किसान की मौत के सिवा और कुछ मुमकिन नहीं

संपादकीय
30 अक्टूबर 2015

देश के एक प्रमुख सामाजिक विचारक रहे, और आम आदमी पार्टी में जाकर अपना महत्व खो बैठे योगेन्द्र यादव ने किसानों के मुद्दों के अध्ययन के बाद कहा है कि बैंक और बीमा कंपनियां किसानों के साथ तरह-तरह की बेईमानी कर रही हैं। उनका कहना है कि जब किसान बैंक से कर्ज लेता है तो बिना उससे पूछे, बिना उसकी अनुमति लिए जबर्दस्ती उसके अकाउंट से पैसा काटकर बीमा करवा दिया जाता है। बीमा करवाना है या नहीं इसका फैसला किसान नहीं ले सकता। बीमा किस कंपनी से करवाना है, किन शर्तों पर करवाना है यह भी किसान के हाथ में नहीं। बैंक खुद फैसला करता है। बीमे के बाद कोई कागज किसान के हाथ में नहीं होता। दुर्घटना की हालत में उसे नहीं पता होता कि उसे बीमे का क्या भुगतान मिलना चाहिए। जब फसल खराब होती है तो भी किसान को नहीं मालूम कि वह कहां जाए, कहां दावा करे।
छत्तीसगढ़ में भी किसानों के फसल बीमा को लेकर तरह-तरह की साजिशें होती रही हैं। कहीं किसान के बोए हुए रकबे से अधिक का बीमा करवाकर सहकारी समितियां या बैंक उसका प्रीमियम उसके खाते से सीधे ही घटा देते हैं, तो कभी मौसम आधारित बीमा होने से उसको किसी तरह का फायदा, फसल बर्बाद होने पर भी नहीं मिल पाता। दरअसल किसान की बदहाली सरकार और बाजार की मिलीजुली साजिश का नतीजा है। एक तरफ तो घटिया बीज की शिकायत बनी रहती है, दूसरी तरफ खेतों में सरकार की तरफ से जो योजनाएं लागू होती हैं, उनमें बीज, पौधों, खाद, मशीनों, सिंचाई पंपों से लेकर खेत के भूमि-सुधार तक, बहुत सी बातों में सरकारी दखल भ्रष्टाचार से भरी हुई है। नतीजा यह होता है कि गरीब किसान मौसम की मार भी झेलता है, और सरकार की मार भी, और इससे भी आगे बढ़कर जब वह बाजार की मार झेलता है, तो फिर वह टूट ही जाता है। जब उसकी खेती सरकारी कर्ज पर टिकी रहती है, तो जो बैंक और जो सहकारी समितियां उसके कर्ज से लेकर खाद-बीज तक के काम में लगी रहती हैं, वे सब एक बड़े संगठित भ्रष्टाचार में भागीदार बन जाती हैं। 
आज हिन्दुस्तान के शहर सोने की महंगाई की शिकायत नहीं करते, पेट्रोलियम के दाम जब चाहे तब पांच-दस फीसदी घट-बढ़ जाते हैं, लेकिन उसकी शिकायत कोई नहीं करते। लेकिन जब किसान की उपज के दाम बढ़ते हैं, तो शहरों को लगता है कि उनका खून चूसा जा रहा है। बाजार किसान की उपज के बाद जितना मोटा मुनाफा कमाता है, उतना किसान पूरी जिंदगी में कभी नहीं कमा सकता। और अब तो वायदा कारोबार के नाम पर, कभी आयात और कभी निर्यात के फैसलों के रास्ते, बाजार जैसा मोटा मुनाफा कमाता है, उसका कोई हिस्सा किसान तक कभी नहीं पहुंच पाता। यही वजह है कि देश भर में जगह-जगह किसान आत्महत्या कर रहे हैं, और राज्य सरकारें लगातार यह साबित करने में लगी रहती हैं कि ये आत्महत्या खेती की वजह से नहीं हैं, किसी निजी वजह से हैं। भारत में खेती की अर्थव्यवस्था को इस तरह खत्म किया जा रहा है, कि बड़े-बड़े पूंजीपति ही बड़ी-बड़ी खर्चीली खेती कर सकें, और छोटे किसान पानी को तरसते रह जाएं, और बैंक-बीमा कंपनियों से कभी कोई मुआवजा न पा सकें। 
आज देश की सरकार की जो सोच है, उसमें खेती की कोई प्राथमिकता नहीं है। किसानों के बजाय सरकार की दिलचस्पी उन लोगों में हैं जो कि बड़ा-बड़ा आयात कर सकते हैं। कभी प्याज तो कभी दाल, तो कभी तेल, इन सबकी महंगाई को पहले सोच-समझकर आसमान पर ले जाया जाता है, और उसके बाद इन सामानों को आयात करने का एक माहौल बनाया जाता है, ताकि गिने-चुने इम्पोर्टर रातों-रात अरबों की कमाई कर सकें। देश के किसानों को आत्मनिर्भर बनाने में सरकारों की दिलचस्पी जरा भी नहीं है। हम पहले भी इस जगह लिख चुके हैं कि भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था में खेती के साथ-साथ बहुत से और स्वरोजगार जब तक नहीं जोड़े जाएंगे, तब तक किसान का जिंदा रहना मुश्किल होगा। लेकिन हस्तशिल्प से लेकर दूध, फल, सब्जी, शहद, और फूल जैसे दर्जनों दूसरे काम हैं जिनको गांवों से जोडऩे पर किसान मौसम की मार को बर्दाश्त करने लायक बन सकेेगा। अभी तो जब कुदरत ऊपर से मार करती है, तब बैंक, बीमा, बाजार, और सरकार जमीन पर से उस पर मार करते हैं। ऐसे में किसान की मौत के सिवाय और कुछ मुमकिन नहीं है। 

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