बलात्कार घटाने की कोशिश सबको मिलकर करनी चाहिए

संपादकीय
26 अक्टूबर 2015

छत्तीसगढ़ में आए दिन बलात्कार हो रहे हैं, और छोटी बच्चियों से लेकर आदिवासी युवतियों तक, बुजुर्ग महिलाओं तक, और सरकारी छात्रावास में रहने वाली लड़कियों तक से बलात्कार की खबरें रोज छप रही हैं। लेकिन ऐसा जुर्म होता है, पुलिस तक मामला जाता है, खबर छपती है, और सब कुछ दफन हो जाता है। बरसों बाद जाकर किसी-किसी मामले में सजा हो जाती है, लेकिन इतने संपन्न राज्य में जहां सरकार और समाज कई तरह के मामलों में हजारों करोड़ खर्च करते हैं, इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक चर्चा तक नहीं होती कि बलात्कार क्यों होते हैं, और उनको रोकने के लिए क्या किया जा सकता है। हम यह नहीं कहते कि हर बलात्कार रोकने के लायक होता है, बहुत से मामले ऐसी स्थितियों में होते हैं जहां तक सरकार और समाज की पहुंच नहीं होती। लेकिन छत्तीसगढ़ में ही हर कुछ महीनों में कोई एक ऐसी लड़की आत्महत्या करती है जो कि पड़ोस के लड़कों की छेड़छाड़ से परेशान रहती थी। अब जहां लड़कियों की सुरक्षा की यह स्थिति है, वहां पर बलात्कार के बाद बहुत सी लड़कियां और महिलाएं पुलिस तक जाने का हौसला भी नहीं जुटा पाती होंगी। 
इस राज्य में बाकी हिन्दुस्तान की तरह एक जरूरत बिल्कुल खड़ी हुई है, समाज और सरकार को मिलकर लड़कियों और महिलाओं के सम्मान के लिए, उनके बेहतर अधिकारों के लिए, और उनकी बेहतर हिफाजत के लिए अभियान छेडऩे की जरूरत है। इसके साथ-साथ समाज के तमाम लोगों को यह बताने की जरूरत भी है कि सेक्स-अपराधियों के साथ कानून कितना कड़ा हो सकता है, और ऐसे मामले में पकड़ाने से लेकर सजा पूरी होने तक हो सकता है कि बलात्कारी का पूरा परिवार ही तबाह हो जाए। आमतौर पर बलात्कारी उस पीढ़ी के रहते हैं कि उनके आगे-पीछे दूसरी पीढिय़ां भी रहती हैं। एक बलात्कार के साथ-साथ बलात्कारी के बच्चों की बाकी जिंदगी भी तबाह हो सकती है, और हो सकता है कि वे जब तक जेल से लौटें, तब तक मां-बाप चल बसें। हमारा मानना है कि लोगों को जुर्म की सजा के खतरों से समय रहते अगर अच्छी तरह आगाह किया जाता है, तो लोग जुर्म से कतरा भी सकते हैं। 
फिर सरकार से परे समाज की भी यह जिम्मेदारी रहती है कि आस-पड़ोस में, सड़क पर या सार्वजनिक जगहों पर, स्कूल या अस्पताल में, हॉस्टल या खेल के मैदान पर अगर वे किसी तरह का देह-शोषण देखते हैं, छेड़छाड़ या बदमाशी देखते हैं, तो उनको भी खुलकर ऐसी बातों का विरोध करना चाहिए। सरकार की पुलिस चाहे कितनी ही बड़ी और ताकतवर क्यों न हो, उसके आकार और उसके खर्च का बोझ जनता पर ही पड़ता है। एक-एक बलात्कार की जांच से लेकर उसकी सजा तक सरकार पर लाखों रूपए का खर्च होता है। अगर जनता जागरूक रहे, तो सरकार का ऐसा खर्च घट भी सकता है, और खर्च से अधिक महत्वपूर्ण बात हम पहले ही लिख चुके हैं कि मुजरिम ऐसे जुर्म से बच सकते हैं। 
सरकार और समाज को मिलकर सार्वजनिक रूप से जागरूकता अभियान चलाना चाहिए, और यह भी गारंटी करनी चाहिए कि समाज में जो कमजोर तबके हैं, उनके साथ दबंगई दिखाने वाले ताकतवर लोग समय रहते सजा पा जाएं। आज जो लोग छेडख़ानी करते हैं, और बच जाते हैं, वैसे ही लोग कल बलात्कार तक पहुंचते हैं। इससे परे बलात्कारियों की एक किस्म ऐसी भी होती है जो परिवार के पहचान के लोग रहते हैं, और ऐसे लोगों से अपने बच्चों को सावधान करना हर परिवार की जिम्मेदारी है। लेकिन भारत में मां-बाप और बच्चों के बीच बातचीत के मुद्दों को लेकर इतनी झिझक कायम रहती है कि बहुत सी बातों को खुलकर किया ही नहीं जाता। सरकार को चाहिए कि मनोवैज्ञानिक परामर्शदाताओं के ऐसे सार्वजनिक व्याख्यान करवाए जाएं जो कि मां-बाप को सावधान और चौकन्ना करने का काम करें। 
बलात्कार पूरी तरह से बंद नहीं हो सकते, लेकिन उनको घटाने की कोशिश जरूर करनी चाहिए। इसके लिए सबको भिड़कर काम करने की जरूरत है। 

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