारत में कई जगह हो चुका है। और भारत के साम्प्रदायिक तनाव के इतिहास में ऐसे बहुत से मामले दर्ज हैं। अभी कुछ दिन पहले ही दक्षिण भारत से ऐसी तस्वीरें आई थीं कि वहां दलितों के मसीहा अंबेडकर की प्रतिमाओं को दलित-विरोधियों से बचाने के लिए उनके आसपास लोहे के जंगले बनाकर उनको बचाया जा रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि कुछ शरारती लोग अगर किसी धर्म के लोगों को भड़काने की नीयत से इस तरह का काम करते हैं, तो और उनका मकसद पूरा हो जाता है, लोग भड़क जाते हैं, सड़कों पर उतर आते हैं, और शहरों या प्रदेश का कामकाज ठप्प हो जाता है, हिंसा और तोडफ़ोड़ में नुकसान भी होता है जिंदगी भी अस्त-व्यस्त होती है, तो ऐसी शरारत करने के लिए दुनिया की कई ताकतें आमादा रह सकती हैं। भारत के अलग-अलग धर्मों के लोगों को भड़काने का काम अधिक मुश्किल नहीं है। आज देश में धार्मिक तनाव कुछ इस तरह का है कि हर धर्म मानो बारूद के ढेर पर बैठा हुआ है, और उसके लोग भड़कने के लिए एकदम तैयार हैं। यह नौबत देश के लिए बहुत खतरनाक है। किसी भी धर्म के लोगों को उनके धर्म का अपमान होने पर सरकार को कार्रवाई का मौका देना चाहिए। जब भीड़ के दबाव के तहत कोई कार्रवाई होती है, तो एक बहुत बड़ा खतरा यह रहता है कि किसी बेकसूर को फांसकर पुलिस तनाव को खत्म कर दे, और असली मुजरिम बचे ही रह जाएं। यह नौबत इसलिए खतरनाक है क्योंकि बच गए मुजरिम फिर ऐसी हरकत कर सकते हैं। इसलिए हर धर्म के प्रमुख लोगों को, उनके इलाके के राजनीतिक और सामाजिक नेताओं को जनता की भावनाओं के साथ इतना तालमेल बनाकर रखना चाहिए कि किसी छुपे हुए बेनाम, बेचेहरा मुजरिम की बदमाशी पर भावनाएं ऐसी न भड़कें कि उनसे किसी का भला न हो सके। 
भारत जैसा विशाल देश, इतने सारे धर्म, और हर मोड़ पर कोई न कोई धर्मस्थल, ऐसे में भड़काने के लिए, आतंक फैलाने के लिए, लोगों को एक-दूसरे से टकराने के लिए देश के बाहर की ताकतें, और देश के भीतर की भी ताकतें बड़ी आसानी से ऐसी शरारत कर सकती हैं। देश के लोगों में न्याय की भावना, एक वैज्ञानिक सोच, लोकतंत्र के प्रति सम्मान, और सरकार के प्रति एक तर्कसंगत नजरिया होना चाहिए। भावनाओं का भड़कना तो बहुत आसान रहता है, लेकिन भड़की हुई भावनाओं को काबू में करना बहुत मुश्किल रहता है और कई बार नुकसान, बड़ा नुकसान हो जाने बाद ही किसी तरह से भावनाएं शांत हो पाती हैं। देश में और प्रदेश में जब ऐसे नेता रहते हैं कि जिनके ऊपर जनता को यह भरोसा रहता है कि उनकी नजरों में सारे धर्म बराबर हैं, और उनकी सरकार के चलते किसी धर्म के साथ ज्यादती नहीं होगी, तब भी तनाव अपने आप कुछ कम होते हैं। लेकिन यह सिलसिला खतरनाक है। हमारा मानना है कि कोई भी धर्म हो, उसका अपमान करने वाले मुजरिमों को एक जांच के बाद ही पकड़ा जा सकता है, उसके पहले सड़कों पर तनाव से सबका नुकसान होता है। इससे बचा जाना चाहिए। पंजाब में तो आज सरकार ही अकाली दल की है जो कि सिखों की राजनीति ही करती है। दूसरी तरफ केन्द्र में सरकार जिस एनडीए गठबंधन की है, उसमें भी अकाली दल हिस्सेदार है। इसलिए पंजाब में आज हुई किसी भी वारदात की जांच और उस पर कार्रवाई में केन्द्र और राज्य सरकारों से किसी कमी का कोई खतरा नहीं है। ऐसे में वहां की जनता को, और बाकी देश में भी सिखों को शांत रहकर इन दोनों सरकारों को कार्रवाई करने का मौका देना चाहिए, वरना दबाव में झूठे नतीजे सामने आ सकते हैं। 

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