चुनाव में कामयाब नेता, बड़ा नेता बनने के मौके लगातार खोते हुए

14 अक्टूबर 2015
संपादकीय

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दादरी कांड सहित बहुत से मामले हो जाने के बाद पहली बार इन मुद्दों पर मुंह खोला, और अपने हाथ झटक लिए। उन्होंने कहा कि दादरी की घटना या गुलाम अली का विरोध दुखद है, लेकिन उन्होंने पूछा कि इन घटनाओं में केंद्र सरकार की क्या भूमिका है? पिछले एक पखवाड़े से भारत में यह बहस चल रही थी कि रोज इतना-इतना बोलने वाले मोदी इन जलते-सुलगते मुद्दों पर क्यों खामोश हैं, और कब तक खामोश रहेंगे? और अब जब मोदी ने मुंह खोला है, तो लगता है कि इस बोलने से तो उनकी चुप्पी ही बेहतर थी। भारत का प्रधानमंत्री अगर देश को बांट देने की साजिश के बारे में यह कहे कि इसमें केंद्र की क्या भूमिका है, तो मोदी आज सबसे बड़ा नुकसान अपना खुद का कर रहे हैं। देश का नुकसान तो हो रहा है, वह पहले भी हो चुका है, और देश ऐसे नुकसानों से उबर भी चुका है। आज के हो रहे नुकसान और कुछ बरस जारी रहेंगे, तो भी देश उनसे उबर सकता है, उबर जाएगा, लेकिन आज मोदी अपने खुद की संभावनाओं का जो नुकसान कर रहे हैं, उसकी भरपाई वे अपने इस राजनीतिक जीवन में शायद ही कर सकें।
गुजरात के मुख्यमंत्री से लेकर देश के प्रधानमंत्री तक का सफर नरेन्द्र मोदी के लिए सब कुछ लेकर आया। और इसमें भी सबसे बड़ी बात थी एक बड़ा नेता बनने की संभावना। आज वे जो कुछ भी हैं, वे चुनाव के रास्ते जीतकर आए एक कामयाब नेता हैं, लेकिन चुनावी जीत किसी को बड़ा नेता नहीं बना देती। बड़ा नेता बनने के लिए एक बड़प्पन जरूरी रहता है। और मोदी आज बड़प्पन दिखाने में, बड़प्पन का बर्ताव करने में बहुत तंगदिली दिखा रहे हैं, और एक बड़ा नेता बनने की अपनी संभावनाओं को खत्म भी कर रहे हैं। देश में वोटरों के बहुमत से जीतकर आई पार्टी के भीतर बहुमत से किसी ओहदे तक तो कोई भी पहुंच सकते हैं। लेकिन वह बड़ा नेता बनने की मंजिल नहीं होती, वह  इस लंबे रास्ते का एक पड़ाव होता है। मोदी ओहदे की कामयाबी पा चुके हैं, लेकिन वे एक बड़ा नेता बनने के पहले पड़ाव पर ही हैं। 
भारत का प्रधानमंत्री अगर राज्यों की घटनाओं को राज्य सरकारों की जिम्मेदारी मानकर अपने हाथ झटक ले, तो यह गैरजिम्मेदारी है। भारत के संघीय ढांचे में केंद्र सरकार की भूमिका देश के हर उस मामले में है जिसका असर देश भर पर पड़ सकता है, या जिससे समाज टूट और बिखर सकता है। उत्तरप्रदेश में मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी की सरकार के राज के खिलाफ कुछ कहना आज शायद बिहार के चुनाव को देखते हुए नरेन्द्र मोदी को ठीक न लग रहा हो, लेकिन जिस महाराष्ट्र में गुलाम अली को घुसने नहीं दिया गया, वहां तो मोदी की ही पार्टी की सरकार है, और सरकार में भागीदारी शिवसेना ने ही हिंसा के साथ विरोध करके गुलाम अली को रोका, और सुधीन्द्र कुलकर्णी का मुंह काला किया। क्या अपनी ही पार्टी की सरकार के राज में हुए इस मामले से भी भारत का प्रधानमंत्री हाथ झटक सकता है? 
जिस बहुमत से नरेन्द्र मोदी देश के इस सबसे बड़े ओहदे तक पहुंचे, उस बहुमत के चलते हुए उनके पास एक दरियादिली दिखाकर देश में सम्मान पाने का एक मौका था, आज वे अपने-आप के लिए कमजोर तर्क देकर बचाव भर पा रहे हैं। देश के ऐसे मुद्दों पर चुप्पी रखकर, जिम्मेदारी से बचकर कोई महान या बड़ा नेता नहीं बन सकते। अभी तो हम सिर्फ बड़ा नेता बनने की बात कर रहे हैं, और नरेन्द्र मोदी एक के बाद एक कई मौकों पर ऐसे मौके चूक रहे हैं।

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