बच्चों का यौनशोषण कोई पश्चिमी समस्या नहीं

संपादकीय
18 अक्टूबर 2015

दिल्ली में ढाई बरस की एक बच्ची से बलात्कार हुआ, तो उसके दो मुजरिम पकड़ाए हैं। ये परिवार के जान-पहचान के ही नाबालिग लड़के थे। देश भर में ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता जब ऐसे दस-बीस मामले अस्पताल और पुलिस तक न पहुंचते हों। दिल्ली चूंकि कैमरों के घेरे में रहती है इसलिए वहां की छोटी-छोटी बात भी खबर बन जाती है। फिर दूसरी बात यह कि जब परिवार के लोग यह तय करते हैं कि ऐसे बलात्कार या देहशोषण के मामले पुलिस तक ले जाए जाएं, तभी वे मीडिया की नजर में भी आते हैं। लेकिन इससे कई गुना अधिक मामले सामाजिक शर्मिंदगी या पारिवारिक असुविधा की बात सोचकर घर में ही दबा दिए जाते हैं। 
अब इस नौबत को देखते हुए पूरे देश में जिन बातों की जरूरत है, उनमें पहली तो यह है कि छोटे बच्चों को बिना हिफाजत न छोड़ा जाए। बेंगलुरू जैसे एक बड़े शहर में स्कूली बच्चियों से स्कूलोंं में ही लगातार बलात्कार के मामले सामने आते रहते हैं, और सबसे पढ़े-लिखे शहर का यह हाल है। गांवों में नौबत और खराब होगी, यह तय है। इसलिए पूरे देश में बच्चों की हिफाजत को लेकर न सिर्फ सरकार को बल्कि समाज और परिवार को भी एक नई जागरूकता के साथ और एक नई सावधानी के साथ सोचने की जरूरत है। दूसरी बात यह कि समाज को यह भी समझना पड़ेगा कि बच्चों का देहशोषण करने वाले लोग उसके अपने बीच के होते हैं, और बहुत से मामलों में उनकी परिवार तक, स्कूल तक पहुंच होती है। इसलिए अपने पारिवारिक परिचितों के बारे में ऐसा अंधविश्वास ठीक नहीं है कि वे भला ऐसा कैसे कर सकते हैं। 
तीसरी बात यह कि बच्चे जब बड़े होने लगते हैं तो शायद किशोरावस्था से भी पहले, आठ-दस बरस की उम्र से उन्हें उनके बदन के बारे में, और सावधानी बरतने के बारे में सिखाना बहुत जरूरी है। भारत में दरअसल जब कभी बच्चों को सिखाने के मामले में सेक्स शब्द का इस्तेमाल भी होता है, तो संस्कृति के ठेकेदारों का एक ऐसा तबका उठकर खड़ा हो जाता है जो सोचता है कि यह बच्चों को सेक्स करना सिखाने की योजना है। बच्चों को उनके बदन की जानकारी देना, और सेक्स के प्रति सावधान करना भी एक जरूरी शिक्षा है, और देश का कट्टरपंथी माहौल इसकी इजाजत ही नहीं देता है। नतीजा यह होता है कि बच्चे किशोरावस्था से पार होने लगते हैं, और अपने बदन से लेकर देहसंबंधों तक की उनकी जानकारी पोर्नोग्राफी या अश्लील फिल्मों से मिली रहती है, उन्हें किसी तरह की वैज्ञानिक या मानसिक सीख नहीं मिल पाती। 
देश भर में सेक्स-अपराध बहुत बढ़ रहे हैं, और बच्चों की जिंदगी में सक्रियता भी बढ़ती जा रही है। स्कूलें दूर-दूर हैं, वहां आना-जाना पड़ता है, खेलकूद में बच्चों को दूर तक जाना पड़ता है, और जब मां-बाप दोनों कामकाजी रहते हैं तो भी बच्चों को घंटों तक अकेले रहना पड़ता है। ऐसे में कम उम्र से भी उनको एक सावधानी सिखाने की जरूरत है। आज तो हालत यह है कि बच्चे परिवार से जुड़े किसी के बारे में मां-बाप को शिकायत करते हैं, तो मां-बाप उनको ही झिड़ककर चुप करा देते हैं। यह नौबत बदलनी चाहिए, क्योंकि सेक्स-अपराधी चारों तरफ फैले हुए हैं, और मौकों की तलाश में रहते हैं। पश्चिमी देशों में साइबर-पुलिस लगातार ऐसे मुजरिमों को इंटरनेट पर तलाशती रहती है, और पकड़कर सजा भी दिलवाती रहती है। लेकिन भारत अभी तक बच्चों के यौन शोषण के खतरों की तरफ से आंखें बंद किए बैठा है कि मानो यह कोई पश्चिमी समस्या है। 

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