मुशर्रफ के दावों के बाद भी अमरीकी मदद जारी रहेगी?

संपादकीय
28 अक्टूबर 2015
पाकिस्तान के पिछले फौजी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने जितना खुलकर अपनी सरकार और अपनी फौज का आतंक-समर्थन गिनाया है, और जिस तरह अमरीका पर इतिहास का सबसे बड़ा हमला करने वाले ओसामा-बिन-लादेन को अपना हीरो कहा है, उस पर कुछ कहना और करना अमरीका के लिए बड़ा भारी काम होगा। इस बात को दुनिया में अधिकतर जानकार मानते आए हैं कि पाकिस्तान लगातार अड़ोस-पड़ोस में आतंक को बढ़ावा देते रहा है, और भारत पर हुए कई हमलों को लेकर भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपना केस भी रखा है कि कैसे पाकिस्तान से आए लोगों ने मुंबई अटैक किया, और बाकी हमले किए। लेकिन अमरीका की पाकिस्तान के लिए मोहब्बत कई लोगों को हैरान करती है। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा अमरीका से मिलने वाली फौजी और नगद मदद से चलता है। ऐसे में भारत जैसे देश का यह कहना अमरीका अब अनसुना नहीं कर सकता कि जो मदद अमरीका से पाकिस्तान को मिलती है उसका इस्तेमाल भारत के खिलाफ आतंक में किया जाता है। परवेज मुशर्रफ की कही ये बातें कल से भारत के मीडिया में छाई हुई हैं, और भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कुछ कड़े तेवरों के साथ कल एक सार्वजनिक कार्यक्रम में यह कहा है कि पाकिस्तान जो जुबान समझता है उसको उसी जुबान में समझाया जाना चाहिए। 
दुनिया में कोई लोकतांत्रिक देश ऐसी गुंडागर्दी के साथ इस बात का दावा नहीं करता कि दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी उसका हीरो है, या उसने भारत के कश्मीर से लेकर अफगानिस्तान के तालिबान तक को ट्रेनिंग दी, मदद दी, हथियार दिए। मुशर्रफ के बारे में लोगों को अच्छी तरह याद है कि कारगिल में फौजी घुसपैठ करने को लेकर भी उन्होंने बरसों बाद जाकर इस बात पर बड़ा फख्र जाहिर किया था कि हिन्दुस्तान की अटल बिहारी बाजपेयी की सरकार सोती रही, और पाकिस्तानी फौजें कारगिल में दूर तक घुसकर हिन्दुस्तानी इलाकों पर कब्जा कर चुकी थी। इसके बाद का कारगिल युद्ध इतिहास में दर्ज है, और उसकी अधिक चर्चा आज मुशर्रफ या पाकिस्तान को लेकर करना जरूरी नहीं है। 
अमरीका के लिए फौजी नजरिए से शायद यह बात जरूरी है कि ईरान और चीन  के बीच में बसे पाकिस्तान को इनमें से किसी की भी जेब में जाने से वह रोके, और अपने साथ बनाए रखे। जिस तरह से दुनिया के बड़े कारोबारी अपने कारखानों के इलाकों में, अपनी खदानों के इलाके में वहां के स्थानीय मवाली-रंगदार को हफ्ता देते हैं, उसी तरह अमरीका पाकिस्तान को इस इलाके में अपना अड्डा चलाने के लिए, जमीन के भाड़े की तरह, रंगदारी की तरह हफ्ता देता है। अब जब ये तमाम बातें सामने आ गई हैं कि जनरल मुशर्रफ ने किस तरह तालिबानों और लादेन जैसे लोगों को बढ़ावा दिया, जिन्होंने अमरीका पर हमला किया, न्यूयॉर्क की इमारतों को मिट्टी में मिलाकर अमरीकी गुरूर को धूल में मिला दिया, तो उसके बाद अब अमरीका को सार्वजनिक रूप से अपने नजरिए का खुलासा करना चाहिए। आज दुनिया में जो देश लोकतांत्रिक होने की बात कहते हुए लगातार आतंक को बढ़ावा देता है, उसे अमरीका चढ़ावा देता है। अब भारत के इस दावे में दुनिया को एक अधिक दम दिखेगा कि पाकिस्तान को मिलने वाली अमरीकी मदद आतंक के लिए इस्तेमाल होती है। 
अमरीका ने अपने आपको दुनिया का सबसे बड़ा आतंक-का-शिकार बताते हुए इराक पर हमला किया, लीबिया पर हमला किया, और बाकी देशों पर उसके हमले चल ही रहे हैं। एक तरफ तो अमरीका अपने घर में सीमित देशों पर हमला करके लाखों लोगों को मार चुका है, और वहां पर लोकतंत्र स्थापित करने का नाटक करता है, आतंकियों को मारने के लिए दुनिया के देशों को धमकाकर अपने साथ ले जाता है। दूसरी तरफ जनरल मुशर्रफ के ऐसे खुले दावों के बाद अगर अमरीका पाकिस्तान की आर्थिक मदद जारी रखता है, तो उसका पाखंड खुलकर उजागर होता है। भारत को जनरल मुशर्रफ की कही इन नई बातों को लेकर अमरीका के सामने जमकर विरोध करना चाहिए, क्योंकि भाजपा की ही अटल सरकार पर मुशर्रफ ने फौजी हमला किया था। 

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