दलितों पर जुल्म जारी रखते हुए आगे नहीं बढ़ सकता यह देश

संपादकीय
24 अक्टूबर 2015

महाराष्ट्र में दलितों की एक पार्टी, रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रामदास अठावले ने मांग की है कि दलितों को आत्मरक्षा के लिए हथियार दिए जाएं। उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा है, और देश भर में जगह-जगह दलितों के साथ हो रही ज्यादती के अलावा, अभी केन्द्रीय मंत्री, भाजपा के जनरल वी.के. सिंह के दलित-विरोधी एक अपमानजनक बयान के बाद अठावले भड़के हुए थे। उन्होंने इस बयान की निंदा करते हुए कहा कि अगर पुलिस और सरकार दलितों पर हमले नहीं रोक सकते, तो दलितों को हथियारों का लाइसेंस देना चाहिए। उनका कहना था कि इसके अलावा दलितों के पास अपनी आत्मरक्षा का और कोई विकल्प नहीं है। 
देश में आज एक सवर्ण-ब्राम्हणवादी संस्कृति की जो हवा चलाई जा रही है, उससे दलितों के खिलाफ माहौल पहले के मुकाबले और अधिक खराब होते चल रहा है। कहीं आरक्षण को लेकर उनको गालियां दी जा रही हैं, कहीं मंदिरों में जाने पर उनको मारा जा रहा है, कहीं हिन्दू धर्म के बारे में कुछ लिखने पर उन पर हमले हो रहे हैं, कहीं उनके बच्चों को जिंदा जलाया जा रहा है, और सबसे बड़ी बात यह कि देश की सत्ता चला रहे लोग दलितों के बारे में गंदी जुबान में हिंसक बातें कर रहे हैं। जनरल वी.के. सिंह को राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने दलित-संदर्भ में कुत्तों की मिसाल देने पर एक नोटिस भी दिया है। हमारा तो यह भी मानना है कि देश की अदालत भी खुद होकर जनरल सिंह के बयान पर उनको नोटिस देकर बुला सकती थी, और अगर सुप्रीम कोर्ट का कोई जज सामाजिक सरोकार वाला होता, तो लीक से हटकर वह ऐसा नोटिस जारी करता भी। लेकिन आज जिनके हाथ ताकत है, उनकी नजरों में कमजोर तबकों की कोई इज्जत नहीं है। यही वजह है कि दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों, और समाज के सभी तरह के कमजोर लोगों के खिलाफ लगातार हिंसा बढ़ते चल रही है। 
कोई अगर यह सोच रहा है कि इस देश में गाय-भैंस का मांस सिर्फ मुस्लिम खाते हैं, तो वह बहुत बड़ी सामाजिक हकीकत को अनदेखा कर रहा है। देश भर में दलितों और आदिवासियों के बीच भी बीफ का चलन है, और गरीबों के बीच अगर मांसाहार किसी शक्ल में उनकी पहुंच के भीतर है, तो वह बीफ ही है। बाकी मांस महंगा होता है, और जनगणना के आंकड़े भारत में बीफ खाने वालों की जो गिनती बताते हैं, असली गिनती उससे बहुत अधिक है। ऐसा इसलिए है कि जब कोई कागज-पेन लेकर किसी परिवार में पहुंचते हैं, और उनसे खानपान और बीफ खाने के बारे में पूछते हैं, तो लोग डर के मारे हकीकत नहीं बताते। आज सरकार के सर्वे के आंकड़े लेकर कोई अगर घर-घर जाकर लोगों को मारना शुरू करे, तो भी उसमें कोई बड़ी हैरानी नहीं होगी। सरकार के पास जो जानकारी पहुंचती है उसका बेजा इस्तेमाल न नई बात होगी, और न कोई खास बात होगी। इसीलिए लोग आधार कार्ड जैसी पहचान को लेकर डरे हुए भी हैं। आज देश में ऊंची समझी जाने वाली जाति का जो दबदबा चल रहा है, उसके चलते हो सकता है कि एक दिन सत्ता की ताकत से लोग ऐसी जानकारी निकालकर छांट-छांटकर लोगों को मारना भी शुरू कर दें। 
संविधान की ताकत इस देश में दलितों को बिल्कुल भी नहीं बचा पा रही है। दलित वहीं पर सुरक्षित हैं, जहां पर उन्होंने धर्मांतरण कर लिया है और वे बौद्ध या मुस्लिम हो गए हैं, या फिर उन जगहों पर जहां पर वे अपनी गिनती और संगठित होने की वजह से एक बड़ी ताकत हैं। इससे परे देश में जातिवाद इतना गहरा बैठा हुआ है कि दलितों के लिए ऊंची जाति के घमंड वाले लोगों के मन में हिकारत के अलावा कुछ नहीं है। यह सिलसिला खत्म होना चाहिए क्योंकि सामाजिक टकराव अगर बढ़ते चलेगा तो देश की तरक्की धरी रह जाएगी। आज केन्द्र सरकार सामाजिक भेदभाव और सामाजिक टकराव को पूरी तरह अनदेखा कर रही है, और ऐसी बहुत सी मिसालें हैं जिनसे लग रहा है कि सरकार के कुछ लोग, और सरकार के करीबी बहुत से लोग ऐसे टकराव को बढ़ावा दे रहे हैं। जिन लोगों का देश की अर्थव्यवस्था से, देश के विकास से, कुछ भी लेना-देना नहीं रहता है, वे तो समाज के अलग-अलग तबकों को काट सकते हैं, लेकिन जो लोग देश को आगे ले जाना चाहते हैं उन लोगों को यह अनदेखी बंद करना चाहिए। दलितों पर जुल्म इस देश को बहुत भारी पड़ेगा, और खासकर जो पार्टियां सवर्ण-ब्राम्हणवादी राजनीति कर रही हैं, वैसी संस्कृति को बढ़ावा दे रही हैं, उनको भी बहुत भारी पड़ेगा। 

1 टिप्पणी:

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