मैगी की वापिसी से एक खतरे की भी वापिसी...

संपादकीय
27  अक्टूबर 2015

लंबे सरकारी प्रतिबंध और अदालती लड़ाई के बाद अब ऐसा लगता है कि बहुराष्ट्रीय कंपनी नेस्ले की भारतीय बाजार की हिट मैगी फिर दुकानों में सजने जा रही है। इसमें नुकसानदेह तत्व मिलने पर एक-एक करके कई राज्यों में और फिर देश भर में इस पर रोक लगाई गई थी, लेकिन अब कई प्रयोगशालाओं के परीक्षण के बाद इसे फिर इजाजत मिल रही है। इससे देश भर के उच्च और उच्च-मध्यम आयवर्ग के ऐसे लोगों को बड़ी खुशी हो रही है जो दो-चार मिनट में पक जाने वाली इस पैकेटबंद-मसालेदार सेंवई के आदी हो चुके थे। लेकिन इसके साथ ही एक सवाल यह उठता है कि क्या भारत में लोगों को सेहतमंद खाने के लिए बढ़ावा देने की जिम्मेदारी सरकार पूरी कर पा रही है?  
भारत की आबादी में डायबिटीज के मरीजों का अनुपात लगातार बढ़ते चल रहा है। लोगों में, खासकर संपन्न तबके में वजन बढऩे का खतरा भी गंभीर होते जा रहा है। जो महंगे स्कूल-कॉलेज हैं, उनमें खान-पान की कैंटीन में मिलने वाले कूड़े सरीखे नुकसानदेह सामानों को लेकर पश्चिम के संपन्न देश वैसे ही बहुत फिक्रमंद हैं, और भारत के महंगे स्कूल-कॉलेज इस मामले में पश्चिम से कहीं पीछे नहीं हैं। एक तरफ तो अंतरराष्ट्रीय ब्रांड भारत के मंझले शहरों तक पहुंच चुके हैं, और एक टेलीफोन पर खाने के सामान घर तक पहुंचा देते हैं, और दूसरी तरफ संपन्न तबके का अपने घर पर भी डिब्बाबंद, बोतलबंद खाना-पीना लगातार बढ़ते जा रहा है। एक सोच यह हो सकती है कि संपन्न तबके की सेहत अगर बिगड़ती है, तो वह सरकार पर इलाज का बोझ नहीं डालती। इस तबके के लोग अपने खर्च पर इलाज करा लेते हैं, लेकिन देश की सेहत को इससे बिगड़ती ही है। इसलिए सरकार और समाज इन दोनों को इस जागरूकता के लिए कोशिश करनी चाहिए। 
दूसरी बात यह कि भारत की खुली और उदार बाजार-व्यवस्था के तहत आज खान-पान जितना बिगड़ रहा है, उतने ही महंगे अस्पताल बढ़ते भी चल रहे हैं। ऐसे में बिना किसी साजिश के भी हो यह रहा है कि बाजार एक तरफ तो महंगा कूड़ा खिलाकर लोगों की सेहत बिगाड़ रहा है, और फिर उसी बाजार की एक दूसरी दूकान लोगों को महंगा इलाज बेच रही है। ये दोनों काम बाजार को माकूल बैठते हैं। इस बिना गढ़ी हुई बाजारू साजिश को खत्म करने की जरूरत है। आज दुनिया भर के आंकड़े ये बता रहे हैं कि कोकाकोला जैसे डिं्रक की एक-एक बोतल में कितने चम्मच शक्कर है, और वह पूरी सेहत के लिए किस हद तक नुकसानदेेह है। और बाजार के हमलावर तेवर हैं कि हर दिन सबसे मशहूर फिल्मी सितारे ऐसे कूड़े को बढ़ावा देते टीवी पर दिखते हैं। देश में जनता के लिए खान-पान की जागरूकता का एक बड़ा अभियान छेडऩे की जरूरत है। सरकार की अपनी सीमाएं हैं, लेकिन अलग-अलग तरह के जो भी सामाजिक या किसी और तरह के भी संगठन हैं, उनको अपने सदस्यों को बचाने के लिए खानपान के विशेषज्ञों के व्याख्यान करवाने चाहिए, ताकि उनके सदस्य सेहतमंद भी बने रहें, और लंबी जिंदगी भी जी सकें। हर स्कूल और कॉलेज को भी अपने बच्चों को सावधान करने की कोशिश करनी चाहिए, खासकर जो जितने संपन्न तबके वाले हैं, उनको उतनी ही अधिक कोशिश की जरूरत है। मैगी और कोलाकोला एक ब्रांड न होकर उससे भी अधिक एक जीवनशैली के प्रतीक बन गए हैं, और इनके खतरों को कम नहीं आंकना चाहिए। आज देश में नौजवान पीढ़ी के कई लोग ऐसे हैं जो मां के आने के इंतजार से अधिक मैगी के आने का इंतजार कर रहे हैं, उनको सावधान करना जरूरी है।

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