टोनी ब्लेयर का इकबाल-ए-जुर्म

26 अक्टूबर 2015
ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्लेयर ने युद्ध के बाद की योजनाओं में हुई खुफिया गलतियों के लिए माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि युद्ध की वजह से तथाकथित इस्लामिक स्टेट का उदय हुआ ऐसे दावों में कुछ सच्चाई है। लेकिन उन्होंने कहा कि सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए माफी मांगना मुश्किल है। ब्लेयर ने कहा कि यदि ऐसा न होता तो इराक आज का लीबिया बन जाता। 2003 में इराक पर अमरीका और सहयोगी देशों ने हमला किया था और सद्दाम हुसैन का शासन खत्म कर दिया था। अमरीकी टीवी चैनल सीएनएन से बात करते हुए ब्लेयर ने कहा कि यदि इराक में उनकी नीतियां नाकाम हुई हैं तो उसके बाद की नीतियां भी कामयाब नहीं हुई हैं। उन्होंने कहा कि यदि इराक पर हमला नहीं किया जाता तो वहां गृह युद्ध छिडऩे का खतरा था। उन्होंने कहा, मैं इस बात के लिए माफी मांगता हूँ कि जो ख़ुफिया जानकारियां हमें मिली थीं वो गलत थीं।
ये बातें पिछले दो दिनों से मीडिया में खबरों में छाई हुई हैं, और इनसे दुनिया के बहुत बड़े समझदार तबके का यह मानना सही साबित हो रहा है कि किस तरह अमरीका ने झूठे सुबूतों को गढ़कर, उनकी बुनियाद पर इराक पर हमले की इमारत खड़ी की थी, और लाखों लोगों को लोकतंत्र के नाम पर मार डाला। इस हमले में ब्रिटिश प्रधानमंत्री सबसे बढ़-चढ़कर अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ रहा और ब्रिटेन की जनता ने टोनी ब्लेयर को उसके लिए कभी माफ नहीं किया है। 
पिछले पन्द्रह बरसों में दुनिया में अमरीका का एक ऐसा अभूतपूर्व हमला देखा है जिसने एक के बाद एक देश पर झूठे आरोप लगाकर उन पर बमबारी की, वहां पर आतंकियों को बढ़ावा दिया, वहां का तख्त पलटा, वहां के शासकों को मारा, दुनिया के दूसरे देशों में घुस-घुसकर फौजी कार्रवाई की, और संयुक्त राष्ट्र संघ को अपने पैरों के जूतों से अधिक नहीं माना। खुद अमरीका के भीतर मानवाधिकारवादियों, अमन-पसंद लोगों का एक ऐसा तबका है जो अमरीका के उस हमलावर तेवरों का विरोधी रहा है, और यही वजह रही कि जॉर्ज बुश ऐसे हमलों के बाद ऐसे हारे कि पिछले दो चुनाव वहां पर उनकी विरोधी पार्टी, डेमोक्रेट्स ने जीते, और पहली बार अमरीका के इतिहास में एक अश्वेत राष्ट्रपति बना। 
अब टोनी ब्लेयर जिन गुनाहों को खुद होकर मान रहे हैं, उनको देखते हुए यह बात फिर लग रही है कि जिस तरह अमरीका ने दुनिया पर हमला किया था, वैसे झूठे सुबूत गढ़कर कोई भी देश अपनी ताकत से दूसरे देश पर हमला कर सकता है, और ऐसे में किसी अंतरराष्ट्रीय संस्था की न तो कोई जरूरत रह गई है, और न ही उसका कोई महत्व रह गया है। संयुक्त राष्ट्र संघ को देशों के बीच के तनाव के मौकों के लिए गढ़ा गया था, लेकिन अमरीका ने जिस हिकारत के साथ संयुक्त राष्ट्र संघ की तमाम चेतावनियों को कुचलते हुए मनमानी हमले किए, उसी की दूसरी मिसाल इजराइल के उन हमलों में देखने मिलती है जो वह रात-दिन फिलीस्तीन पर करते रहता है। 
अब आज अगर संयुक्त राष्ट्र एक कागजी, और एक महज बहस की ताकत रखने वाली संस्था बनकर रह जाता है, तो फिर दुनिया के बीच देशों का आपसी कारोबार सिर्फ उनकी ताकत पर चलना तय है। और ऐसे में देशों के बीच के टकराव कब तक टलते रहेंगे, इसका अंदाज लगाना एक तरह से आसान नहीं है, और एक तरह से मुश्किल नहीं है। 
आज एक-एक करके कई देशों के पास परमाणु हथियारों के जो जखीरे इक_ा हो गए हैं, वे दुनिया को सौ-पचास बार तबाह करने के लिए काफी हैं। ऐसे में कौन सा देश कब अपनी समझ खोकर दूसरों पर हमला कर बैठे, या कि कब किसी देश के हथियारों पर से वहां की सरकार का काबू चले जाए, और कब आतंकी परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कर बैठें, और वे एक खत्म न होने वाले झगड़े की शुरुआत कर देंगे, जिसका अंत हो सकता है कि दुनिया के अंत के साथ हो। 
आज पाकिस्तान जैसा देश पिछले एक बरस में आधा दर्जन बार सरकार के स्तर  पर परमाणु हथियारों की ताकत की बाहें फड़का चुका है। सरकार के अलग-अलग लोग भारत के सिलसिले में ऐसी बात कर चुके हैं। दूसरी तरफ यह बात भी सामने आई है कि पाकिस्तान के परमाणु वैज्ञानिक ने किस तरह मध्य-पूर्व के कुछ देशों को परमाणु तकनीक बेची थी, या दी थी। अब ऐसे में इन देशों में खासी ताकत रखने वाले फौजी अफसर, वहां के तानाशाह, या वहां के धर्मान्ध कट्टरपंथी, कब धर्म के नाम पर परमाणु हथियारों के इस्तेमाल को जायज मान लें, इसका अंदाज कौन लगा सकता है? 
दुनिया में अमरीका के न्यूयॉर्क में विश्व व्यापार केन्द्र की इमारतों पर लादेन के विमानों के हमले को देखा हुआ है। जब धर्म के नाम पर वह हमला हो सकता है, तो धर्म के नाम पर परमाणु हथियार पाने और चलाने का काम क्यों नहीं हो सकता? जिन देशों में सरकार और फौज में मजहब के नाम पर कारोबार चलता है, वहां पर चार लोग मिलकर अगर यह तय कर लें कि उनको परमाणु हथियार का इस्तेमाल करना है, तो उसके लिए जरूरी राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को कैदी बनाकर भी वह काम किया जा सकता है, और पाकिस्तान में लोगों ने पहले भी कई बार फौजी अफसरों को सत्ता पर कब्जा करते देखा है, और राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को हटाते और फांसी चढ़ाते भी देखा है। 
ब्रिटेन, जिसे कि भारत जैसे लोकतंत्र के मॉडल का एक जन्मदाता भी कहा जाता है, वह अगर दुनिया के सबसे बड़े गुंडे देश के साथ मिलकर इस तरह किसी बेकसूर देश पर साजिशी हमला करता है, तो दुनिया के सभ्य देश होने की परिभाषा ही खत्म हो जाती है। सद्दाम हुसैन हो, या कि कर्नल गद्दाफी, इन्होंने जो किया अपने देश में किया था, इन्होंने किसी और के साथ मिलकर किसी और देश में जाकर लोकतंत्र कायम करने के नाम पर हमले नहीं किए थे। लोग शायद इस बात को अब तक भूले नहीं होंगे कि इस हमले के पीछे अमरीका ने सौ बार यह दावा किया था कि इराक में रासायनिक हथियारों के भंडार हैं जो कि मास-डिस्ट्रक्शन, व्यापक बर्बादी करने की ताकत रखते हैं। लेकिन इन हमलों के बाद साबित हुआ कि अमरीका का वह दावा सौ फीसदी झूठा था, और बाद में जो जांच रिपोर्ट आईं, उनसे यह भी साबित हुआ कि अमरीका ने किसी गलत जानकारी पर ऐसा गलत नतीजा नहीं निकाला था, बल्कि एक झूठ गढ़कर हमले की साजिश तैयार की थी। 
टोनी ब्लेयर ने अपने देश की बड़ी बेइज्जती की है। आज उन्होंने अपना जो जुर्म कुबूला है, उससे उन लाखों जिंदगियों की कोई भरपाई नहीं हो सकती जो कि इराक और लीबिया में ब्रिटिश-अमरीकी फौजों ने खत्म की हैं। इसके लिए अंतरराष्ट्रीय न्यायालय के तहत या अलग से एक ऐसी अदालत बननी चाहिए जो कि युद्ध अपराध का मुकदमा इन देशों पर चला सके और मरने वालों को मुआवजा दिलाने के लिए इन देशों के खजानों को खाली कर सके। यह काम कैसे होगा, यह सोचना आसान तो नहीं है, लेकिन यह अंदाज लगाना मुश्किल नहीं है कि अगर दुनिया मरने वाले लाखों लोगों के साथ ऐसा इंसाफ नहीं कर सकेगी, तो फिर उनके पीछे जिंदा बचे लोग जिंदगी भर अपना इंसाफ खुद करते चलेंगे, और उसका दाम आज के हमलावर देशों को अपने लोगों की जिंदगी की शक्ल में चुकाना होगा। 

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