गंदी और हिंसक हरकतों के बाद धर्म और वर्दी की आड़

संपादकीय
23 अक्टूबर 2015


फिल्मी गायक अभिजीत पिछले कुछ महीनों में बहुत ही गंदे और हिंसक, साम्प्रदायिक और भड़काऊ बयान देते आए हैं। अब उनके खिलाफ उनके ही आयोजित एक दुर्गोत्सव में एक महिला ने उनके खिलाफ छेडख़ानी की रिपोर्ट लिखाई है। इस पर अभिजीत ने बयान दिया है कि वे हिन्दू हैं, इसलिए उनके खिलाफ साजिश की जा रही है। हूबहू यही बयान एक वक्त बापू कहे जाने वाले, और आसाराम नाम से कुख्यात, बलात्कार के मामले में बरसों से विचाराधीन कैदी बने हुए आसाराम ने कही थी, और उनके कई समर्थकों ने भी दलील दी थी कि यह हिन्दू धर्मगुरुओं के खिलाफ साजिश का हिस्सा है। लोगों को याद होगा कि बरसों पहले जब क्रिकेट खिलाड़ी अजहरुद्दीन को मैच फिक्सिंग के मामले में पकड़ा गया था, तो उन्होंने अपने मुस्लिम होने की आड़ ले ली थी, और कहा था कि अल्पसंख्यक होने के कारण यह उनके खिलाफ साजिश है। कल ही केन्द्रीय मंत्री वी.के. सिंह ने दलित बच्चों को जलाकर मारने के संदर्भ में कुत्ते को मारने की मिसाल दी, और इस पर जब चारों तरफ से उन पर थूकना शुरू हुआ तो उन्होंने भागकर अपनी फौजी वर्दी की आड़ ले ली कि वे तो फौज में रहे हुए हैं जहां पर जात-पात का कोई काम नहीं रहता। 
मुजरिमों के साथ दिक्कत यह है कि जब वे किसी जाति या धर्म, पार्टी या संगठन के प्रतिनिधि रहे बिना भी निजी स्तर पर कोई जुर्म करते हैं, तो तोहमत लगने पर, फंसने पर तुरंत ही कभी अपने आदिवासी होने, कभी अपने कांग्रेसी या भाजपाई होने, कभी दलित या मुसलमान होने, कभी साधु-संत या पिछड़े वर्ग का होने की आड़ ले लेते हैं। अगर ऐसा जुर्म वे अपने तबके के लिए हो रहे किसी आंदोलन के दौरान करते, तो भी समझ आता। इसी देश की इसी राजधानी दिल्ली में हफ्तों तक वन रैंक वन पेंशन का आंदोलन चला, तब वी.के. सिंह का मुंह बंद ही मिला। उस वक्त उनको अपने भूतपूर्व सैनिक होने की जिम्मेदारी याद नहीं आई, लेकिन आज जब उनकी हिंसक बकवास पर चारों तरफ से धिक्कार बरसने लगी, तो वे अपने फौजी दिनों की आड़ में जाकर छुप गए। 
इस तरह की रियायत किसी बच्चे को, किसी अनजान को, किसी कमसमझ को, या किसी मानसिक विचलित को तो दी जा सकती है, लेकिन इनमें से किसी भी तबके की रियायत पाने वाले को ताकत और अहमियत के किसी ओहदे पर रहने का क्या हक है? इसके पहले भी जनरल वी.के. सिंह प्रेस के लोगों को वेश्याओं के बराबर गिनते हुए उनको प्रेस्टीट्यूट कह चुके हैं, और भी समय-समय पर बहुत सी गंदी बातें उन्होंने कही हैं। दिक्कत यह है कि जो सबसे दुष्ट हैं, और जो सबसे भ्रष्ट हैं, वे दौड़-दौड़कर अपने कुसूर छुपाने के लिए राष्ट्र के पीछे जाकर छुप जाते हैं। लेकिन भारत में आज एक बात अच्छी है कि छोटे से लेकर बड़े तक, मीडिया का एक खासा बड़ा हिस्सा इस किस्म की मक्कारी को खुलकर उजागर कर रहा है। और फिर औपचारिक मीडिया से परे सोशल मीडिया पर आम लोग भी खुलकर सभी तरह की बातें लिख रहे हैं। उनमें भड़काऊ, हिंसक, और साम्प्रदायिक बातें भी हों, लेकिन उनमें ऐसी बातों के खिलाफ लिखने वाले लोग भी कम नहीं हैं। 
हैरानी की बात यह है कि आज मोदी सरकार और देश में सत्तारूढ़ एनडीए गठबंधन देश की नब्ज की तरफ से पूरी तरह से बेपरवाह है। पिछली भारी-भरकम और ऐतिहासिक जीत को मोदी और उनके साथियों ने एक स्थायी अधिकार सा मान लिया है, और न तो जनभावनाओं की कोई परवाह की जा रही है, न ही इंसानियत के किसी तौर-तरीके की। एक के बाद एक बड़े-बड़े नेता घोर साम्प्रदायिक बयान दे रहे हैं, और इस पर एनडीए चुप है, भाजपा चुप है, और मोदी चुप हैं। देश में आज अल्पसंख्यक, आदिवासी, दलित, महिलाएं, लड़कियां, मांसाहारी, और आक्रामक हिन्दुत्व से वैचारिक असहमति रखने वाले लोग, ये तमाम लोग बहुत बुरी तरह से हिंसक हमलों का खतरा झेल रहे हैं, और केन्द्र सरकार को यह बात फिक्र की नहीं लग रही है। केन्द्र की ऐसी भयानक चुप्पी, ऐसी हिंसक ताकतों के लिए बढ़ावे से कम कुछ नहीं रहती, और जिस तरह से लोग हैवानियत के बयान दे रहे हैं, उससे यह लगता है कि क्या इस तबके की चुप्पी इससे बेहतर होगी? प्रधानमंत्री मोदी को तुरंत ही देश के इस हाल पर ध्यान देना चाहिए, क्योंकि हिन्दुस्तान में हो रहे ऐसे मामलों को बाकी दुनिया भी ध्यान से देख रही है। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें