बच्चों की हसरतों की कब्र कामयाब देश की बुनियाद कभी नहीं बन सकती

25 अक्टूबर 2015
संपादकीय
कल भारत के एक बड़े मशहूर रहे फिल्म गायक मन्ना डे की पुण्यतिथि थी। उनके बारे में जो खबरें आईं, वे बताती हैं कि उनके पिता उन्हें वकील बनाना चाहते थे, लेकिन उनकी दिलचस्पी संगीत में थी और वे इसी क्षेत्र में आगे बढ़े। उन्होंने शोहरत तो बहुत पाई, लेकिन यह एक अलग बात है कि उनका आखिरी वक्त बड़ी फटेहाली का रहा, और शायद उनके पास इलाज के लिए भी इंतजाम नहीं बचा था। इन दो बातों को मिलाकर देखें तो लगता है कि लोगों को अपनी पसंद का काम ही करना चाहिए, और उसी में वे आगे बढ़ सकते हैं। दूसरी तरफ यह भी लगता है कि मां-बाप की बात भी सुन लेनी चाहिए, और शोहरत से परे मन्ना डे को शायद इतनी कमाई भी जाती कि बुढ़ापे में वे इलाज के मोहताज न हुए होते।
लेकिन ऐसा भी नहीं है कि संगीत के उद्योग में लोग कमा नहीं पाते, और वकालत में कमा ही लेते हैं। वकालत में भी ऐसे बहुत से लोग दिखते हैं जो कि महीनों तक अपना कोट नहीं धुलवा पाते, और गाने वाले लोगों को अरबपति होते हुए भी मुंबई ने देखा हुआ ही है। हमारा मानना यह है कि बच्चों की दिलचस्पी जिस हुनर या काम में होती है, उसी में उनको आगे बढऩे देना चाहिए। लोग अगर अपनी पसंद का काम करते हैं, तो हो सकता है कि वे कामयाबी के आम पैमाने पर किसी दूसरे पेशे के मुकाबले कुछ पीछे रह जाएं, लेकिन वे अपने हुनर के पैमाने पर खूब बढिय़ा काम कर सकते हैं। आज दिक्कत यह है कि अधिकतर मां-बाप अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई के विषय तय करने से लेकर उनके कामकाज तय करने में भी दखल रखना चाहते हैं, और अगर बात हिंदुस्तान की है, तो यहां तो मां-बाप लड़के-लड़कियों के लिए जीवनसाथी तय करने का एकाधिकार भी अपना ही मानते हैं, और फिर बाद में यह भी तय करना चाहते हैं कि उनके बच्चे कब हों, और कितने हों। जात से बाहर या धर्म से बाहर, या अपने ही गोत्र में, पे्रम-विवाह करने वालों का कत्ल करने का हक भी बहुत से मां-बाप अपना मानते हैं, और अपने बच्चों के पे्रम-संबंधों से निपटने के लिए अधिकतर मां-बाप शहंशाह अकबर बनकर अनारकली को दीवार में चुनवाए बिना अपनी जिंदगी अधूरी समझते हैं। 
हिंदुस्तान में आम लोगों को मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं की बहुत जरूरत रहती है ताकि वे अपने बच्चों की जिंदगी को उनकी पसंद से ढलने का एक मौका देना सीख सकें। मन्ना डे अगर वकील हो गए रहते, तो शायद वे उतने कामयाब नहीं हुए रहते जितने कि वे अपनी पसंद की गायकी में हुए। काम कोई भी छोटा या बड़ा नहीं होता, और मां-बाप को चाहिए कि बच्चों की पसंद को लेकर उनके साथ यह चर्चा जरूर करें कि उनकी पसंद उनको कमाई और कामयाबी से कहां तक ले जा पाएगी। उसके नफे और नुकसान पर उनको खुलकर चर्चा करनी चाहिए, लेकिन उसके बाद उनको बच्चों के मन की पढ़ाई करने देनी चाहिए, या बच्चों की मर्जी का काम करने देना चाहिए। दुनिया में जो भी देश विकसित हुए हैं, वे अपने बच्चों और अपनी नौजवान पीढ़ी की हसरतों को कुचलकर विकसित नहीं हुए हैं। जिस दीवार में हसरतों की अनारकली चुनी हुई रहती है, वह दीवार किसी देश की मजबूत इमारत की बुनियाद नहीं बन सकती। देश में नौजवान पीढ़ी के मर्जी से जीने, मर्जी से शादी करने को लेकर जितने तरह की अडंगेबाजी समाज और परिवार की तरफ से होती है, उससे भी उनकी संभावनाएं खत्म होने लगती हैं। इसलिए बच्चों के शौक, उनकी पढ़ाई, उनके कामकाज से लेकर उनके पे्रम और विवाह संबंधों तक उनकी पसंद का सम्मान किया जाना चाहिए।
पिछले कई हफ्तों से देश के कुछ गिने-चुने जलते-सुलगते मुद्दों पर लिखते-लिखते थकान इतनी हो गई थी, कि मन्ना डे से जुड़ी एक लाईन की यह जानकारी एक राहत की तरह आई, और उन्हीं बातों को कई-कई बार लिखने की बोरियत को बहा ले गई। 

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