लठैत-रंगदारी से सड़क पर टैक्स वसूली से उबरना होगा

संपादकीय
03 अक्टूबर 2015

देश भर में चल रही ट्रांसपोर्ट हड़ताल से अभी बहुत अधिक दिक्कत होना शुरू नहीं हुई है, लेकिन केन्द्र सरकार को चाहिए कि देश के इस बड़े कारोबार की बात को सुने। यह सिर्फ ट्रकों का मामला नहीं है, बल्कि सड़क पर टोल नाके पार करने वाले हर किस्म की गाडिय़ों का मामला है कि उन्हें कितना समय यह सरकारी टैक्स देने में बर्बाद करना पड़ता है। और यह बात सिर्फ किसी कारोबार की दिक्कत की नहीं है, यह देश की ट्रांसपोर्ट-क्षमता की बर्बादी की भी है, और ऐसे नाकों की वजह से गाडिय़ों में जो ईंधन बर्बाद होता है, जो हवा खराब होती है, और इंसानों का वक्त बर्बाद होता है, गाडिय़ों पर लदे सामान पर कारोबारियों का खर्च बढ़ता है। ऐसी सारी तबाही को देखते हुए यह बात समझने की जरूरत है कि जिस तबके की गाडिय़ों से किसी दूसरे तरीके से टैक्स लिया जा सकता है, उनके लिए नाकों का सिलसिला खत्म करना चाहिए। आज जब डिजिटल इंडिया की बात चल रही है, और कम्प्यूटर-संचार तकनीक का अधिक इस्तेमाल हो रहा है, तब दुनिया में बरसों से प्रचलित ऐसे इलेक्ट्रॉनिक टैग भी इस्तेमाल हो सकते हैं जिससे बिना रूके गाडिय़ां टैक्स नाकों से सीधे निकल जाएं, और कम्प्यूटर उनको दर्ज कर ले। 
हम बहुत तकनीकी बारीकियों में जाना नहीं चाहते, लेकिन यह बात तय है कि देश अगर अपने लोगों, और अपनी क्षमता को बर्बाद करने में लगा रहता है, तो उस देश का भारी नुकसान होता है। वह अपनी संभावनाओं को नहीं छू पाता। भारत में केन्द्र और राज्य सरकारें, स्थानीय संस्थायें, और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, उन सभी को कतारों का शौक दिखता है। लोगों को जरा-जरा सी बात के लिए लाईन में खड़ा कर दिया जाता है, और घंटों से लेकर दिनों तक लोग जूझते रहते हैं। इसी तरह भारतीय खाद्य निगम हो, या पेट्रोलियम के डिपो हों, या कोई और सरकारी कारखाना-गोदाम हो, उसके सामने मीलों तक गाडिय़ों की कतारें लगी रहती हैं, मानो उन गाडिय़ों पर किसी का खर्च ही न हुआ हो, कोई लागत ही न आई हो, और उनको चलाने वाले कर्मचारियों पर कोई खर्च ही न होता हो। जब किसी कारोबार की क्षमता को सरकार ऐसे बर्बाद करती है, तो उसका नुकसान कुल मिलाकर ग्राहक के सिर पर ही आता है। जनता को सामान या सफर सब महंगे मिलते हैं। 
हम अभी टोल नाकों को लेकर, या देश भर में सड़कों पर होने वाली अवैध वसूली को लेकर, या ओवरलोड चलने वाली ट्रकों से सड़कों को होने वाले नुकसान को लेकर यहां अधिक बात करना नहीं चाहते क्योंकि उससे मुद्दा भटक जाएगा। भारत को एक विकसित देश की तरह सड़कों पर गाडिय़ों को रोक-रोककर वसूली का सिलसिला खत्म करना चाहिए। ट्रांसपोर्ट कारोबार के लोगों ने खुद होकर कहा है कि सरकार उस तरह के टैक्स बढ़ा ले, और इससे उसका टोल-टैक्स का घाटा भी दूर हो जाएगा, और गाडिय़ों का ईंधन भी बचेगा, वक्त भी बचेगा। यह बात बहुत ही जायज है, और केन्द्र सरकार को इस पर तुरंत कोई रास्ता निकालना चाहिए। पूरी दुनिया में आज अंतरराष्ट्रीय संगठन हर देश और प्रदेश को जिन पैमानों पर आंकते हैं, उनमें एक बड़ा पैमाना कारोबार की सहूलियत भी है। जब देश में तमाम सड़कों पर इस तरह के अड़ंगे लगाकर कानूनी और गैरकानूनी वसूली की जाती है, तो यह सहूलियत के ठीक खिलाफ है। जो देश अपने आपको डिजिटल बनाने के घमंड में जी रहा है उस देश को पुराने जमाने की लठैत-रंगदारी के तरीके से सड़क पर टैक्स वसूलने से उबरना होगा। सरकार को टैक्स वसूलने की ऐसी नाकाबंदी खत्म करनी चाहिए, इससे भ्रष्टाचार की बदबू भी आती है, और डीजल-पेट्रोल के धुएं की भी। 

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