कॉल-ड्रॉप, ग्राहकों की दिक्कत संचार कंपनियों की चांदी

संपादकीय
02 अक्टूबर 2015

साल भर से भारत में यही चर्चा चल रही है कि किस तरह मोबाइल फोन की कॉल-ड्रॉप की दिक्कत खत्म की जाए, और अगर यह दिक्कत जारी रहती है तो ग्राहकों को होने वाले नुकसान की भरपाई कैसे की जाए। हर कुछ महीनों में यह खबर आती है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस दिक्कत का इलाज ढूंढने के लिए कहा है, कभी संचार मंत्री इस बारे में कुछ बोलते हैं, और बीच-बीच में दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई) भी ऐसा जाहिर करता है कि वह नाजायज कमाई करने वाली, और ग्राहकों को दिक्कत देने वाली कंपनियों पर कार्रवाई करेगा। हालांकि हर दिन लोगों पर ये कंपनियां एक नाजायज बोझ लाद रही हैं, और इसकी कोई भरपाई ग्राहकों को नहीं मिल रही है। 
भारत में निजीकरण के साथ दूरसंचार कंपनियां कई तरह से ग्राहकों को लूटने का काम कर रही हैं। लेकिन ऐसा भी नहीं कि निजीकरण से ग्राहकों का नुकसान ही हुआ है। इस देश में कंट्रोल की सरकार के वक्त हाल यह था कि एक-एक घरेलू टेलीफोन के लिए लोगों को दस-दस बरस इंतजार करना पड़ता था, और एक-एक फोन लगाने के लिए टेलीफोन ऑपरेटरों को रिश्वत देनी पड़ती थी। जब सरकारी फोन कंपनी का एकाधिकार था, उस वक्त फोन ऐशोआराम की चीज थी। निजीकरण के साथ, टेक्नालॉजी के आसान होने के साथ, और खुले बाजार का मुकाबला बढऩे के साथ हिन्दुस्तान में फोन हर मजदूर के हाथ तक पहुंच चुका है। और खुले बाजार में ग्राहकों को लूटने की जो-जो तरकीबें दुनिया भर में इस्तेमाल होती हैं, वे भारत में भी होने लगी हैं। ऐसे में इस कारोबार को नियंत्रित करने के लिए केन्द्र सरकार ने ट्राई जैसे आयोग का गठन किया, और निजी कंपनियों ने पिछले बरसों में लगातार यह साबित भी किया कि वे सरकार से लेकर अदालत तक, और ट्राई से लेकर ग्राहकों तक सबकी आंखों में किस तरह धूल झोंक सकती हैं। लोगों को याद होगा कि किस तरह संचार मंत्री कैसा भयानक भ्रष्टाचार करते आए थे, और किस तरह स्पेक्ट्रम नीलामी से लेकर बाकी मामलों तक दसियों हजार करोड़ का भ्रष्टाचार तो पकड़ में ही आया था। लोगों को यह भी याद होगा कि किस तरह यूपीए सरकार में मंत्रियों को विभाग दिलवाने के लिए नीरा राडिया नाम की दलाल देश के सबसे नामी-गिरामी मीडिया-सितारों के मार्फत केन्द्र सरकार से मोलभाव कर रही थी। चूंकि ऐसी बातचीत की रिकॉर्डिंग इंटरनेट पर मौजूद है, इसलिए लोगों को यह अंदाज है कि संचार कंपनियां किस तरह के जुर्म करने में सक्षम हैं। 
लेकिन यह बातचीत अधूरी रह जाएगी अगर हम मोबाइल फोन सेवा के टॉवरों की बात न करें। दरअसल मोबाइल कंपनियों को हर शहरी इलाके में अपने टॉवरों के लिए भारी विरोध झेलना पड़ रहा है क्योंकि उनसे लोगों की सेहत पर बुरा असर पडऩे का खतरा है। कहीं-कहीं अदालतों ने स्कूलों और अस्पतालों जैसी जगहों के पास ऐसे टॉवर लगाने पर रोक लगाई है, और कई जगहों पर जनविरोध से टॉवर हटाने पड़ते हैं। ये दोनों बातें एक साथ नहीं चल सकतीं। जैसे-जैसे मोबाइल फोन बढ़ रहे हैं, और जैसे-जैसे उनका इस्तेमाल बढ़ रहा है, वैसे-वैसे टॉवरों की क्षमता घट रही है। ऐसे में नए-नए इलाकों में टॉवर लगाने पड़ेंगे, या किसी दूसरे प्रसारण उपकरण का रास्ता निकालना पड़ेगा। इसके बिना मोबाइल सेवा सुधर नहीं पाएगी। दूसरी तरफ केन्द्र सरकार और ट्राई का कोई काबू न रहने से मोबाइल कंपनियां एक-एक कॉल कई-कई बार कट जाने पर अधिक मुनाफा पा रही हैं, और उनकी दिलचस्पी कोई रास्ता निकालने में नहीं हैं। जिन इलाकों में टॉवर लगे हुए हैं, वहां भी अगर ऐसा हो रहा है, तो उसका मतलब है कि उन टॉवरों में संचार उपकरणों की क्षमता नहीं बढ़ाई गई है। अगर कुछ बरस बाद जाकर यह बात सामने आती है कि केन्द्र सरकार और ट्राई ने मिलकर निजी फोन कंपनियों को ऐसी धोखाधड़ी करने की छूट दी थी, और उसके एवज में रिश्वत ली थी, तो भी हमें हैरानी नहीं होगी। और अगर इस देश में इस दिक्कत को दूर करने के लिए भी अदालत को बीच में आना पड़ेगा, तो भी हमें हैरानी नहीं होगी। 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें