जिस किसी के ऐसे-ऐसे यार उसको दुश्मन की क्या दरकार

संपादकीय
04 अक्टूबर 2015

दिल्ली से लेकर मेरठ तक अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर साबरमती के संत लिखे हुए होर्डिंग अखबारी तस्वीरों में आ रहे हैं। महात्मा गांधी के साथ मोदी की यह तुलना करके उनके शुभचिंतक और समर्थक उनका नुकसान करने के अलावा और कुछ नहीं कर रहे हैं। उनके मन की हसरत हो सकती है कि मोदी को महात्मा गांधी जैसा दर्जा मिल जाए, लेकिन यह बात न आसान है, और न इसकी कोशिश जायज है। मोदी को कामयाबी पाने, और मशहूर होने के दूसरे कई मौके मिल सकते थे, मिल सकते हैं, लेकिन गांधी के चबूतरे पर उनकी बराबरी से उनका खड़ा होना फिलहाल मुमकिन नहीं दिख रहा है। और ऐसे में ऐसी तुलना उनके कद को गांधी के कद के मुकाबले खासा छोटा दिखाती है, जो कि मोदी का समर्थन करना नहीं, मोदी को नुकसान पहुंचाना है। 
यह सिर्फ मोदी के साथ नहीं है, और न ही यह सिर्फ राजनीति में है। जिंदगी के हर दायरे में ऐसे चापलूस रहते हैं जो कि ताकत की जगहों पर बैठे हुए लोगों को महान साबित करने को अपना पेशा बना लेते हैं, और ऐसे समर्थक या प्रशंसक बनकर वे अपनी खुद की रोजी-रोटी की गारंटी कर लेते हैं। न सिर्फ भारत में बल्कि पूरी दुनिया में मुसाहिबों और चापलूसों का नाम और काम इतिहास में दर्ज है। भारत में एक वक्त चारण और भाट अपने राजा की वीरगाथा गाते हुए उसे महानतम साबित करने में लग जाते थे। आज भी भारत में जगह-जगह जिला स्तर के नेता भी कहीं युवा हृदय सम्राट कहलाते हैं, तो कहीं लोकनायक कहलाते हैं, तो कहीं हर-हर मोदी जैसे नारे लगते हैं जो कि मोदी को ईश्वर की बराबरी पर खड़ा करने की कोशिश करते हैं। ऐसा भी नहीं है कि लोग ऐसी तुलनाओं, ऐसी उपमाओं, और ऐसे विशेषणों का खोखलापन नहीं जानते हैं। लेकिन लोगों को यह लगता है कि राजा अगर खुशामदखोर हो, तो उससे अपना काम निकलवाना आसान हो सकता है। इसलिए लोग इस ताक में रहते हैं कि कैसे राजा के जूते उतारे जाएं, कैसे उसकी जुराबें उतारी जाएं, और फिर कैसे उसके तलुए सहलाए जाएं। 
भारत में अनगिनत व्यंग्यकारों ने ऐसी चापलूसी के बारे में लिखा है। और इमरजेंसी जैसे दौर में लोगों ने देखा है कि एकाएक देश का युवा हृदय सम्राट बन चुका संजय गांधी किस तरह अपनी तानाशाही के साथ मुख्यमंत्रियों और राज्यपालों से अपनी चप्पलें उठवा लेता था, और अपनी कुर्सी उनके दुपट्टे से साफ करवा लेता था। संजय गांधी को जुबान से कुछ कहना भी नहीं पड़ता था, और उसके सामने दुम हिलाते खड़े बड़े-बड़े ताकतवर नेता खुद ही जीभ निकाले जी-हुजूरी करते खड़े रहते थे। लेकिन चापलूसों से घिरे लोगों का क्या हाल होता है, यह तो दुनिया के इतिहास में बहुत जगहों पर दर्ज है। नरेन्द्र मोदी हों, या कोई भी और समझदार नेता, समझदार कारोबारी या कारखानेदार, सभी लोगों को याद रखना चाहिए कि ओहदे और वक्त को देखते हुए मतलबपरस्त लोग जब जरूरत से अधिक तारीफ में लग जाते हैं, तो वे अच्छे-खासे ताकतवर लोगों को खोखला करके छोड़ते हैं। जितने बड़े-बड़े विशेषण इस्तेमाल होते हैं, उतने ही बड़े-बड़े सवाल या शक आम लोगों के मन में खड़े हो जाते हैं, जो कि होते तो बेजुबान हैं, लेकिन जब वोटों की बात आती है, तो उनका भी एक पूरा वोट होता है, जितना कि किसी प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का हो सकता है। 
जिस तरह मोदी को साबरमती का संत लिखकर होर्डिंग टांगे जा रहे हैं, वह मोदी का खासा नुकसान करने का काम है। और हमारा इस मुद्दे पर आज यहां लिखने का मकसद मोदी को बचाना नहीं है, यह आम बात सभी खास लोगों को याद दिलाना है कि जिसके ऐसे-ऐसे यार, उसको दुश्मन की क्या दरकार।

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